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विवाह पत्नी के शरीर पर अधिकार का साधन नहीं, सम्बन्धों में पत्नी की इच्छा का भी हो सम्मान

दिल्ली उच्च न्यायालय में वैवाहिक बलात्कार पर दायर एक याचिका की सुनवाई के दौरान अदालत ने कहा कि अब बलात्कार की परिभाषा बदल गई है। पति द्वारा बलात्कार के मामलों में जरूरी नहीं है कि बल का ही प्रयोग किया जाए। आर्थिक जरूरत, बच्चों की देखभाल या परिवार की जरूरतों के नाम पर दबाव बनाकर शारीरिक संबंध बनाना भी एक प्रकार से बलात्कार ही है। यदि महिला ऐसे आरोप लगाकर अपने पति के खिलाफ बलात्कार का मामला दर्ज कराती है तो क्या होगा?

अदालत में पुरुषों द्वारा संचालित एक गैर-सरकारी संस्था (एनजीओ) द्वारा दायर याचिका में वैवाहिक दुष्कर्म को अपराध बनाने वाली याचिका का विरोध किया जा रहा है। याचिकाकर्ता एनजीओ का कहना है कि पति द्वारा पत्नी के साथ जबरन शारीरिक संबंध स्थापित करने को बलात्कार की श्रेणी में नहीं रखना चाहिए। इस पर अदालत ने कहा कि बलात्कार सिर्फ एक बलात्कार है। आईपीसी के 375 के तहत इसे अपवाद क्यों होना चाहिए? बल बलात्कार के लिए एक पूर्व शर्त नहीं है। दरअसल धारा 375 के अपवाद में कहा गया है कि एक व्यक्ति द्वारा अपनी पत्नी के साथ जिसकी उम्र 15 साल से कम नहीं है, संबंध बनाना बलात्कार नहीं है। इस मामले में अभी सभी पक्षों की दलीलें पूरी नहीं हुई है और आठ अगस्त को इसकी अगली सुनवाई होगी।

आपको बता दें कि अदालत में एक याचिका दायर की गई है, जिसमें वैवाहिक बलात्कार को अपराध घोषित करने की मांग की गई थी। इसका विरोध एनजीओ मैन कल्याण ट्रस्ट द्वारा किया गया, जिसमें दावा किया गया था कि उसकी पत्नी के साथ एक व्यक्ति द्वारा संबंध बनाना बलात्कार नहीं है। यह असंवैधानिक नहीं है। खंडपीठ ने ट्रस्ट के प्रतिनिधियों के समक्ष विभिन्न प्रश्न उठाए, जिन्होंने इस मामले में हस्तक्षेप किया था और पूछा कि क्या उनका कहना है कि पति अपनी पत्नी पर संबंध के लिए दबाव डाल सकता है? इसके जवाब में एनजीओ ने नकारात्मक जवाब दिया और कहा कि घरेलू हिंसा कानून, विवाहित महिला को अपमानजनक, अप्राकृतिक सेक्स, जो पति द्वारा यौन उत्पीड़न के खिलाफ पत्नी को पर्याप्त सुरक्षा प्रदान करता है। हालांकि, पतियों को ऐसी कोई सुरक्षा नहीं दी जाती है क्योंकि भारत में कानून लिंग विशिष्ट (जेंडर न्यूट्रल) हैं। दुनिया के अधिकांश हिस्सों के विपरीत है। वहीं, केंद्र ने भी मुख्य याचिकाओं का विरोध किया है कि वैवाहिक बलात्कार को आपराधिक अपराध नहीं बनाया जा सकता क्योंकि यह ऐसी घटना बन सकती है जो विवाह संस्था को अस्थिर कर सकती है और पतियों को परेशान करने के लिए एक आसान साधन बन सकती है।

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