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संपादकीय – अतिक्रमण और नेताओं की मजबूरी

अभी हाल ही में गाज़ियाबाद के एक पार्षद महोदय इस बात से बहुत ज़्यादा नाराज़ हो गए कि उनके क्षेत्र से अतिक्रमण क्यों हटाया जा रहा है। गुस्से में वे अपने वार्ड के उन जागरूक नागरिकों पर भड़क गए जो अतिक्रमण के खिलाफ हैं। ये जागरूक नागरिक जिला प्रशासन के साथ अतिक्रमण करने वाले लोगों के पास अनुरोध करने गए थे कि वे स्वयं ही अतिक्रमण हटा लें, वरना मजबूरी में प्रशासन को कार्यवाही करनी होगी। इन पार्षद महोदय ने अपने कुछ साथियों (चमचों) के साथ अतिक्रमण का विरोध करने वालों में से एक नागरिक के कार्यालय में जा कर उसे कथित रूप से समझाने (धमकाने) का प्रयास भी किया।

इससे पहले भी राजनगर में घरों और दफ्तरों के बाहर सड़कों पर रखे जेनरेटर हटाने के प्रशासन के प्रयास को हमारे सांसद, विधायकों और पार्षदों ने सफल नहीं होने दिया। जीडीए की कर्तव्यनिष्ठ अधिकारी और तत्कालीन वीसी कंचन वर्मा के द्वारा गलत बने रैम्प, सड़कों के किनारे हुए अतिक्रमण और अवैध बने पूजा स्थलों के विरुद्ध चलाये जा रहे अभियान के कारण हर एक स्तर का नेता उनसे नाराज़ हो गया था।

अब सोचने वाली बात ये है कि आखिर हमारे जन प्रतिनिधि इस तरह के जन उपयोगी और कानून सम्मत हो रहे कामों का विरोध क्यों करते हैं? ये नेता क़ानून का सम्मान नहीं करते या फिर इतने मूर्ख हैं कि जनता के हितों का इन्हें कोई ध्यान नहीं है? जी ऐसा बिलकुल भी नहीं है, ये मूर्ख भी नहीं हैं और क़ानून से अनजान भी नहीं हैं। दरअसल ये नेता लोग बेहद धूर्त और अवसरवादी हैं। इनकी नज़र लोक हित से ज़्यादा अपने हित पर रहती है और इसलिए ये कोई भी ऐसा काम नहीं होने देते जिसके कारण इन्हें एक वोट का भी नुकसान होने का अंदेशा हो। इन नेताओं को हम और आप अच्छे से जानते और समझते हैं इसलिए हर बात के लिए इन्हें कोसते भी हैं। लेकिन हमारी ये समझ आज तक हमारा कोई भला नहीं कर पायी। हमारे नेता ऐसे ही थे, ऐसे ही हैं और आगे भी ऐसे ही रहेंगे। तो फिर क्या कारण है जो हम ये नहीं समझ पाते कि नेता ऐसा क्यों करते हैं?

तो आज इन नेताओं की मजबूरी भी समझ ली जाए तो अच्छा रहेगा। दरअसल नेताओं के ऐसा होने का कारण है जनता यानि वोटर। आज देश को आज़ाद हुए 70 साल हो गए, दुनिया कहाँ से कहाँ पहुँच गयी, साइंस ने हर तरह की जानकारी और समझ हमारे मोबाइल के द्वारा हमारे हाथों में पहुंचा दी पर हमारे दिमाग में आज भी जाति, धर्म और अपने घटिया स्वार्थ के अलावा कुछ घुसता ही नहीं। हम लोग रेम्प ऐसा बनायेंगे कि घर का सारा पानी सड़क पर पहुंचता रहे, अपना जेनरेटर घर और ऑफिस के बाहर सड़क पर ही रखेंगे, समय और पेट्रोल बचाने के लिए गाडी रौंग साइड में ज़रूर चलाएंगे, रेड लाईट से हमें डरना नहीं है, जहां तहां रोड पर कट बना लेंगें, लाइन में खड़ा हो कर काम कराने में हमें शर्म आती है, टैक्स देने से ज्यादा टैक्स चोरी करने में ध्यान रखेंगे, सरकारी माल और पैसा लूटना हमें हक़ लगता है, सड़क पर रख कर माल बेचना और घर के फंग्शन करना हम अपना अधिकार समझते हैं, मस्जिदों, गुरुद्वारों और मंदिरों में लाउड स्पीकर बजायेंगे और फिर कहेंगे कि इस देश का कुछ नहीं हो सकता। और हाँ हम उसी नेता को वोट देंगें जो हमारी गलतियों और गुनाहों को देख कर न केवल अनदेखा कर दे, बल्कि हमें सज़ा से बचाने के लिए भी काम करे।

आप को शायद मेरी बात बुरी लगे या सही ना लगे पर मुझे तो यही लगता है कि देश की बदतर होती हालत के लिए हम देशवासी ज्यादा जिम्मेवार हैं और शहर की बदहाल सूरत के लिए शहर के लोग ज्यादा जिम्मेवार हैं। लोग बदलेंगे, समझदार बनेंगें तो अच्छे नेताओं को चुनेंगे जो सही और जन उपयोगी काम करेंगे। अच्छे नेता हर समय वोटों की तलाश में ना रह कर लोगों को सही दिशा में ले जाने का काम करेंगे। अच्छे नेता सेवा को रोज़गार नहीं बनाते और बुरे नेता सेवा नहीं रोज़गार ही करते हैं। इसलिए अतिक्रमण बना रहे या हट जाए ये नेताओं के नहीं हमारे आप के हाथ में है और ये बात जितनी ज़ल्दी हमें समझ आ जाए उतना ही अच्छा है। तब तक यही मान कर चलिए कि नेताओं की मजबूरी वोट है और हम वोटर अभी बहुत नादान हैं।

आप की प्रतिक्रियाओं की प्रतीक्षा में
आपका अपना
अनिल कुमार


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