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‘जिस लाहौर नई देख्या ओ जम्या ही नई’ में दिखी इंसानी रिश्तों की दास्तां

गाज़ियाबाद | प्रथमपथ थियेटर की प्रस्तुति ‘3 नाटक’ की शृंखला में असगर वजाहत के लिखे नाटक ‘जिस लाहौर नहीं वेख्या ओ जम्या ही नहीं’ का मंचन “गुरूकुल द स्कूल” के सभागार में रविवार, 8 अप्रैल को किया गया। भारत और पाकिस्तान के बँटवारे पर आधारित इस कहानी में गुँथे मर्म के जरिए दोस्ती के पैगाम का खचाखच भरे प्रेक्षागृह में लोगों ने तहे-दिल से स्वागत किया। नाटक का निर्देशन सुधीर राणा ने किया। नाटक में कलाकारों ने आपसी प्रेम और भाइचारे की मिसाल पेश करते हुए यह संदेश दिया कि जब दो व्यक्ति मिलकर रह सकते है तो सरहद की दीवारों को तोड़कर हिन्दुस्तान-पाकिस्तान एक साथ क्यों नहीं रह सकते थे।

असगर वजाहत लिखित यह नाटक 1947 में भारत-पाक विभाजन की त्रासदी झेलने वाले परिवारों पर आधारित है। यह विभाजन नफरत, कट्टरता और असहिष्णुता की गवाही देने वाला था, जहां काफी लोग मारे गए और एक पूरी पीढ़ी अपनी राष्ट्रीय पहचान खोकर बेघर हो गई। नाटक की कहानी विभाजन के दौरान लाहौर में रह गई एक बूढ़ी हिन्दू औरत रतनलाल जौहरी की मां के आसपास घूमती है, जिसने दंगों में अपने परिवार को खो दिया है और उसका मकान भी लखनऊ से लाहौर आए मुस्लिम शरणार्थी सिकन्दर मिर्जा के परिवार को अलॉट कर दिया जाता है, जो काफी समय तक शरणार्थी कैंपों में रहने के बाद लाहौर पहुंचता है। सुधीर राणा ने नाटक का निर्देशन करने के साथ साथ रतन की मां का किरदार भी निभाया। अभिनय के दौरान उन्होंने दशर्कों को कई मार्मिक क्षण दिये जिन्हें लम्बे समय तक याद रखा जायेगा। सिकन्दर मिर्जा का किरदार अमित कुमार ने, हामिदा बेगम का किरदार अनुजा बेरी ने, तन्नो का किरदार मेघना तिवारी ने, जावेद का किरदार पदम शर्मा ने और पहलवान के किरदार को मनीष भल्ला ने जीवंत बनाया।

तीन नाटकों की इस शृंखला के अगले दो नाटक ‘डाकघर’ 22 अप्रैल को और ‘एक था गधा’ 13 मई को गुरूकुल द स्कूल के सभागार में मंचित किए जायेंगे।

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