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जलियांवाला बाग कांड ब्रिटिश इतिहास की एक शर्मनाक घटना, जानिये कुछ ख़ास बातें

नई द‍िल्‍ली। जलियांवाला बाग हत्‍यकांड भारतीय इतिहास का काला अध्‍याय है। आज से 99 साल पहले 13 अप्रैल 1919 को अंग्रेज अफसर जनरल डायर ने अमृतसर के जलियांवाल बाग में मौजूद निहत्‍थी भीड़ पर गोलियां चलवा दीं थीं। इस हत्‍याकांड में 1000 से ज्‍यादा लोग मारे गए थे, जबकि 1500 से भी ज्‍यादा घायल हो गए थे। जिस दिन यह क्रूरतम घटना हुई उस दिन बैसाखी थी। इसी हत्‍याकांड के बाद ब्रिटिश हुकुमत के अंत की शुरुआत हुई। इसी के बाद देश को ऊधम सिंह जैसा क्रांतिकारी मिला और भगत सिंह समेत कई युवाओं में देश भक्ति की लहर दौड़ गई। जानिए जलियांवाल बाग हत्‍याकांड से जुड़ी कुछ ख़ास बातें-

अमृतसर के प्रसिद्ध् स्‍वर्ण मंदिर यानी कि गोल्‍डन टेंपल से डेढ़ किलोमीटर दूर स्थित जलियांवाला बाग में 13 अप्रैल 1919 को रौलेट एक्‍ट का विरोध करने के लिए एक सभा हो रही थी। जलियांवाला बाग में कई सालों से बैसाखी के दिन एक मेला भी लगता था, जिसमें शामिल होने के लिए उस दिन सैंकड़ों लोग वहां पहुंचे थे।

तब उस समय की ब्रिटिश आर्मी का ब्रिगेडियर जनरल रेज‍िनैल्‍ड सैनिकों को लेकर वहां पहुंच गया। सैनिकों ने बाग को घेर कर ब‍िना कोई चेतावनी दिए निहत्‍थे लोगों पर गोलियां चला दीं। वहां मौजूद लोगों ने बाहर निकलने की कोश‍िशें भी कीं, लेकिन रास्‍ता बहुत संकरा था। इसी वजह से वे बाहर नहीं निकल पाए और अपनी जान बचाने में असफल रहे।
जनरल डायर के आदेश पर ब्रिटिश आर्मी ने बिना रुके लगभग 10 मिनट तक गोलियां बरसाईं। इस घटना में करीब 1,650 राउंड फायरिंग हुई थी। बताया जाता है कि सैनिकों के पास जब गोलियां खत्‍म हो गईं तब जाकर उनके हाथ रुके।
कई लोग अपनी जान बचाने के लिए बाग में बने कुएं में कूद पड़े। इस कुएं को शहीदी कुएं के नाम से जाना जाता है। यह आज भी जलियांवाला बाग में है और उन मासूम लोगों की याद दिलाता है जो अंग्रेजों के बुरे मंसूबों का श‍िकार हो गए थे।

ब्रिटिश सरकार के अनुसार इस फायरिंग में लगभग 379 लोगों की जान गई और 1200 अन्‍य जख्‍मी हुए। लेकिन भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के मुताबिक उस दिन 1000 से ज्यादा लोग शहिद हुए, जिनमें से 120 की लाशें कुएं में से मिली थीं और 1500 से ज्यादा लोग जख़्मी हुए थे। जनरल डायर रौलेट एक्‍ट का बहुत बड़ा समर्थक था. उसे इसका विरोध मंजूर नहीं था। उसकी मंशा थी कि इस हत्‍याकांड के बाद भारतीय डर जाएंगे, लेकिन इसके ठीक उलट ब्रिटिश सरकार के खिलाफ पूरा देश आंदोलित हो उठा।

इस हत्‍याकांड की पूरी दुनिया में आलोचना हुई। आखिरकार दबाव में भारत के लिए सेक्रेटरी ऑफ स्‍टेट एडविन मॉण्टेगू ने 1919 के अंत में इसकी जांच के लिए हंटर कमीशन बनाया। कमीशन की रिपोर्ट आने के बाद डायर का डिमोशन कर उसे कर्नल बना दिया गया। साथ ही उसे ब्रिटेन वापस भेज दिया गया।

हाउस ऑफ कॉमन्स ने डायर के खिलाफ निंदा प्रस्ताव पारित किया। लेकिन हाउस ऑफ लॉर्ड ने इस हत्‍याकांड की तारीफ करते हुए उसका प्रशस्ति प्रस्ताव पारित किया। बाद में दबाव में ब्रिटिश सकार ने उसका निंदा प्रस्‍ताव पारित किया। 1920 में डायर को इस्‍तीफा देना पड़ा।

जलियांवाला बाग हत्‍याकांड का बदला लेने के लिए 13 मार्च 1940 को ऊधम सिंह लंदन गए। वहां उन्‍होंने कैक्सटन हॉल में डायर की गोली मारकर मौत के घाट उतार दिया। ऊधम सिंह को 31 जुलाई 1940 को फांसी पर चढ़ा दिया गया। उत्तराखंड के ऊधम सिंह नगर का नाम उन्‍हीं के नाम पर रखा गया है। जलियांवाला बाग हत्‍याकांड ने भगत सिंह को भीतर तक प्रभावित किया। बताया जाता है कि जब भगत सिंह को इस हत्‍यकांड की सूचना मिली तो वे अपने स्‍कूल से 19 किलोमीटर चलकर जलियांवाला बाग पहुंच गए थे।

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