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शाबाश: सालों के संघर्ष से नाज़िया ने बदला इतिहास, हासिल की महिला सदस्यता का अधिकार

नई दिल्ली। 32 साल की नाज़िया इन दिनों झारखंड में सुर्खियों में है। दरअसल हाल ही में नाजिया रांची में अंजुमन इस्लामिया के चुनाव में महिला सदस्य के तौर पर वोट दिया है। अंजुमन के सौ सालों के इतिहास में यह पहली दफ़ा हुआ है। जब किसी महिला सदस्य वोट किया, क्योंकि अब तक किसी भी महिला को अंजुमन का सदस्य नहीं बनाया गया था। नाज़िया कहती हैं कि मुस्लिम महिलाओं में भी हुनर और प्रतिभाएं हैं। घर-परिवार और समाज का थोड़ा साथ मिल जाए, तो वे भी तेजी के साथ अगली कतार में शामिल होती दिखेंगी।

एक सवाल के जवाब में नाजिया कहती हैं कि मक़सद इतना भर था कि मुस्लिम महिलाओं की भागीदारी के रास्ते खुलें, पुरुष प्रधान समाज के ख्यालात बदलें। उनहोंने कहा कि आगे मेरी कोशिश होगी कि इसमें महिला सदस्यों की संख्या बढ़े और अंजुमन के कार्यों में महिला विषयों को तवज्जो मिले। उनहोंने कहा कि साल 2008 में मैंने अंजुमन की सदस्यता के लिए आवेदन दिया था, जिसे ख़ारिज कर दिया गया. मुझे बताया गया कि अंजुमन में कोई महिला सदस्य नहीं बन सकती। इसके बाद महिला आयोग में उन्होंने दरख्वास्त डाला। आयोग ने उनके पक्ष में फैसला दिया। इसके बाद भी बात नहीं बनी। तब वो राज्य अल्पसंख्यक आयोग पहुंचीं।

आयोग के तत्कालीन अध्यक्ष डॉक्टर शाहिद अख्तर ने वक्फ बोर्ड के कार्यपालक पदाधिकारी और अंजुमन के चुनाव संयोजक के बीच सुनवाई कराई। सुनवाई के बाद नाज़िया को वोट देने का अधिकार देने को कहा गया। साल गुजरते रहे इस बीच साल 2013 में उन्हें अंजुमन का सदस्य बना दिया गया। लेकिन वोट देने के लिए पहचान पत्र जारी नहीं किया गया। बकौल नाज़िया, वोट नहीं देने से वो निराश हुई लेकिन हताश नहीं।

इसके बाद नाज़िया कल्याण मंत्रालय के प्रधान सचिव को पत्र लिखा साथ ही वक्फ बोर्ड ट्राइब्यूनल में मामला लेकर गईं। इस संघर्ष में उनके पति शमीम अली ने पूरा पूरा साथ दिया। हाल ही में हुए चुनाव में वक्फ बोर्ड के कार्यपालक अधिकारी जो चुनाव के संयोजक भी थे, उन्होंने वोट के लिए पहचान पत्र जारी किया।

बता दें कि इस अधिकार को पाने के लिए नाज़िया ने पूरे दस सालों की लड़ाई लड़ी। मुसलमानों के बीच सामाजिक, शैक्षणिक तरक्की, रोज़गार, स्वास्थ्य सुविधा मुहैया कराने के साथ गरीबों-मजलूमों की मदद के लिए अंजुमन में काम करता रहा है। झारखंड में सुन्नी वक़्फ़ बोर्ड अंजुमन इस्लामिया के कामकाज पर नज़र रखता है।

वैसे ये कोई पहली बार नहीं है जब नाज़िया ने जुझारूपन दिखाया है। कॉलेज के दिनों में भी छात्र नेता के तौर पर रांची विश्वविद्यालय में किसी मुस्लिम छात्रा के पहली बार चुनाव जीतने का रिकॉर्ड भी उन्हीं के नाम है।

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