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अबे रुक साले बनाम लगी तो नहीं भाई

परसों रात की बात है, मैं दिल्ली एयरपोर्ट से गाज़ियाबाद लौट रहा था। रास्ते में राव तुला मार्ग पर एक बाइक वाला हमारी गाड़ी के बराबर से आगे निकला और तुरंत आगे जा रही एक कार से टकरा गया। हालांकि उसकी स्पीड ज़्यादा नहीं थी फिर भी वह संतुलन खोकर गिर गया। उसके गिरते ही मेरे से आगे जा रही कार रुकी और फिर मेरी कार भी। अगली वाली गाड़ी से बाउंसरों की तरह दिखने वाले दो लड़के उतरे और तेज़ी से उस बाइक सवार की ओर लपके। मुझे लगा कि अब बाइक सवार की खैर नहीं क्योंकि सारी गलती बाइक वाले की ही थी। जिस कार में उसने टक्कर मारी थी, वह एक महंगे विदेशी ब्रांड की थी। बाइक वाले को किसी तरह से पिटाई से बचाया जा सके, यह सोचता हुआ मैं भी तेज़ी से अपनी गाड़ी से उतरा। हालांकि ऐसे में कई बार खुद अपने पिटने की भी काफी गुंजाइश होती है, पर मैं बाइक वाले को पिटने नहीं देना चाहता था। गिरने के कारण बाइक वाले के काफी चोट लगी थी, पर वह जल्दी से उठ कर खड़ा हो गया था।

मेरी उम्मीद से अलग कार से उतरे दोनों लड़के बाइक वाले से पूछ रहे थे कि भाई तेरे को ज़्यादा चोट तो नहीं लगी? एक लड़के ने पहले बाइक वाले का हेलमेट उठाकर उसे पकड़ाया और फिर उसकी बाइक को उठाकर स्टैंड पर खड़ा कर दिया। कार वाले दोनों लड़के बहुत ही भलमनसाहत के साथ बाइक वाले की मदद कर रहे थे। दो तीन मिनट में बाइक वाला काफी सहज हो गया, लेकिन कार वाले लड़के उसे डॉक्टर को दिखाने के लिए ले जाना चाहते थे। बाइक वाले ने कार वाले लड़कों को बहुत धन्यवाद दिया और सौरी बोलने के बाद अपनी बाइक स्टार्ट कर के चला गया।

यह देख कर मुझे बड़ा सुखद अहसास हुआ। मैंने आगे बढ़कर उन कार वाले लड़कों की पीठ थपथपाई और पूछा कि आप की नयी गाड़ी में इतना नुकसान होने के बाद भी आप को बाइक वाले पर गुस्सा नहीं आया? उनका जवाब सुनकर मेरी सोच को एक नया आयाम मिला। उन्होंने कहा, सर गाड़ी इंश्योर्ड है और एक दो दिन में ठीक हो ही जायेगी लेकिन सड़क पर गिरने वाले लड़के को अगर कोई गंभीर चोट लग जाती तो उसके परिवार पर क्या बीतती।

उस दिन मुझे अहसास हुआ कि सड़कों पर आये दिन ऐसे भले लोग इंसानियत की साक्षात मिसाल बनते रहते हैं पर उन के बारे में कहीं कुछ नहीं छपता। हमारे आसपास ज़्यादातर लोग अच्छे और भले इंसान ही होते हैं, पर अखबारों और टीवी पर खराब और बुरी घटनाएं ही खबर बनती हैं, इसलिए हम लोगों की भलमनसाहत के बारे में जान ही नहीं पाते। हम में से हर कोई किसी ना किसी का भाई, बहन, बेटा, बेटी, पिता, माता, रिश्तेदार, मित्र या पड़ोसी होता है और इसीलिए दूसरे इंसान का दुःख हम अच्छी तरह से समझते हैं।

मुझे लगता है की समाचार बनने वाली घटनाओं को समाज का आईना मानने की भूल से हमें बचना होगा। शहरों में बेहताशा बढ़ती आबादी और ट्रैफिक के कारण आये दिन छोटे-बड़े एक्सीडेंट होते रहते हैं। उनमें से कभी-कभार ही कुछ ऐसा होता है जब कोई इंसानियत भूल कर सड़क पर ही मार पीट या गाली-गलौज पर उतर आता है। किसी घायल को डॉक्टर या अस्पताल पहुंचाने वालों की संख्या बहुत बड़ी है जो बिना किसी भेदभाव के लोगों की मदद करते हैं। किसी खो गए बच्चे की मदद करके लोग उसे उसके मां बाप तक पहुंचा कर ही दम लेते हैं। किसी बुजुर्ग या विकलांग की मदद करने को लोग पुण्य समझते हैं। ये सब शुभ संस्कार हम अपने घर और आसपास के माहौल से सीखते हैं। हमारी ये खूबसूरत संस्कृति इसी तरह से आगे बढ़ती रहे और हम सब इसमें अपना सहयोग देते रहें!!!

इसी कामना के साथ
आपका अपना
अनिल कुमार