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जब हीरो बने मनचंदा जी

हमारी कॉलोनी में आने के कुल चार रास्ते हैं जिन पर गेट लगे हैं। इनमें से तीन गेट रात 9 बजे से सुबह 6 बजे तक बंद कर दिए जाते हैं। मेरे घर के पास बने चौथे गेट पर रात भर एक गार्ड रहता है जो आने जाने वाली गाड़ियों के नंबर नोट करने के बाद ही गेट खोलता है। एक दिन कुछ लड़के कॉलोनी में रहने वाले अपने एक दोस्त से मिलने आये। उन लोगों ने अपने दोस्त के घर के बाहर गाड़ी में बैठ कर व्हिस्की और अण्डों की दावत उड़ाई। वापसी में नशे में धुत इन लड़कों की कार का साइड व्यू मिरर गेट से टकरा गया। बस फिर क्या था, बिना समय गवाएं इन लड़कों ने गार्ड को माँ बहन की गालियाँ देनी शुरू कर दीं। साले गेट पूरा क्यों नहीं खोला तूने? चल गाड़ी में हुए नुकसान के पैसे निकाल। गार्ड ने अपनी सफाई देनी चाही तो लड़कों ने उसकी पिटाई करनी शुरू कर दी। उन्होंने गार्ड को घसीट कर गाड़ी में डालने की कोशिश भी की। गार्ड ने खुद को किसी तरह लड़कों से छुड़ा कर मेरे घर की घंटी बजा दी और मदद के लिए जोर-जोर से चिल्लाने लगा।

गर्मी का मौसम था और अभी रात के 11 ही बजे थे। हम सभी लोग जाग रहे थे सो सब लोग तुरंत ही बाहर आ गए। शराबी लड़कों ने गार्ड को फिर पकड़ लिया था। उन्हें अपनी बदमाशी पर कुछ ज़्यादा ही घमंड था। बिना हमारी परवाह किए वे गार्ड को फिर से मारने लगे। मैंने उनमें से एक लड़के को पकड़ लिया और अपने बेटे से कहा कि मोबाइल से इन सब की फोटो ले लो। शोर सुनकर मेरे पड़ोसी मनचंदा जी भी बाहर आ गए। लड़कों को जब लगा कि वो घिर सकते हैं और उनकी फोटो भी ले ली गयी है तो वो गाड़ी में बैठ कर तेज़ी से भागे। लेकिन गार्ड ने भाग कर गेट बंद कर दिया था लिहाज़ा वो कॉलोनी के दूसरे गेटों की तरफ भागे पर वो तो पहले ही बंद हो चुके थे। हार कर उन्होंने गाड़ी वहीं छोड़ी और गेट कूद कर भाग गए। इस दौरान, मेरे बेटे ने 100 नंबर पर फोन कर दिया था और कुछ ही मिनटों में पुलिस भी वहां पहुँच गयी।

अब पूरा सीन बदल चुका था और कॉलोनी के पचासियों लोग जमा हो चुके थे। पुलिस मौजूद थी, घायल गार्ड और उन फरार शराबी लड़कों की गाड़ी मौके पर थी। रात को ही गार्ड का मेडिकल परीक्षण करा लिया गया। अगले दिन पुलिस ने बाकायदा मुकदमा दर्ज कर लिया और लड़कों की गिरफ्तारी के लिए उनके घर दबिश देना शुरू कर दिया। लेकिन अचानक कहानी में एक नया मोड़ आ गया। उन शराबी लड़कों के घर वालों ने किसी तरह से मनचंदा जी का मोबाइल नंबर ले लिया था। मनचंदा जी को धमकी मिली कि तुमने हमारे बच्चों को पकड़वाया है लिहाजा अब इसका अंजाम भुगतने को तैयार रहो। मनचन्दा जी को मिली धमकी की बात ज़ल्द ही सारी कॉलोनी में फ़ैल गयी। लोगों ने मीटिंग बुलाई और आनन-फानन में सब मिलकर थाने पहुँच गए। सारी बात सुनकर थानेदार ने लड़कों के घरवालों को वहीं थाने में बुलवा कर धमकाया और उन लड़कों को भी गिरफ्तार कर जेल भेज दिया।

इस घटना से हमारे पड़ोसी मनचंदा जी अनायास ही कॉलोनी के हीरो बन गए थे। आस-पास के सभी लोग अब उन्हें बड़े अदब और प्यार से देखने लग गए थे। मनचंदा जी को ये सब बहुत भा रहा था। असल में इस घटना से पहले मनचंदा जी कॉलोनी में एक शरीफ मगर कॉलोनी के लिए एक दम से बेकार आदमी के रूप में जाने जाते थे। वो कॉलोनी में रहते हुए भी कभी किसी के काम नहीं आते थे। वो चौकीदार के चंदे से लेकर स्वीपर के पैसे तक बचाया करते थे। पॉलिथीन में भरा हुआ उनके घर का कूड़ा हर रोज़ मोहल्ले के पार्क की दीवार के साथ फेंका जाता था। कॉलोनी में लाईट जाए, सड़क टूटे, पार्क सूख जाए या स्ट्रीट लाईट बंद पड़ी रहें पर वो कभी कुछ नहीं करते थे। उन्हें लगता था कि ये सब काम करने के लिए मोहल्ले में और कई लोग हैं। खैर अब तो मनचंदा जी की सोच का काया कल्प हो गया था। अब उन्हें शरीफ और बेकार आदमी के बीच का फर्क समझ आ चुका था। चौकीदार के साथ घटी उस घटना के बाद कॉलोनी के कई और मनचंदा जी अब शरीफ मगर काम के आदमी बन गए थे।

इस उम्मीद के साथ कि …“हमारा गाज़ियाबाद” के पाठक भी अपनी गली मोहल्ले के शरीफ मगर बहुत काम के लोग होंगे

आप का अपना
अनिल