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हजारों मुस्लिम महिलाओं को बचपन में ही गुजरना पड़ता है इस अमानवीय प्रथा से, सुप्रीम कोर्ट ने कहा रोकना होगा

न्यायमूर्ति दीपक मिश्रा की अध्यक्षता वाली पीठ ने दाऊदी बोहरा मुस्लिम समुदाय में प्रचलित महिलाओं के खतना प्रथा पर सवाल उठाते हुए कहा कि “यह प्रथा एक बच्ची के शरीर की अखंडता को भंग करती है”। सर्वोच्च न्यायालय की पीठ में केंद्र सरकार की ओर से अपना पक्ष रख रहे अटॉर्नी जनरल केके वेणुगोपाल ने कहा कि खतना प्रथा से दाऊदी बोहरा मुस्लिम महिलाओं को बचपन में ही ऐसा नुकसान पहुंचता है जिसकी जिंदगी भर भरपाई नहीं की जा सकती है और इस पर तुरंत प्रतिबंध लगाना चाहिए।
अटॉर्नी जनरल ने पीठ से कहा कि अमेरिका, ब्रिटेन, ऑस्ट्रेलिया के अलावा 27 अफ्रीकी देशों में इस प्रथा पर रोक लगी हुई है। मुस्लिम समुदाय की ओर से अदालत में पेश हुए वरिष्ठ वकील ए एम सिंघवी ने कहा कि मामले को संवैधानिक पीठ के पास भेजा जाना चाहिए क्योंकि यह एक धर्म की आवश्यक प्रथा का मामला है, जिसकी जांच की आवश्यकता है। जिस पर पीठ ने सवाल किया कि आखिर किसी एक व्यक्ति की शारीरिक अखंडता क्यों और कैसे एक आवश्यक प्रथा हो सकती है? पीठ ने कहा कि यह एक बच्ची के शरीर की ”अखंडता को भंग करता है” और साथ ही सवाल पूछा कि किसी व्यक्ति जननांगों पर दूसरे व्यक्ति का नियंत्रण क्यों होना चाहिए?
सुनवाई के दौरान वेणुगोपाल ने केंद्र के रुख को दोहरते हुए कहा कि इस प्रथा से बच्ची के कई मौलिक अधिकारों का उल्लंघन होता है और इससे भी अधिक खतने का स्वास्थ्य पर गंभीर असर पड़ता है। सिंघवी ने दलील दी कि इस्लाम में पुरुषों का खतना सभी देशों में मान्य है। पीठ ने वकील सुनिता तिवारी की ओर से जारी जनहित याचिका स्वीकार कर ली और इस पर अब 16 जुलाई को सुनवाई की जाएगी।
अदालत की इस राय का स्वागत करते हुए याचिका इस मामले में दाखिल करने वाली और 2015 में पहली बार इस मुद्दे को अपने निजी अनुभव के साथ सामने लाने वाली मसूमा रनाल्वी ने कहा- हम दृढ़ता पूर्वक ऐसा मानते हैं कि भारत को इस पुराने रिवाज को जड़ से खत्म करना होगा। जिसमें सरकारी एजेंसियों के सहयोग, समुदाय, पुलिस और स्वास्थ्य सुविधाओं से जुड़े पेशेवरों की मदद से ऐसा किया जा सकता है।

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