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और कितना अपमानित करोगे राष्ट्रध्वज को

गाज़ियाबाद के बुलंदशहर रोड औद्योगिक क्षेत्र में स्थित श्यामा प्रसाद मुखर्जी पार्क में आज सुबह एक बार फिर से फटा हुआ झण्डा लहरा रहा था। हालांकि सोशल मीडिया पर फोटो वायरल होने के बाद निगम ने झण्डा बदलवा दिया मगर, राष्ट्रध्वज के अपमान की यह शर्मनाक घटना यदि मुंबई, बैंगलुरु या ऐसे ही किसी अन्य जागरूक और जिम्मेदार नागरिकों वाले शहर में होती, तो अब तक कई अधिकारियों के खिलाफ कार्यवाही हो चुकी होती। अफसोस की बात है कि हमारे गाज़ियाबाद के सोये हुए नागरिकों और अधिकारियों की सुस्ती का यह आलम है कि हफ्ते-दर-हफ्ते होती इस घटना की ओर शायद ही किसी का ध्यान गया हो।

पूर्व मेयर अशु वर्मा की राजनैतिक महत्वाकांक्षा था यह झण्डा
चुनावों से पहले जनता में देशभक्ति की भावनाएँ जागृत कर उनके वोट हासिल करने की मंशा से तत्कालीन मेयर अशु वर्मा ने बैंड-बाजे के साथ श्यामा प्रसाद मुखर्जी पार्क में झण्डा लगाने के प्रोजेक्ट की शुरुआत की थी। मेयर साहब की राजनैतिक महत्वाकांक्षा को पूरा करने के लिए गाज़ियाबाद नगर निगम ने इस प्रोजेक्ट के ऊपर जनता की गाढ़ी कमाई से टैक्स के रूप एकत्र धनराशि से लगभग 18 लाख रुपया खर्च किया। अशु वर्मा का दुर्भाग्य रहा कि चुनाव आयोग ने मेयर गाज़ियाबाद की सीट को इस बार महिलाओं के लिए आरक्षित कर दिया और अशु वर्मा की सारी योजना बेकार हो गई। लेकिन, लगता है कि राजनैतिक महत्वाकांक्षा में मिली विफलता के बाद पूर्व मेयर की झंडे के प्रति रुचि और देशभक्ति दोनों ही खत्म हो गई। तभी तो लगातार राष्ट्र ध्वज के क्षतिग्रस्त होने की सूचना मिलने के बावजूद भी वे हरकत में नहीं आ रहे हैं। अगर हम वर्तमान मेयर आशा शर्मा और अन्य पार्षदों की बात करें तो अज्ञात कारणों से इन सभी की रुचि भी करोड़ों रुपए के विकास कार्यों वाले नए प्रोजेक्ट्स तक ही सीमित है।

प्रशासन व नगर निगम की उदासीनता
26 जनवरी 2017 को पहली बार लहराए इस झंडे का लोकार्पण केंद्रीय विदेश राज्य मंत्री और सांसद वीके सिंह ने किया था। तब से लेकर आज तक यह झण्डा गाज़ियाबाद नगर निगम के अधिकारियों की उदासीनता के कारण लगातार अपमान सह रहा है। ऊंचाई पर हवा के अधिक दबाव के कारण यह झण्डा लगाने के कुछ दिन बाद ही फट जाता है। उसके बाद आते जाते किसी व्यक्ति की निगाह फटे हुए झंडे पर पड़ती है तो वह तरस खाकर उसकी फोटो खींच सोशल मीडिया पर डाल देता है। उसके बाद यदि नगर निगम के अधिकारियों की मेहरबानी हो तो फटा हुआ झण्डा उतार दिया जाता है। कई बार नया झण्डा स्टॉक में न होने के कारण कई दिनों तक झंडे के स्थान पर खाली पोल ही नज़र आता है। पोल की ऊंचाई और झंडे के आकार का अनुपात भी सही नहीं है, शायद इसका कारण निगम के पास इस मद में पर्याप्त बजट न होना रहा है।

औद्योगिक संगठन के प्रयास भी रहे बेकार
झंडे की दुर्दशा के बारे में बुलंदशहर रोड औद्योगिक क्षेत्र के उद्यमी संगठन IAMA ने जिलाधिकारी और नगरायुक्त से कई बार बातचीत की मगर अब तक कोई भी अधिकारी झंडे के रख-रखाव के लिए कारगर कदम उठाने में असफल रहा है। IAMA के महा सचिव अनिल गुप्ता ने बताया कि संगठन की ओर से हम झंडे की दुर्दशा के विषय में कई बार अधिकारियों से चर्चा कर चुके हैं। यह मुद्दा मासिक उद्योग बंधु में भी उठाया गया है लेकिन खेदजनक है कि अभी तक कोई कार्यवाही नहीं हुई है। नगरायुक्त ने हमारे संगठन से झंडे के रख रखाव की ज़िम्मेदारी लेने का अनुरोध किया था किन्तु अत्यधिक लागत के कारण यह संगठन के बस की बात नहीं है। इसके अलावा झंडे के स्वामित्व से जुड़ी कानूनी पेचीदगियों के कारण भी रख-रखाव का काम सरकार अथवा सरकार द्वारा नियुक्त एजेंसी के माध्यम से करवाना ही ज्यादा उचित है। अनिल गुप्ता ने बताया कि नगरायुक्त सीपी सिंह के अनुरोध पर ही हमने झण्डा लगाने व उसके रख रखाव में दक्ष एक कंपनी का परिचय नगर निगम से कराया था। दिल्ली में कनाट प्लेस और पंजाब में वाघा बार्डर पर लगे झंडों का रख रखाव भी यही कंपनी कर रही है। मगर निगम में व्याप्त लाल फ़ीता शाही व अधिकारियों की उदासीनता के कारण हमारा यह प्रयास भी बेकार ही रहा।

अब क्या हो?
दरअसल रखरखाव की अधिक लागत, राष्ट्रध्वज से जुड़ी कानूनी पेचीदगियों और नगर निगम के अधिकारियों व कर्मचारियों की उदासीनता की वजह से यह झण्डा गाज़ियाबाद की शान के बजाए अपमान और उपहास का कारण बन चुका है। पोल की ऊंचाई के अनुपात में लगने वाले झंडे के रखरखाव की सालाना लागत 25 से 30 लाख रुपए के बीच आती है। हर साल इतनी धनराशि खर्च करना किसी सामाजिक संगठन अथवा समाजसेवी के बस की बात नहीं। इसके अलावा राष्ट्रध्वज से जुड़े कड़े नियम क़ानूनों के कारण कोई भी संगठन यह ज़िम्मेदारी उठाने के लिए तैयार नहीं होगा। बेहतर होगा कि नगर निगम को चाहिए राष्ट्रध्वज की देखरेख के लिए नियमित कर्मचारी रख उसकी जवाबदेही तय करे। इस मद में खर्च होने वाली धनराशि के लिए सालाना बजट जुटाना भी नगर निगम की ही ज़िम्मेदारी है। देखना यह होगा कि आने वाले दिनों में निगम राष्ट्रध्वज को अपमानित होने से बचाने में कामयाब हो पाता है या नहीं। वरना ऐसा न हो कि “हमारा गाजियाबाद” का कोई जागरूक पाठक नगरायुक्त व जिलाधिकारी के खिलाफ मुकदमा दर्ज करा दे और कड़े नियमों के चलते दोनों ही अधिकारियों को अपनी कुर्सी बचानी भारी पड़ जाए।

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