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नगर निगम के भाई-भतीजा वाद से हजारों महिलाओं की सुरक्षा दांव पर

गांवों और शहरों में लगने वाली स्ट्रीट लाइटों का एक उद्देश्य आते-जाते राहगीरों की मदद करना तो होता ही है, मगर इनका एक प्रमुख उद्देश्य होता है राहगीरों की चोर-लुटेरों और झपटमारों से सुरक्षा करना। जरा सोचिए आपके परिवार की कोई महिला शाम को अंधेरा होने के बाद घर लौट रही है और बंद स्ट्रीट लाइट से हुए अंधेरे का फायदा उठा कर कोई झपटमार या लफंगा उसके साथ बदतमीजी कर बैठे।
हमारे गाज़ियाबाद में भी महिलाओं के साथ चेन या पर्स छिनने की घटनाएँ अकसर हुआ करती हैं लेकिन आंकड़ों से पता चलता है कि ऐसी घटनाएँ उस इलाके में अधिक घटित होती हैं जहां स्ट्रीट लाइट नदारद हैं या खराब पड़ी हुई हैं। यही कारण है कि यहाँ पथ प्रकाश के लिए जिम्मेदार गाजियाबाद नगर निगम के एक महकमे की ज़िम्मेदारी ही शहर की स्ट्रीट लाइट्स को चाक चौबन्द और दुरुस्त रखना है। लेकिन इस महकमे के एक बड़े अधिकारी द्वारा भाई-भतीजावाद और भ्रष्टाचार के चलते शहर के एक बड़े इलाके में रहने वाली महिलाओं की सुरक्षा दांव पर लगी है।
दरअसल नगर निगम मुख्यालय में कई सालों से प्रकाश निरीक्षक के पद पर काबिज राकेश अग्निहोत्री की गाजियाबाद नगर निगम में गहरी पैठ है। अपने पद का उठाकर अग्निहोत्री ने अपने बेटे ऋषभ अग्निहोत्री की साझेदारी वाली एक कंपनी को लाइट सप्लाई करने का ठेका दिया और बाज़ार भाव से काफी महंगे दामों पर लाइटें खरीदीं। मंडलायुक्त द्वारा की गई जांच में पाया गया की ऋषभ की फर्म अम्बे एंटरप्राइज़ ने ₹6,000 मूल्य वाली लाइटें ₹13,797 में बेची। यही नहीं, इस फर्म की सपोर्टिंग फर्म आरके एंटरप्राइज़ का हैसियत प्रमाणपत्र भी फर्जी पाया गया। विदेश यात्राओं के शौकीन राकेश अग्निहोत्री के बेटे की फर्म को जहां पिछले 4 साल में 6 से 8 करोड़ का काम मिला है वहीं इस जांच की आंच से निगम के अधिशासी अभियन्ता आनन्द त्रिपाठी भी अछूते नहीं हैं।
मजे की बात तो यह है कि टेण्डर, खरीद और भुगतान के बावजूद शहर की अधिकांश सड़कों पर अंधेरे का साम्राज्य बढ़ता रहा। औद्योगिक क्षेत्रों के हालात बद से बदतर हो गए। हमारा गाज़ियाबाद टीम के द्वारा की गई पड़ताल में पता चला कि शहर के प्रमुख औद्योगिक क्षेत्रों में से एक, बीएसआर इंडस्ट्रियल एरिया में लगी 229 में से 150 से अधिक लाइटें खराब हैं। जबकि अधिशासी अभियंता यह दावा कर रहे हैं कि खराब लाइटों को ठीक करने का काम लगातार जारी है। हकीकत के ठीक विपरीत कुछ ऐसा ही दावा त्रिपाठी ने एडीएम (सिटी) के साथ हुई बैठक के दौरान भी किया।
आपको बता दें कि बीएसआर इंडस्ट्रियल एरिया में भारी तादाद में महिला कर्मचारी काम करती हैं। जहां अंधेरे के चलते शाम होते ही असामाजिक तत्व सक्रिय हो जाते हैं। महिलाओं से छेड़छाड़ एवं लूटपाट की घटनाएं आम हो गई हैं। सात तारीख के आसपास जब मजदूरों को वेतन मिलता है तो बदमाशों द्वारा उनके वेतन छीन लिये जाते हैं। निगम प्रशासन सब कुछ जानते हुए भी अनजान बना हुआ है। इस संबंध में जब इस क्षेत्र में तैनात पुलिसकर्मियों से बात की तो उन्होंने भी लूटपाट और महिलाओं के साथ बढ़ती छेड़-छाड़ की घटनाओं का एक बड़ा कारण इलाके की सड़कों पर पसरा अंधेरा ही बताया। अफसोस की बात यह है कि महिला सुरक्षा से जुड़े खराब स्ट्रीट लाइटों के मसले पर इलाके के पार्षद भी शांत बैठे हैं।
एक ओर मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ का महिला सुरक्षा व भ्रष्टाचार मुक्त सरकार के दावे कर रहे हैं, दूसरी ओर निगम में फैले भ्रष्टाचार से सड़क पर अंधेरे के साम्राज्य में महिला सुरक्षा दांव पर है। ऐसे में बड़ा प्रश्न यह उठता है कि क्या शासन-प्रशासन नींद से जागने के लिए बलात्कार जैसी बड़ी घटना का इंतजार कर रहा है? दूसरा प्रश्न यह है कि निगम के गलियारों में फैले भ्रष्टाचार की आग में सुलग रहे कर्तव्य और ईमान की चीखों के बावजूद प्रशासन की आंखें बंद और ज़बान मौन है, तो इसका जिम्मेदार कौन है?

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