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क्यों न चाँद-सितारे वाले हरे झंडे पर भारत में लगे बैन? सुप्रीम कोर्ट ने पूछा सरकार से

सुप्रीम कोर्ट में जस्टिस एके सिकरी की अध्यक्षता वाली दो जजों की बैंच ने सरकार से कहा है कि वह चाँद-सितारे वाले हरे झंडे को बैन करने वाली याचिका पर अपना रुख स्पष्ट करे। खंडपीठ ने अतिरिक्त सॉलिसीटर जनरल तुषार मेहता ने कहा है कि वो सप्ताह में केंद्र सरकार की राय बताए। इसके साथ ही अदालत ने उत्तर प्रदेश शिया वक्फ बोर्ड के अध्यक्ष वसीम रिजवी की जनहित याचिका को स्वीकार कर लिया जिसमें उन्होंने हरे रंग के चांद-सितारों वाले झंडे को पूरे भारत में बैन करने की मांग की थी। रिजवी ने यह याचिका 17 अप्रैल को दाखिल की थी।
वजीम रिजवी का कहना है कि ये झंडे पाकिस्तान के राष्ट्रीय ध्वज से मिलते जुलते हैं। कुछ कट्टरपंथी मौलवियों ने गलत तरीके से इस झंडे को इस्लाम से जोड़ दिया है, जबकि इनका इस्लाम से कोई लेना देना नहीं है। उन्होंने कहा कि इस झंडे के कारण अकसर सांप्रदायिक तनाव फैलता है और दो समुदायों के बीच दूरी बढ़ती है, इसलिए इसे बैन कर देना चाहिए। अपनी याचिका में रिजवी ने कहा गया है कि पैगम्बर मोहम्मद साहब अपने कारवां में सफेद या काले रंग का झंडा प्रयोग करते थे।
रिजवी कहना है कि ‘मैंने सुप्रीम कोर्ट से चांद-सितारों वाले हरे झंडे पर तत्काल प्रतिबंध लगाने की मांग की है, क्योंकि ये झंडा पाकिस्तान और मुस्लिम लीग के झंडे से मिलता-जुलता है।’ उन्होंने कहा कि आधे चांद और तारे के निशान वाला यह हरा झंडा 1906 में आजादी से पहले पुरानी मुस्लिम लीग के वकार उल माली और मोहम्मद अली जिन्ना ने इजाद किया था। ये मुस्लिम लीग 15 अगस्त 1947 को खतम हो गई और उसके बाद पाकिस्तान में इसकी उत्तराधिकारी नई मुस्लिम लीग पार्टी बनी जिसका नाम पाकिस्तान मुस्लिम लीग और पाकिस्तान मुस्लिम लीग (कायदे आजम) है। ये पार्टी पाकिस्तान में इस झंडे को अपने प्रतीक चिन्ह की तरह इस्तेमाल करती है।
दूसरी ओर भारत में मुसलमान भी इस्लामिक झंडे की तरह इसका इस्तेमाल करते हैं। इस झंडे को मुस्लिम बहुल इलाके में फहराया जाता है जिससे कई बार हिंदू और मुसलमानों के बीच सौहर्द बिगड़ता है। याचिकाकर्ता का कहना है कि हरे झंडे में आधा चांद और तारा कभी भी इस्लामिक प्रैक्टिस का हिस्सा नहीं रहा और न ही इसकी इस्लाम धर्म में कोई महत्व है।

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