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क्यों मजबूर हुए एथिस्ट सीताराम येचूरी कलश यात्रा के लिए, जानिए इस वायरल तस्वीर के पीछे का सच

कम्युनिस्ट पार्टियों द्वारा केरल में “रामायण माह” मनाने के फैसले के कुछ दिन बाद ही सीपीआई (एम) के राष्ट्रीय महासचिव सीताराम येचूरी की एक ऐसी तस्वीर सोशल मीडिया पर वायरल हो रही है जिसमें वे सर पर फूलों से भरा हुआ कलश उठा कर एक धार्मिक अनुष्ठान में भाग ले रहे हैं। दरअसल यह तस्वीर बोनालु समारोह की है और खुद को एथिस्ट (ईश्वर को न मानने वाला) कहने वाले सीताराम येचूरी महाकाली की पुजा में व्यस्त हैं।
आपको बता दें कि कम्युनिस्ट पार्टी (मा) कार्ल मार्क्स की विचारधारा पर चलती है और मार्क्स का कहना था कि धर्म अफीम के समान है। आखिर क्या कारण है कि धर्म, धार्मिक अनुष्ठानों और विशेषकर हिन्दू धर्म का विरोध करने वाली कम्युनिस्ट पार्टी को भी रामायण माह मनाने और इसके महासचिव को सार्वजनिक रूप से महाकाली की पूजा में भाग लेने पर मजबूर कर दिया?
दरअसल सीताराम येचूरी हैदराबाद में वामपंथी दलों की उदरवादी शाखा “बहुजन लेफ्ट फ्रंट (बीएलएफ़)” द्वारा 15 जुलाई को आयोजित एक बोनालु समारोह में भाग लेने आए थे। समारोह में कंधे पर वामपंथी पार्टी का पट्टा पहने सीताराम येचूरी ने अचानक कलश यात्रा में भाग लेने की ठानी और मौके पर मौजूद मीडिया ने उनकी तस्वीरें खींच कर वायरल कर दीं।
ऐसा पहली बार नहीं हो रहा है जब वामपंथी पार्टियों का कोई बड़ा नेता सार्वजनिक रूप से किसी धार्मिक अनुष्ठान में भाग ले रहा है। चालीस के दशक में भी अविभाजित कम्युनिस्ट पार्टी के तत्कालीन महासचिव पीसी जोशी ने भी आदेश दिया था कि यदि कामरेड भारत को समझना चाहते हैं तो उन्हें रामायण और गीता को पढ़ना होगा। लेकिन उनकी इस सम्यक विचारधारा का पार्टी के भीतर काफी विरोध हुआ था और पार्टी ने उन्हें जल्द ही साइडलाईन कर दिया था।
सच तो यह है कि वामपंथी दल भी वोट की राजनीति के चलते धर्म और धर्मगुरुओं का सहारा लेने को मजबूर हुए हैं। इस्लाम और भारत में मुसलमानों के प्रति वामपंथी दलों की हमदर्दी भी कोई नई बात नहीं है। मगर ऐसे अनेक अवसर आए हैं जब खाँटी के कम्युनिस्ट नेताओं की हिन्दू रीति रिवाजों के प्रति आस्था जगजाहिर हुई है। सीपीआई (एम) के सबसे लंबे समय तक महासचिव रहे और दक्षिण में वामपंथियों के सबसे बड़े नेता ईएमएस नंबुदरिपाद का धर्म को लेकर झुकाव जग जाहिर है। ईएमएस हिन्दू धर्म के कट्टर विरोधी थे और उन्होंने हिन्दू धर्म और धर्मगुरुओं के विरुद्ध कई लेख लिखे थे, लेकिन मुसलमानों और इस्लाम के प्रति उनका स्नेह किसी से छुपा नहीं था। उनका हिन्दू धर्म के प्रति विरोध इस बात से जाहिर होता है कि उनके कार्यकाल में केरल के पार्टी कार्यकर्ताओं को मंदिर जाने तक पर पाबंदी थी।
लेकिन क्या आप जानते हैं कि नंबुदरिपाद की पत्नी आर्या अनंतरंजम एक बहुत ही धार्मिक महिला थीं और लगभग हर रोज़ भगवान के दर्शन के लिए मंदिर जाया करती थीं। जब पार्टी कार्यकर्ताओं ने नंबुदरिपाद से उनकी पत्नी के हिन्दू धर्म के प्रति आस्था के विषय में सवाल उठाने शुरू किए तो उन्होंने एक नया कानून बनाया था कि कम्युनिस्टों के मंदिर जाने या पूजा-पाठ में भाग लेने पर पाबंदी है मगर उनके पति, पत्नी, बच्चे या परिजन पूजा-पाठ करना चाहें तो उस पर पार्टी को कोई आपत्ति नहीं होगी।
वर्तमान में आते हुए अगर हम केरल की कम्यूनिस्ट पार्टी की बात करें तो यहाँ आज (17 जुलाई) से पार्टी से जुड़ा एक सामाजिक संगठन “संस्कृत संघ” रामायण माह का आयोजन कर रहा है। कहने को इस संघ का प्रत्यक्ष रूप से कम्युनिस्ट पार्टी से कोई संबंध नहीं है, मगर इसके सभी सदस्य और पदाधिकारी कम्युनिस्ट पार्टी (एम) के सदस्य भी हैं। केरल में राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ और भारतीय जनता पार्टी के बढ़ते हुए वर्चस्व से घबरा कर जब कयुनिस्टो को हिन्दू वोटों की अहमियत महसूस हुई तो उसने “संस्कृत संघ” का सहारा लिया और अब रामायण माह को सफल बनाने में जुटे हुए हैं। इस आयोजन में केरल कम्युनिस्ट पार्टी की प्रदेश समिति के सदस्य शिवदासन प्रमुख भूमिका निभा रहे हैं।

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