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बार्डर पर लगने वाले जाम से लोग परेशान, सर्वोच्च न्यायालय के आदेशों का भी होता है उल्लंघन

दिल्ली बार्डर पर लगने वाले जाम से एनसीआर में रहने वाला हर व्यक्ति परिचित है। इस जाम का एक प्रमुख कारण बॉर्डर पर 124 स्थानों पर बने टोल पॉइंट्स हैं। यहाँ दिन भर दिल्ली से आती-जाती टैक्सियों के कारण जाम लगता है तो रात 11 बजे भारी वाहनों का प्रवेश खुलने के बाद तो स्थिति और भी विकट हो जाती है क्योंकि इस समय यूपी-हरियाणा बार्डर के आसपास खड़े 70 हज़ार से 1 लाख ट्रक सड़क पर आ जाते हैं।
इस जाम के लिए जिम्मेदार है साउथ दिल्ली म्युनिसिपल कार्पोरेशन (एसडीएमसी) जिसे सभी एंट्री पॉइंट्स से दिल्ली में घुसने वाले कमर्शियल वाहनों से टैक्स इकट्ठा करने के लिए नोडल एजेंसी बनाया गया है। एसडीएमसी ने फरवरी 2016 से टैक्स एकत्र करने का काम दिल्ली की एक निजी कंपनी डीईपी टोल एलएलपी को दिया है जो हर साल 560 करोड़ रुपए देती है। बॉर्डर पर आपको हाथों में लाठी लिए बाउंसर नुमा लड़के दिखाई देते हैं, वे इसी कंपनी के कर्मचारी हैं। गुजरने वाले कमर्शियल वाहनों से छोटी-छोटी बात पर लड़ाई-झगड़ा करना इन बाउंसरों के लिए आम बात है।
इस कंपनी को ही सुप्रीम कोर्ट के आदेश से लिए जाने वाला एनवायरनमेंट कंपनसेशन चार्ज (ईसीसी) एकत्र करने का काम भी मिला हुआ है। वाहन के भार और टायरों की संख्या पर आधारित एंट्री टैक्स 100 रुपए से लेकर 1,200 रुपए तक है जबकि चार वर्गों में लिया जाने वाला ग्रीन टैक्स 700 रुपए से लेकर 1200 रुपए के बीच है। इन टोल बूथों पर लेन तोड़कर चलते ट्रकों, टैक्स इकट्ठा में लोगों से वाहन चालकों से होता झगड़ा और टैक्स कम कराने के लिए कंपनी के कर्मचारियों से होते सौदेबाजी के चलते इसी भी गाड़ी को बार्डर पार करने में दस से बीस मिनट का समय लगता है। इस दौरान प्राइवेट गाड़ियों में बैठे लोग अपनी बारी का इंतजार करते रहते हैं।
हमारा गाजियाबाद टीम ने जब गाजीपुर बार्डर का दौरा किया तो पाया कि यहाँ लगने वाले जाम की स्थिति बहुत ही खराब है। बार्डर से एक किलोमीटर पहले ही ट्रकों की कतारें शुरू हो जाती है। यहीं पर आपको हाथों में पीवीसी पाइप लिए टोल कलेक्शन करने वाली कंपनी के कर्मचारी ट्रक चालकों से लड़ते-झगड़ते भी मिल जाएंगे। हालांकि सर्वोच्च न्यायालय के आदेशानुसार भारी वाहनों को सड़क पर सबसे लेफ्ट लेन में ही चलने की इजाजत है, मगर यहाँ ट्रक आपको किसी भी लेन में चलते नज़र आएंगे। हमने इस संबंध में जब वहाँ तैनात यूपी पुलिस के सिपाहियों से बातचीत की तो उन्होंने बार्डर पर यातायात संभालने की ज़िम्मेदारी टोल कलेक्ट करने वाली कंपनी की बताकर अपना पल्ला झाड़ लिया।
राष्ट्रीय हरित अभिकरण (एनजीटी) के आदेशों के अनुसार दिल्ली में केवल उन्हीं ट्रकों की अनुमति है जिन्हें अपना माल दिल्ली में लाने ले जाने हों। मतलब अगर किसी ट्रक को यूपी से हरियाणा जाना हो तो उसे दिल्ली में प्रवेश की अनुमति नहीं है। लेकिन हमने पाया कि टोल टैक्स एकत्र करने वाली कंपनी के कर्मचारी ट्रक चालकों से पैसे लेकर उन्हें वाया दिल्ली जाने की इजाजत भी दे देते हैं। हालांकि यह सारी घटनाएँ बार्डर पर लगे सीसीटीवी कैमरों में लगातार दर्ज होती रहती हैं, मगर आज तक न तो एजेंसी और न ही यहाँ तैनात दिल्ली और यूपी पुलिस के कर्मचारियों पर कोई कार्यवाही हुई है। मेरठ से बहादुरगढ़ जा रहे एक ट्रक ड्राइवर ने बताया कि हर चक्कर के 500 रुपए रिश्वत देने में उन्हें कोई परेशानी नहीं होती है, क्योंकि अगर उन्हें बाहर-बाहर जाना पड़े तो समय और ईंधन दोनों ही अधिक लगता है।
सुप्रीम कोर्ट ने जब दिल्ली में प्रवेश करने वाले कमर्शियल वाहनों से ग्रीन टैक्स वसूलने का आदेश दिया था, तो उसका एक उद्देश्य वाहनों के धुएँ से पर्यावरण को होने वाले नुकसान कम करना भी था। मगर बार्डर पर लगने वाले हर समय के जाम से किस उद्देश्य की पूर्ति हो रही है, यह समझना आम जनता की सोच से बाहर की बात है। अगर केंद्र और राज्यों की सरकारें सर्वोच्च अदालत के आदेश और पर्यावरण संरक्षण के प्रति गंभीर हैं तो उन्हें बार्डर पर यातायात व्यवस्था को बेहतर करना ही होगा।

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