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नहीं रहा दक्षिण की राजनीति का पितामह, 94 वर्ष की उम्र में एम करुणानिधि ने ली अंतिम सांस

14 साल की उम्र में राजनीति गलियारे में कदम रखने वाले एम करुणानिधि (94) का मंगलवार शाम चेन्नई में निधन हो गया। 5 बार तमिलनाडु के मुख्यमंत्री रहे वे ऐसे नेता थे जो 80 साल के अपने राजनीतिक करियर में कोई चुनाव नहीं हारे। वे उस दौर में राजनीति में सक्रिय हो गए थे, जब पेरियार द्रविड़ आंदोलन के पुरोधा थे। अन्नादुरई हिंदी विरोधी आंदोलन के जरिए चर्चा में रहते थे और तमिल फिल्मों के सुपरस्टार एमजी रामचंद्रन द्रविड़ मुनेत्र कषगम (द्रमुक) से जुड़ चुके थे।

करुणानिधि का जन्म 3 जून 1924 को तिरुवरूर जिले के तिरुकुवालाई गांव में हुआ था। उन्होंने तीन शादियां कीं। पहली पत्नी का नाम पद्मावती, दूसरी का दयालु और तीसरी का रजति है। इनमें से पद्मावती का देहांत हो चुका है। उनके चार बेटे एमके मुथु, एमके अलागिरी, एमके स्टालिन, एमके तमिलारासु और दो बेटियां एमके सेल्वी और कनिमोझी हैं। करुणानिधि 10 फरवरी 1969 से 4 जनवरी 1971, 15 मार्च 1971 से 31 जनवरी 1976, 27 जनवरी 1989 से 30 जनवरी 1991, 13 मई 1996 से 13 मई 2001, 13 मई 2006 से 15 मई 2011 तक तमिलनाडु के मुख्यमंत्री रहे। उनके नाम सबसे ज्यादा 13 बार विधायक बनने का रिकॉर्ड भी है।

देश के तमाम बड़े नेताओं और प्रधानमंत्री ने करुणानिधि के निधन पर गहरा शोक जताया है। करूणानिधि का रक्तचाप कम होने के बाद 28 जुलाई को उन्हें गोपालपुरम स्थित आवास से कावेरी अस्पताल भेजा गया था। पहले वह वार्ड में भर्ती थे, बाद में हालत बिगड़ने पर उन्हें आईसीयू में भर्ती किया गया। बीमारी से जूझ रहे करुणानिधि का हाल चाल लेने के लिए राष्ट्रपति से लेकर प्रधानमंत्री और कांग्रेस अध्यक्ष से लेकर उपराष्ट्रपति तक अस्पताल पहुंचे थे।

दक्षिण भारत में हिंदी विरोध पर मुखर होते हुए एम. करुणानिधि हिंदी हटाओ आंदोलन में शामिल हो गए। 1937 में स्कूलों में हिंदी को अनिवार्य करने पर बड़ी संख्या में युवाओं ने विरोध किया, उनमें से करुणानिधि एक थे। इसके बाद उन्होंने तमिल भाषा को हथियार बनाया और तमिल में भी नाटक और स्क्रिप्ट लिखने लगे।

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