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राजीव को झूठी श्रद्धांजलि देने वालों पर भड़के सुशील मोदी, जानिए ट्वीट कर राहुल को क्यों लताड़ा

बिहार के उप-मुख्‍यमंत्री सुशील कुमार मोदी ने राजीव गांधी को श्रद्धांजलि देने वालों को फटकार लगाई है। उन्‍होंने मंगलवार (21 अगस्‍त) को ट्वीट कर कहा कि – राजीव गांधी को श्रद्धांजलि देने वालों ने लाखों धुसपैठियों को वापस भेजने और असम समझौता लागू करने के मुद्दे पर चुप्पी क्यों साध ली? 1984 के सिख विरोधी दंगों में लोगों को जिंदा जलाने की गुनहगार कांग्रेस किस मुंह से सहिष्णुता पर उपदेश दे रही है? उन्हें अर्थव्यवस्था को विकास की सबसे तेज रफ्तार देने वाला यह दौर तकलीफदेह क्यों लगता है? उदीयमान भारत नहीं, कांग्रेस राहुल गाँधी के कारण सबसे तकलीफदेह दौर से गुजर रही है।

सुशील मोदी ने एक ट्वीट से कई निशाने साधे हैं। इसकी वजह है कि कांग्रेस लगातार एनआरसी का विरोध कर रही है। वह अर्थव्‍यवस्‍था और सहिष्‍णुता आदि के मुद्दे पर बोल कर भाजपा सरकार को घेरने की कोशिश कर रही है।

उन्‍हों ने राजीव गांधी के पुत्र राहुल गांधी पर तीखा हमला बोलते हुए ट्विट किया कि उदयीमान भारत नहीं, कांग्रेस राहुल गांधी के कारण सबसे तकलीफदेह स्थिति से गुजर रही है। क्‍योंकि राजीव गांधी ने अवैध बांग्लादेशियों को असम और देश से बाहर करने का आश्वासन दिया था। तत्‍कालीन प्रधानमंत्री राजीव गांधी ने 1980 के दौरान असम गण परिषद और अन्य आंदोलनकारी नेताओं के बीच समझौता किया गया था कि 25 मार्च 1971 तक असम में आकर बसे बांग्लादेशियों को नागरिकता दी जाएगी। इस तय समय के बाद आए बाकी लोगों को राज्य से बाहर कर दिया जाएगा। असम में नेशनल रजिस्टर ऑफ सिटिजन्स (एनआरसी) का फाइनल ड्राफ्ट आने के बाद से कांग्रेस की ओर से राजनीति पर करारा हमला बोलते हुए सुशील मोदी ने यह ट्वीट किया। क्‍योंकि एनआरसी की पहली लिस्ट में करीब 40 लाख लोगों के नाम शामिल नहीं हैं। 1980 के दौरान असम में बांग्लादेशी घुसपैठियों का मुद्दा हावी था। स्‍थानीय लोग घुसपैठ से परेशान थे। इस घुसपैठ से वहां की अर्थव्‍यवस्‍था और सामाजिक ताने बाने पर भी गंभीर असर पड़ा था। नतीज लोग आंदोलन पर उतारू हो गए थे। यह स्थिति तब थी जब पाकिस्तान से अलग होकर बांग्लादेश बना था। असम में बांग्लादेशी घुसपैठियों का अवैध प्रवेश चल रहा था। यह घुसपैठ इतनी ज्‍यादा हो चुकी थी कि वहां स्थिति तनावपूर्ण हो गई थी। हिंसा आदि के बाद राज्‍य की राजनीति ने जब जोर पकड़ा और सिटीजनशिप रजिस्टर अपडेट करने को लेकर आंदोलन शुरू हुआ। इसका इसका नेतृत्व अखिल असम छात्र संघ (आसू) और असम गण परिषद ने किया कर रहा था।

इस आंदोलन की आंच राष्ट्रीय राजनीति तक भी पहुंच गई और 1985 में केंद्र की तत्कालीन राजीव गांधी सरकार और आंदोलनकारियों के बीच समझौता किया था। समझौते के तहत राजीव गांधी ने लोगों से यह वादा किया था कि वह अवैध तरीके से बसे बांग्‍लादेशियों देश से बाहर निकालेंगे।

क्‍या कहते हैं आंकडे़

दरअसल असम में पिछले कुछ दशकों में मुस्लिम और मतदाताओं की संख्या जिस प्रकार अप्रत्याशित रूप से बड़ी है उसे लेकर लंबे समय से विवाद हो रहा है। आंकड़ों पर नजर डाली जाए तो तस्‍वीर चौंकाने वाली उभर कर आती है। सन 1971 से 1991 के बीच ही प्रदेश में मतदाताओं की संख्या में 89 फीसद और 1991 से 2011 के बीच 53 फीसद की बढ़ोतरी दर्ज की गई थी। वहीं 1951 से लेकर अब तक असम की जनसंख्या में 4 गुना से भी अधिक की बढ़ोतरी देखी गई। साल 1951 में प्रदेश की आबादी 80.3 लाख थी, जो अब बढ़कर करीब 3.30 करोड़ हो चुकी है। आबादी बढ़ने की यह रफ्तार 1971 के बाद से काफी तेज है। 1971 तक प्रदेश में कुल 6268273 मतदाता थे लेकिन 1971 से 2011 के बीच करीब सवा करोड़ मतदाता अचानक से जुड़ गए और 2011 तक मतदाताओं की संख्या 18188269 के आंकड़े को भी पार कर गई। ढुबरी, मोरीगांव, गोलपाड़ा, दर्रांग, नोगोंग, करीमगंज, हैलाकंडी, बरपेटा, बोगलगांव, कछार, धेमाजी, कामरूप, कर्बी अंगलांग, लखीमपुर आदि राज्यों के 14 जिले तो ऐसे हैं, जहां जनसंख्या में वृद्धि का औसत राज्य की औसत वृद्धि दर से बहुत ज्यादा है। प्रदेश में मतदाताओं तथा आबादी के तेजी से बढ़ने का एक बड़ा कारण अवैध रूप से भारत आए बांग्लादेशी नागरिक मानें जा रहे हैं। राज्य के दर्जन भर जिलों में मुस्लिम आबादी 20 फीसद से ज्‍यादा है। 126 विधानसभा सीटों में से 40 पर बांग्ला भाषी मुस्लिम मतदाताओं की तादाद इतनी ज्यादा है कि वो चुनाव प्रक्रिया को प्रभावित करने कर हैं। खास बात ये भी है कि हिंदी भाषा बोलने वालों पर हमले और दो दर्जन से अधिक सीटों पर मुस्लिम मतदाता निर्णायक भूमिका में हैं। धुबरी, बरपेटा, करीमगंज, मंगलदोई, नोगोंग, सिलचर इत्यादि 14 में से 6 लोकसभा सीटें ऐसी हैं, जहां मुस्लिम तथा अप्रवासी मतदाताओं का वर्चस्व है। जहां हिंदू अल्‍पसंख्‍य जैसी स्थिति में हैं।

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