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पैदा करने वाली माँ ने फेंक दिया था कुढ़े के ढेर में, 27 साल की अनब्याही लड़की बनी बच्चियों की माँ

वह पढ़ने के लिए लड़ी, शादी न करने के लिए लड़ी, डॉक्‍टर बनने के लिए लड़ी और फिर दो बच्चियों की बिनब्‍याही मां बनने के लिए लड़ी। पढ़िए कहानी बिना शादी दो लड़कियों को गोद लेने वाली डॉ. कोमल यादव की उन्हीं की जबानी –
मैं उस दिन को भूल नहीं सकती। आज लगता है कि वो मेरी जिंदगी का सबसे खुशी का दिन है, लेकिन उस दिन ऐसा नहीं लगा था। उस दिन रविवार था और मैं घर पर थी। हॉस्पिटल से फोन आया, जल्‍दी आ जाइए। एक बच्‍चा पेट में फंस गया है, इमर्जेंसी है। मैं हॉस्पिटल भागी। लेबर रूम में एक बहुत कमजोर, दुबली-पतली सी औरत पेट पकड़कर चीख रही थी। उसने टेरीकॉट की साड़ी पहनी थी, जिस पर जगह-जगह खून लगा हुआ था। दर्द से उसकी आंखें चौड़ी हो गई थीं, जबड़े खिंच गए थे। वो काफी मुश्किल डिलिवरी थी। बड़ी मुश्किल से बच्‍चा बाहर आया, लड़की पैदा हुई थी।
मैं लेबर रूम से बाहर आई और हाथ साफ कर ही रही थी, तभी अस्‍पताल का एक कर्मचारी एक और नवजात बच्‍ची को लेकर आया। वो अस्‍पताल के बाहर एक कूड़े के ढेर पर पड़ी मिली थी। अस्‍पताल के लोगों का कहना था कि जब वो औरत आई तो ये बच्‍ची भी उसके साथ थी। उसने शायद उसे बाहर ही छोड़ दिया था। हम कुछ समझ पाते, इससे पहले मैं वापस रूम में गई तो देखा कि अभी-अभी जचगी से उठी औरत जाने को तैयार खड़ी थी। हमने बच्‍चे को एक कपड़े में लपेटकर उसके बगल में लिटाया था। लेकिन औरत ने बच्‍ची का कपड़ा खोलकर उसे बड़ी लापरवाही से एक किनारे फेंक दिया था। बच्‍ची गला फाड़कर रो रही थी।
सबसे पहले तो मैंने बच्‍ची को वहां से हटाया। मुझे लगा कि वो औरत कहीं उसे मार ही न दे। वो किसी हाल में बच्‍ची को अपने साथ ले जाने को तैयार नहीं थी। उसने कहा कि वो विधवा है और उसकी पहले से तीन बेटियां हैं। मैं दो और बेटियों का बोझ नहीं उठा सकती। अगर मैं इसे ले गई तो लोग ही इसे मार डालेंगे। उसने कहा था कि वो विधवा है। मुझे आज तक समझ नहीं आया कि वो गरीबी और लड़की होने की वजह से बच्चियों को ले जाने को तैयार नहीं हुई या इसलिए कि वो विधवा होने के बावजूद मां बनी थी।
वो बोली, इन बच्चियों को फेंक दो, मार दो, अनाथाश्रम में दे दो, जो जी में आए करो, लेकिन मुझे ये नहीं चाहिए। हम दोनों बच्चियों को संभालने की आपाधापी में थे। इसी बीच वो औरत पता नहीं कब उठकर चली गई। मैंने उसे दोबारा कभी नहीं देखा।
दूसरी बच्‍ची, जिसे अस्‍पताल के दरवाजे से उठाकर लाया गया था, उसकी सांस बंद हो रही थी। उसकी हालत खराब थी। मैंने फोन करके पेडीट्रीशियन को बुलाने को कहा। उन्‍होंने पूछा, इसकी फीस कौन देगा। मैंने कहा, मैं दूंगी। अस्‍पताल के रजिस्‍टर में बच्‍चों की मां का नाम लिखा जाना था। मेरे मुंह से निकला, मेरा नाम लिख दो। इस तरह रजिस्‍टर में लिखा गया- “मां- डॉ। कोमल।” उस दिन से मैं उन बच्चियों की मां हो गई।
उस लम्‍हे को बयां करना मुश्किल है। मैंने फैसला ले तो लिया था, लेकिन तब तक भी मुझे पता नहीं था कि इसके मायने क्‍या हैं। जब रजिस्‍टर में मेरा नाम लिखा गया, तब भी ये तय नहीं था कि इन बच्चियों को मैं ही पालूंगी। मैं सिर्फ उस क्षण में थी और उस वक्‍त उन बच्चियों की जिंदगी बचाना ही मकसद था।
मैंने अपनी बहन को फोन किया। वो भी उन दिनों फर्रुखाबाद में ही रहकर पढ़ाई कर रही थी। वो आई। उस वक्‍त मेरे अकाउंट में सिर्फ 10,000 रु। थे। मैंने बहन को पकड़ाए और बच्‍चों का सामान खरीदने को बोला- दूध की बोतल, कपड़े, नैपी, साबुन, तेल। घर में नया मेहमान आने वाला होता है तो कितनी तैयारियां होती हैं, कितनी खुशी मनाई जाती है। उन फूल सी बच्चियों का चेहरा देखकर मन मानो डूबा जा रहा था। ये कैसे इस दुनिया में आईं कि जिसने पैदा किया, उसी ने मार देना चाहा। मां के सीने की गर्माहट की बजाय वो कूड़े के ढेर में पड़ी थीं। मैंने उन्‍हें सीने से लगाया तो मैं रो रही थी। मुझे लगा, मेरी ही बच्‍ची है। मैं उन दोनों को लेकर घर आ गई। मैं उनकी मां हो गई। वो हॉस्पिटल चूंकि मेरी पहचान का था तो वेंटिलेटर को मेरे घर पर ही लगाया गया। एक बच्‍ची 20 दिनों तक वेंटिलेटर पर रही।
तीन दिन बाद मैंने घर फोन करके बताया कि क्‍या हुआ है। मैं 28 साल की अनब्‍याही औरत और मैंने दो बच्चियों को गोद लिया है। इस खबर से घर पर तो हंगामा ही खड़ा हो गया। लगा, जैसे लड़की ने कोई कांड कर दिया हो। पिता गुस्‍से में आगबबूला हो गए। मुझे धमकाने लगे कि वो बच्चियों को मार डालेंगे। मां ने काफी रोना-पीटना मचाया। उन्‍हें लग रहा था कि मैंने उनकी नाक कटा दी है। वो समाज में मुंह दिखाने के लायक नहीं रहे। सब यही सोचेंगे कि ये बच्‍चा इसी ने पैदा किया है, इसका चरित्र खराब है। दुनिया को दिखाने के लिए झूठ बोल रही है। उन्‍होंने हम तीनों को जान से मारने की धमकी दी।
जान से मारने की धमकी मेरे लिए कोई नई बात नहीं थी। पहले भी जब-जब मैंने उनकी बात मानने से इनकार किया, अपने मन से अपना फैसला लेना चाहा, हर बार मुझे यही धमकी मिली। तब भी, जब मैंने बारहवीं पास करने के बाद शादी करने से इनकार किया था, तब भी जब मैं गांव से बाहर जाकर पढ़ना चाहती थी, तब भी जब बीए करने के लिए मिले पैसों से मैंने मेडिकल इंट्रेंस एक्‍जाम की कोचिंग ज्‍वॉइन कर ली थी, तब भी जब दोबारा शादी से मना किया और एमबीबीएस करने का फैसला किया और तब भी जब एमडी करने के लिए मैं अकेले महाराष्‍ट्र, कर्नाटक और जाने कहां-कहां भटकी थी। हर बार उन्‍हें यही लगा कि ये लड़की नाक कटा रही है, हर बार उन्‍हें यही लगा कि मैं उनके घर पर कलंक की तरह हूं। इस बार तो इंतहा ही हो गई थी। एक लड़की जिसकी शादी नहीं हुई थी, उसकी गोद में दो बच्चियां थीं और वो उनकी मां। इस बार मेरी और मेरी बच्चियों की जान को सचमुच खतरा था।
बच्‍चों के जन्‍म के एक महीने बाद मैंने फर्रुखाबाद छोड़ दिया और हमीरपुर, हिमाचल प्रदेश के एक अस्‍पताल में नई नौकरी ज्‍वॉइन कर ली। मेरे वहां जाने से पहले मां एक बार फर्रुखाबाद आईं थीं मुझसे मिलने। आईं तो थीं गुस्‍से में, लेकिन बच्चियों की शक्‍ल देखकर उनका कलेजा पिघल गया। जैसे वो दोनों खिलखिलाकर हंसती, जैसे अपनी नन्‍ही-नन्‍ही हथेलियों से उंगली थाम लेतीं, कोई कैसे उनसे नफरत कर सकता था। उन्‍होंने जिद की कि एक बार गांव चलो। मैं गई, लेकिन थाने में ये रिपोर्ट लिखवाने के बाद कि मैं गांव जा रही हूं। अगर मुझे या मेरी बच्चियों को कुछ होता है तो इसके दोषी मेरे परिवार वाले होंगे।
मैं गांव पहुंची। गालियों और तानों से मेरा स्‍वागत हुआ। पिता, चाचा, ताऊ, मामा, रिश्‍तेदारी के मर्द, सब अपनी मूंछों पर ताव देते मुझे और बच्चियों को मार डालने की धमकी देते रहे। मुझे बहुत गालियां दीं, हाथ तक उठाने की कोशिश की। लेकिन दादी ने जब बच्चियों को देखा तो नफरत नहीं कर पाईं। एक मौसी थीं। वो दोनों बच्चियों को एक साथ अपने सीने से लिपटाए मर्दों के सामने खड़ी हो गईं। बोलीं, इस घर में इससे अच्‍छा काम पहले कभी नहीं हुआ। कोमल इन्‍हें सीने से न लगाती तो क्‍या करती। मरने के लिए छोड़ देती। तुम्‍हारे दरवाजे कोई नवजात बालक छोड़ जाए तो क्‍या तुम उसे मरन वास्‍ते छोड़ दोगे।
मर्दों की सत्‍ता के आगे सिर झुकाने और उसी में अपने जीवन की सुरक्षा ढूंढने वाले घर की औरतें बच्चियों को मार देना चाहती थीं, लेकिन मां, दादी और मौसी उनकी ढाल बन गईं। मैंने घर पर एक बड़ी जंग जीत ली थी।
मैंने इसके पहले बहुत सारे बच्‍चे पैदा करवाए थे, लेकिन पाला एक को भी नहीं था। मुझे मां होने की इन मुश्किलों का अंदाजा नहीं था। हमीरपुर गई तो घर के सारे कामों से लेकर, हॉस्पिटल की नौकरी और बच्चियों की परवरिश तक सब कामों का बोझ मेरे सिर पर आ पड़ा। वहां हाउस हेल्‍प नहीं मिलती। घर के काम भी खुद ही करने पड़ते। मैं पूरी-पूरी रात ढंग से सो नहीं पाती, एक बच्‍ची सोती तो दूसरी रोती। सुबह उन दोनों को तैयार करके अपने साथ अस्‍पताल ले जाती। दोनों काम पर मेरे साथ ही होती थीं। अस्‍पताल के लोग बहुत अच्‍छे थे। कोई न कोई बच्चियों को संभाल लेता। कभी इमर्जेंसी में डिलिवरी के लिए हॉस्पिटल जाना पड़े तो वहां से कोई आ जाता और घर पर बच्चियों को देख लेता।
अब तो वो साढ़े तीन साल की हो गई हैं। मैं काम से थककर घर आती हूं और दोनों मुझे एक नजर देख लेती हैं, आकर सीने से लिपट जाती हैं, लडि़याकर बोलती हैं- मम्‍मा तो मेरी सारी थकान, सारी तकलीफ दूर हो जाती है। मैंने जीवन में जितनी तकलीफें सही, जितना तिरस्‍कार, अनादर झेला, मेरी बेटियां उन सबका जवाब हैं। वो मेरी खुशी, मेरे होने का अर्थ हैं। अब मेरे जीवन का एक ही मकसद है। वो लड़कियां हैं, लेकिन उन्‍हें वैसा जीवन नहीं दूंगी, जैसा मेरे हिस्‍से में आया क्‍योंकि मैं लड़की थी।
हमारा गाज़ियाबाद टीम की ओर से डॉ. कोमल यादव की हिम्मत और लाजवाब जज्बे को सलाम।
(साभार – न्यूज़18)

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