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मुस्लिम लड़कियों में खतने के खात्मे का केस संविधान पीठ को भेजी

भारतीय जनता पार्टी की सरकार के दौरान मुस्लिम महिलाओं और लड़कियों के साथ दशकों से भारत में इस्‍लामिक कानून का हवाला देकर की जा रही कई अमानवियता पर रोक लगाने का प्रयास किया गया है। अब सुप्रीम कोर्ट ने दाऊदी बोहरा मुसलिम समुदाय में प्रचलित बच्चियों के खतना की प्रथा को चुनौती देने वाली याचिका सोमवार 24 सितंबर को पांच न्यायाधीशों वाली एक संविधान पीठ को भेज दी है।

प्रधान न्यायाधीश दीपक मिश्रा, न्यायमूर्ति एएम खानविलकर और न्यायमूर्ति डीवाई चंद्रचूड़ का पीठ दिल्ली के एक वकील द्वारा दायर जनहित याचिका पर सुनवाई कर रहा था। इसमें दाऊदी बोहरा मुसलिम समुदाय की नाबालिग बच्चियों का खतना किए जाने की प्रथा को चुनौती दी गई है।

याचिका में कहा गया, ‘अवैध तरीके से (पांच साल से लेकर उनके किशोरी होने से पहले तक) की बच्चियों का खतना किया जाता है और यह बच्चों के अधिकार पर संयुक्त राष्ट्र के समझौते, मानवाधिकारों पर संरा की सार्वभौमिक घोषणा के खिलाफ है जिसमें भारत भी एक हस्ताक्षरकर्ता है।’

साथ ही इसमें कहा गया कि इस प्रथा के चलते बच्चियों के शरीर में स्थायी रूप से विकृति आ जाती है। दाऊदी बोहरा मुसलिम समुदाय के सदस्यों के एक समूह ने इससे पहले शीर्ष अदालत को बताया था कि बच्चियों का खतना इस्लाम के कुछ संप्रदायों में किया जाता है जिसमें दाऊदी बोहरा समुदाय भी शामिल है और अगर इसकी वैधता का आकलन किया जाता है तो उसे एक बड़ी संविधान पीठ से कराया जाना चाहिए।

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