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आधार योजना निजता का उल्लंघन नहीं करती : सुप्रीम कोर्ट

सुप्रीम कोर्ट ने बुधवार 26 सितंबर को आधार अनिवार्य या नहीं के सवाल और विवाद दोनों ने परदा हटा दिया है। साथ ही कई आशंकाओं को भी खारिज कर दिया कि आधार से नागरिकों के निजता के अधिकार का उल्लंघन होता हैत्र अदालत ने कहा कि नामांकन प्रक्रिया में न्यूनतम आंकड़ा एकत्र किया गया था।

प्रधान न्यायाधीश, न्यायमूर्ति एएम खानविलकर और खुद अपने लिए फैसला लिखते हुए न्यायमूर्ति एके सीकरी ने कहा कि पुतलियों और उंगलियों के निशान के तौर पर बेहद मामूली बायोमेट्रिक आंकड़े जुटाए गए हैं और प्रमाणीकरण की प्रक्रिया इंटरनेट पर सुलभ नहीं है।

उन्होंने याचिकाकर्ताओं के उस प्रतिवेदन से भी सहमति नहीं जताई कि आधार परियोजना जुटाई गई, संरक्षित और साझा की गई जनसांख्यिकी और बायोमेट्रिक सूचना के संदर्भ में निजता के अधिकार का उल्लंघन करती है क्योंकि ऐसा कोई कानून नहीं है जो इन कार्रवाई के लिए अधिकृत करे। सर्वोच्च अदालत ने कहा कि आधार अधिनियम गरीब और वंचित व्यक्तियों के लिए बेहतर जिंदगी जीने और स्वतंत्रता को वास्तव में सुरक्षित करने की कोशिश करता है।

नंदन नीलेकनी ने फैसले को बताया ऐतिहासिक
आधार को आकार देने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाने वाले नंदन नीलेकणि ने कहा कि आधार की संवैधानिक वैधता पर निर्णय ‘ऐतिहासिक घटना’ है क्योंकि इससे लोगों को अपने आंकड़े पर नियंत्रण में मदद मिलेगी।

भारतीय विशिष्ट पहचान प्राधिकरण (यूआइडीएआइ) के पूर्व चेयरमैन ने ट्विटर पर लिखा है कि फैसले ने 12 अंकों की पहचान संख्या के मूल सिद्धांतों को वैध ठहराया है जो देश के विकास लक्ष्यों को हासिल करने के लिए महत्त्वपूर्ण है। उन्होंने कहा, ‘परियोजना के केंद्र में लोगों के होने की फिर से मान्यता मिली है। इस निर्णय से लोगों को नया अधिकार मिला है। उन्हें अपने आंकड़े पर नियंत्रण को लेकर मदद मिलेगी।’

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