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नहीं बैठे सरकार के भरोसे, इन दो लोगों का उद्देश्य है खुद सड़कों को गड्ढामुक्त करना

मुंबई के 48 वर्षीय दादाराव बिल्होरे और उत्तर प्रदेश ललितपुर के रहने वाले 79 वर्षीय रूपनारायण निरंजन के जीवन का उद्देश्य है सड़कों के गड्ढे भरना है। उनके जीवन में हुई एक घटना के बाद उन लोगों ने अपने आस-पड़ोस की सड़कों पर बने गड्ढों को भरना शुरू किया। उन्हें जहां भी सड़क पर एक भी गड्ढा नजर आता है वे उसे भरने में जुट जाते हैं।
गड्ढे के चलते हुए हादसे में खोया था बेटा
28 जुलाई 2015 को दादाराव के 16 वर्षीय बेटे प्रकाश का सड़क के एक गड्ढे के कारण ऐक्सिडेंट हुआ और उसकी मृत्यु हो गई थी। पंद्रह दिन के अंदर दादाराव ने खबरें पढ़ीं कि इसी तरह गड्ढों के कारण दो अन्य लोगों की मौत हो गई। दादाराव ने बताया कि जिस गड्ढे में ऐक्सिडेंट के कारण उनके बेटे की मौत हुई वह कई महीनों से ऐसे ही पड़ा था। उन्होंने फैसला लिया कि वह सड़कों के गड्ढे भरेंगे। इसकी शुरुआत उन्होंने अपनी सब्जी और फलों के स्टोर के पास से की। उन्होंने कहा कि वह गड्ढे भरकर दूसरों की जान बचाते हैं ताकि अपने बेटे को श्रद्धांजलि दे सकें।
120 लोगों ने मिलकर भरे थे 100 गड्ढे
वह दोपहर और अपनी साप्ताहिक छुट्टी के दिन सड़कों के गड्ढे भरते हैं। गड्ढों को भरने के लिए वह किसी भी कंस्ट्रक्शन साइट पर जाकर वहां से मलबा भरकर लाते हैं। इस साल प्रकाश की तीसरी बरसी पर 120 लोग दादाराव के साथ इस अच्छे काम में जुटे और जुहू-विक्रोली लिंक रोड के 100 गड्ढे भरे। दादाराव कहते हैं कि जरा सोचिए अगर सारे मुंबई वाले एक साथ इस नेक काम में जुट जाएं तो मुंबई की किसी भी सड़क में एक भी गड्ढा नहीं बचेगा।
सड़कें करते हैं साफ, भरते हैं गड्ढे
वहीं दूसरी ओर बुंदेलखंड के ललितपुर में रूपनारायण निरंजन की सुबह सड़कों को साफ करने और सड़कों के गड्ढे भरने से होती है। वह ऐसा वर्ष 2000 से कर रहे हैं। रूपनारायण स्कूल टीचर से रिटायर हुए हैं। उन्हें 1999 में राष्ट्रपति से राष्ट्रीय अवॉर्ड भी मिल चुका है। रूपनारायण ने बताया कि जब वह स्कूल टीचर थे तो स्कूल के छात्र गड्ढों में गिर जाते। प्रशासन कोई सुनवाई नहीं करता तो उन्होंने खुद गड्ढे भरने का बीड़ा उठाया। इतना ही नहीं उन्होंने अपने वेतन के रुपयों से स्कूल में पीने के पानी की व्यवस्था कराई और टॉइलट बनवाया।
फावड़ा, झाड़ू और हाथ गाड़ी लेकर निकलते हैं रोज
रिटायरमेंट के बाद से वह रोज सुबह हाथ वाली गाड़ी, फावड़ा और झाड़ू लेकर निकलते हैं। जहां उन्हें सड़क पर गड्ढा नजर आता है उसे वह भरते हैं। वह कहते हैं कि उन्हें हर महीने सरकार से पेंशन मिलती है। यह पेंशन प्रतिदिन के हिसाब से लगभग 600-700 रुपये होती है। वह मानते हैं कि इन रुपयों के बदले वह टैक्स पेयर्स को कुछ सेवा दे सकें। इतना ही नहीं वह मानते हैं कि यह उनका एक तरह का वर्कआउट भी है जो उन्हें संतुष्टि देता है और फिट रखता है।
वह बंजर जमीन पर पौधे लगाकर बगीचा बनाते हैं। बच्चों को पढ़ाने में समय बिताते हैं। इतना ही नहीं उन्होंने अपने घर के पास बनी नहर की सफाई का जिम्मा भी ले रखा है। वह रोज इस नहर के पास जाकर इसमें पड़े कूड़े को हटाते हैं।

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