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यूपी रेरा के अधिकारी दे रहे आरटीआई का गलत जवाब

उत्तर प्रदेश में ‘रियल एस्टेट नियामक प्राधिकरण’ रेरा का गठन हुए लगभग एक साल से ज्यादा हो गया है। इस दौरान कई परेशान खरीदारों ने रेरा में बिल्डरों की अनियमितता के खिलाफ शिकायत भी की। रेरा के कई निर्णयों में बिल्डरों को खरीदार के पैसे लौटाने के निर्णय से खरीदारों के चेहरे पर खुशी भी लौट आयी लेकिन क्या यह कहानी यही खत्म हो जाती है? बिल्कुल नहीं क्योंकि, रेरा द्वारा दिये गए एक ‘सूचना का अधिकार अधिनियम’ आरटीआई के जबाब से यही प्रतीत होता है कि रेरा के अधिकारी अपने प्राधिकरण द्वारा दिये गए फैसलों को लेकर बिल्कुल भी सजग नही है।

दरअसल लोनी गाज़ियाबाद के निवासी आरटीआई कार्यकर्ता विनोद कुमार ने यूपी रेरा से धन वापसी की निर्णय पाने वाले कुछ शिकायतकर्ताओं के अनुरोध पर यूपी रेरा में रजिस्टर्ड केसों की जानकारी के लिए एक आरटीआई डाली थी। जिसमें अभी तक दर्ज कुल केसों व उनमें से धनवापसी के निर्णयों आदि की जानकारी माँगी गई थी। जिसका जबाब यूपी रेरा के जनसूचना अधिकारी रजनीश शर्मा द्वारा एक अक्टूबर को भेज दिया गया। लेकिन इस जबाब में दी गई जानकारी की शिकायतकर्ताओं ने जब जांच की तो यह जानकारी गलत पाई गई।

जैसे कि-
1. रेरा में अगस्त 2018 तक दर्ज कुल केसों की संख्या आरटीआई के जबाब में 3150 बताई गई। जबकि 3 जुलाई 2018 को एक प्रतिष्ठित अंग्रेजी राष्ट्रीय समाचार पत्र की जुलाई में छपी रिपोर्ट के अनुसार जुलाई 2018 तक यह संख्या 4300 थी।

2. 31 जुलाई 2018 तक धनवापसी के निर्णयों की संख्या 31 बताई गई। जबकि शिकायतकर्ताओं के एक समूह के अनुसार, यह संख्या कही अधिक है और इसमें से 40 धनवापसी के निर्णयों की सूची उनके पास तैयार है।

इन तथ्यों के सामने आने के बाद आरटीआई में दिए गए अन्य उत्तरों पर भी संदेह होना स्वभाविक है। इसीलिए अब इस मामले में प्रथम अपीलीय अधिकारी को जनसूचना अधिकारी द्वारा गलत सूचनाएं दिए जाने के सम्बंध में प्रथम अपील भेजी गई है।

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