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बनारस की गलियों में मिल रहे हैं सदियों पुराने मंदिर, जाने और क्या छुपा है इस पौराणिक नगरी में

बनारस या फिर काशी, कहावत है कि भगवान विश्वनाथ की यह नगरी मानव को ही नहीं बल्कि देवताओं को भी प्रिय है। शायद यही वजह है कि देव दीपावली केवल इसी शहर में मनाई जाती है और मां गंगा हजारों दीपकों की रोशनी में नहा जाती हैं। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का संसदीय क्षेत्र होने के कारण अब यह शहर केवल आस्था का ही नहीं बल्कि राजनीति का भी मुख्य आकर्षण बन गया है। बनारस मोदी के ड्रीम प्रॉजेक्ट्स का शहर भी है। आइए, जानते हैं आस्था और विज्ञान के संगम बनारस के खाते में जुड़ी नई विरासत के बारे में…
वर्तमान समय में बनारस में विश्वनाथ कॉरिडोर बनाने का काम चल रहा है ताकि मुख्य शहर की तंग गलियों से ट्रैफिक और जाम का दबाव कम किया जा सके। इस कॉरिडोर के निर्माण के लिए बड़ी संख्या में भवन खरीदकर उनके ध्वस्तीकरण का कार्य हो रहा है और इसी कार्य के दौरान काशी की धरती और गलियों से अमूल्य धरोहर का पिटारा निकल रहा है।
कॉरिडोर के निर्माण के लिए जिन भवनों की खुदाई चल रही है, उनमें प्राचीन मूर्तियों सहित पुरातन कलाओं और शैली में निर्मित मंदिर भी निकल रहे हैं। इन्हीं मंदिरों में से एक में बिल्कुल काशी विश्वनाथ की तरह का शिवलिंग निकला है। हालांकि जानकारों का कहना है कि इस मंदिर का शिवलिंग काशी विश्वनाथ के शिवलिंग से बड़ा है।
स्कंद पुराण के काशी खंड में एक तीर्थ का उल्लेख मिलता है। इस तीर्थ का नाम है, ज्ञानवापी। एक मकान का मलवा हटाए जाने के दौरान एक सुरंगनुमा रास्ता मिला है। इस सुरंग में अंदर जाने के बाद सीढ़ीनुमा ढलान मिले हैं। अब विशेषज्ञ इस जगह की गहन पड़ताल करेंगे। इसके बाद ही कुछ कहा जा सकता है।
खुदाई के दौरान मिल रही इन ऐतिहासिक धरोहरों की संख्या दिन-प्रतिदिन बढ़ती जा रही है। जानकारों का कहना है कि मुगल बादशाह औरंगजेब के काल में हिंदू तीर्थ स्थलों को बुरी तरह खंडित किया गया था। इसी क्रम में काशी विश्वनाथ का मंदिर और वहां आस-पास स्थित धार्मिक स्थलों को भी बर्बाद किया गया। इस दौरान स्थानीय लोगों ने शिवलिंग, छोटे मंदिरों को सुरक्षित रखने के इरादे से इन्हें अपने घरों के भीतर चिनवा लिया। समय ने करवट ली, पीढ़ियां बदल गईं और मुगल काल के पतन के बाद इंदौर की महारानी अहिल्याबाई ने विश्वनाथ मंदिर का जीर्णोद्धार कराया। वे छोटे मंदिर, शिवलिंग और ऐतिहासिक स्थल धरती में ही सिमटे रह गए, जो अब कॉरिडोर के लिए की जा रही खुदाई में सामने आ रहे हैं।
इस मंदिर की खासियत यह है कि इसे विश्वनाथ मंदिर की फोटो कॉपी भी कहा जा सकता है। इस मंदिर की दीवारों पर उकेरी गई मूर्तियां, छत और बरांडे का डिजाइन पूरी तरह विश्वनाथ मंदिर जैसा ही है। इन सभी ऐतिहासिक धरोहरों का पुरातत्व विभाग के अधिकारियों की टीम निरीक्षण करेगी। शिवलिंग, मूर्तियां और देवी-देवताओं के विग्रह देखकर अनुमान लगाया जा रहा है कि इनमें से कुछ विग्रह 11वीं या 12वीं शताब्दी से भी पुराने हो सकते हैं। इन सभी विग्रहों के संरक्षण पर काम किया जा रहा है। पुरातत्व विभाग की टीम इनके बारे में और अधिक जानकारी जुटाने पर कार्य कर रही हैं।

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