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क्या है नागरिकता संशोधन विधेयक ? जानिये, आखिर क्‍यों उबल पड़ा है पूरा पूर्वोत्तर

आज यानी बुधवार को संसद के बजट सत्र का आखिरी दिन है। सरकार आज राज्‍यसभा में यह विधेयक पेश करने वाली है, जिसका असम सहित पूर्वोत्‍तर के राज्‍यों में भारी विरोध हो रहा है। लोकसभा में बिल के मंजूर होते ही पूरा का पूरा पूर्वोत्तर उबल पड़ा, इस विधेयक पर व‍िवाद को इसी से समझा जा सकता है कि इस मुद्दे पर महान संगीतकार भूपेन हजारिका के बेटे तेज हजारिका ने पिता के लिए भारत रत्‍न (मरणोपरांत) स्‍वीकार करने से मना कर दिया है। संशोधन बिल को लेकर असम मणिपुर, सिक्किम, त्रिपुरा जैसे कई राज्यों में अलग-अलग समाजों के संगठन विरोध करने के लिए एकजुट हो गए हैं।
नागरिकता संशोधन विधेयक क्या है?

नागरिकता संशोधन विधेयक, 2016 नागरिकता अधिनियम, 1955 में संशोधन के लिए लाया गया है। इसके तहत अफगानिस्तान, बांग्लादेश या पाकिस्तान से आने वाले हिन्‍दू, सिख, बौद्ध, जैन, पारसी और ईसाई समुदाय के अवैध प्रवासियों को वापस उनके देश भेजने की बजाय उन्‍हें नागरिकता प्रदान करने का प्रावधान है।

विधेयक के प्रावधानों के अनुसार, ऐसे प्रवासी भारत में 6 साल गुजारने के बाद ही नागरिकता के लिए आवेदन दे सकेंगे, जबकि फिलहाल यह अवधि 12 साल की है। विधेयक में हालांकि इन देशों से आने वाले मुस्लिम अवैध प्रवासियों का जिक्र नहीं किया गया है और न ही उक्‍त देशों से आने वाले यहूदी या बहाई समुदाय के लोगों को लेकर भी कुछ उल्‍लेख किया गया है।

नागरिकता संशोधन विधेयक का सबसे ज्‍यादा विरोध असम में हो रहा है। असम सहित पूर्वोत्‍तर में इस संशोधन विधेयक का विरोध करने वालों का कहना है कि इससे क्षेत्र में सामाजिक व जनसांख्यिकीय संरचना बुरी तरह प्रभावित होगी। उन्‍होंने इसे असम समझौता, 1985 के विरुद्ध भी माना है, जो 25 मार्च, 1971 के बाद बांग्‍लादेश से आने वाले अवैध प्रवासियों को वापस उनके देश भेजने की बात करता है। विरोधियों का कहना है कि ऐसे प्रवासियों की पहचान और उन्‍हें वापस उनके देश भेजने के लिए हुए समझौते में किसी भी कीमत पर बदलाव नहीं किया जाना चाहिए।

कौन हैं अवैध प्रवासी?
नागरिकता अधिनियम, 1955 के तहत उन विदेश‍ी नागरिकों को अवैध प्रवासी माना गया है, जो वैध दस्‍तावेजों के बगैर भारत आते हैं और वीजा की अवधि समाप्‍त हो जाने के बावजूद यहां रुके रहते हैं। बीते वर्षों में ऐसे अवैध प्रवासियों के संबंध में कुछ अपवाद भी सामने आए हैं। सितंबर 2015 में अफगानिस्‍तान, बांग्‍लादेश या पाकिस्‍तान से भारत आने वाले वहां के अल्‍पसंख्‍यक समुदाय के कुछ अवैध प्रवासियों को यहां रहने की अनुमति दी गई।

अफगानिस्‍तान, बांग्‍लादेश या पाकिस्‍तान से आए जिन लोगों को सितंबर 2015 में भारत में रहने की अनुमति दी गई, वे ऐसे लोग थे, जो 31 दिसंबर, 2014 से पहले या उस दिन तक भारत पहुंच गए थे। इसी तरह उक्‍त देशों से आए कुछ अन्‍य अवैध प्रवासियों को उनके देश वापस भेजने की बजाय जुलाई 2016 में भी उन्‍हें नागरिकता देने का मुद्दा उठा और विधेयक लोकसभा में पेश किया गया, जिसके बाद से पूर्वोत्तर उबल पड़ा। मोदी सरकार का नागरिकता संशोधन बिल लोकसभा में मंजूर होते ही पूरा का पूरा पूर्वोत्तर उबल पड़ा है। असम में बीजेपी के सहयोगी एजीपी ने सरकार से हाथ खींच लिया। मेघायल और नगालैंड में बीजेपी के समर्थन से चल रही सरकारों के मुख्यमंत्री भी इस बिल को वापस लेने की मांग कर रहे हैं।

 

 

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