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‘चूर चूर नान’ पर किसी एक का अधिकार नहीं हो सकता, यह सार्वजनिक है : दिल्ली हाईकोर्ट

दिल्ली उच्च न्यायालय ने कहा है कि ‘चूर चूर नान’ और ‘अमृतसरी चूर चूर नान’ शब्द पर किसी का एकाधिकार नहीं हो सकता है क्योंकि यह पूरी तरह से सार्वजनिक भाव है। अदालत ने कहा कि ‘चूर चूर’ शब्द का मतलब ‘चूरा किया हुआ’ और ‘चूर चूर नान’ का अर्थ है ‘चूरा किया हुआ नान’ और इससे ज्यादा कुछ नहीं है। यह ट्रेडमार्क हस्ताक्षर लेने के लिए योग्य नहीं है।

दरअसल दिल्ली उच्च न्यायालय में यह याचिका चूर-चूर नान के असली मालिक की दावेदारी को लेकर दाखिल की गई थी। यह याचिका दिल्ली के पहाड़गंज में एक छोटी सी दुकान चलाने वाले प्रवीन कुमार जैन से दाखिल की थी। प्रवीन ने दावा किया था कि उनके पिता ने 1980 में चूर-चूर नान बनाना शुरू किया था। उन्होंने कहा था कि चूर-चूर नान के स्वाद और ख्याति से उन्हें मार्केट में बढ़त मिली। लेकिन उनके पड़ोसी और प्रतिद्वंदी चूर-चूर नान का प्रयोग रेस्टोरेंट के नाम के तौर पर कर रहे हैं। इसे लेकर प्रवीन ने दिल्ली हाईकोर्ट में एक याचिका दाखिल की थी।

फैसले पर सुनवाई करते हुए अदालत ने कहा कि यदि पंजीकरण गलत तरीके से दिए गए हैं या ऐसे सामान्य भावों के लिए आवेदन किया गया है, तो इसे अनदेखा नहीं कर सकते हैं। अदालत ने कहा कि इन शब्दों का इस्तेमाल सामान्य भाषा में बातचीत के दौरान होता है और ‘चूर चूर’ भाव के संबंध में किसी का एकाधिकार नहीं हो सकता है।

उच्च न्यायालय ने कहा कि वादी ने भले ही ‘चूर चूर नान, ‘अमृतसरी चूर चूर नान’ का पंजीकरण हासिल कर लिया है, लेकिन यह किसी भी नान को ‘चूर चूर’ करने से नहीं रोकता है।

 

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