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एनजीटी – मॉनिटरिंग कमेटी ने गाज़ियाबाद के तीन संस्थानों पर लगाया ₹2.84 करोड़ का पर्यावरणीय जुर्माना

पूर्वी उत्तर प्रदेश नदियों एवं जलाशयों एवं उत्तर प्रदेश ठोस अपशिष्ट प्रबंधन अनुश्रवण समिति के अध्यक्ष न्यायमूर्ति डीपी सिंह, उत्तर प्रदेश ठोस अपशिष्ट प्रबंधन अनुश्रवण समिति (मॉनिटरिंग कमेटी) के सचिव व पूर्व जिला जज राजेंद्र सिंह व केंद्रीय प्रदूषण और उत्तर प्रदेश प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के वैज्ञानिकों व अभियन्ताओं ने गाजियाबाद में रेडिसन होटल, शिप्रा मॉल व होटल तथा मोहन मीकिंस, मोहननगर में ठोस अपशिष्ठ का अवलोकन किया और खामियां पकड़ी। तीनों संस्थानों पर दो करोड़ 84 लाख 35 हजार रुपये का पर्यावरणीय हर्जाना लगाए जाने की सिफारिश एनजीटी से की।

अनुश्रवण समिति के सचिव राजेंद्र सिंह की देखरेख में होटल रेडिसन का निरीक्षण किया गया तो रसोई के अपशिष्ट को अलग करने कि व्यवस्था संतोषजनक नहीं पाई गई, यहाँ गीला-सूखा कचरा एक साथ रखा गया था। इतना ही नहीं, प्लास्टिक अपशिष्ट को भी अलग नहीं किया गया था। एसटीपी का क्लोरिन टैंक खाली पाया गया जो ईकाई के अनियमित संचालन को प्रदूषित कर रहा था। बीओडी 40 पाया गया जबकि इसे 30 एमएल/लीटर होना चाहिए था। ईटीपी और एसटीपी का संचालन असंतोषजनक पाया गया। प्रस्तुत रिपोर्ट में वैधानिक व्यवस्थाओं को देखते हुए होटल के विरूद्ध एक करोड़ 22 लाख 40 हजार हर्जाना लगाए जाने की सिफारिश एनजीटी से की गई।

शिप्रा मॉल एवं होटल के फूडकोर्ट में सूखा और गीला कचरा मिला हुआ पाया गया। प्लास्टिक कचरा भी अलग नहीं किया गया। सीवर लाइन के पाइप के निकास की व्यवस्था अलग से नहीं पाई गई। दोनों तरह के जल उपचार के लिए एसटीपी में पहुंचाए जा रहे थे, जबकि इनको अलग किया जाना चाहिये था। फूडकोर्ट में तैलीय पदार्थ को अलग करने की व्यवस्था नहीं थी। इन सभी कमियों को देखते हुए शिप्रा मॉल के विरूद्ध एक करोड़ एक लाख 75 हजार रुपये पर्यावरणीय हर्जाना लगाए जाने की सिफारिश एनजीटी से की गई।

इसी तरह मोहन मीकिंस कंपनी में खतरनाक अपशिष्ट के निस्तारण के लिए अधिकार पत्र होना नहीं पाया गया। प्रदूषित जल व अन्य़ प्रकार के जल की निकासी की व्यवस्था अलग ऩहीं थी। कोयले की राख का निस्तारण भी अनियमित पाया गया। इन खामियों के चलते मोहन मीकिंस पर 60 लाख 20 हजार रुपये के पर्यावरणीय हर्जाना लगाए जाने की सिफारिश एनजीटी से की गई। सीपीसीबी और यूपीपीसीबी को निर्देश दिए गए कि तीन माह के बाद पुनः इसका निरीक्षण किया जाए और यदि पर्यावरण के नियमों की अनदेखी पाए जाने पर 25 हजार रुपये प्रतिदिन पर्यावरणीय हर्जाना देना होगा।

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