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समारोहों का खाना एकत्रित कर गरीबों का पेट भरती हैं हिरन्या सिन्हा

स्कूल के साथी बच्चों के साथ सोशल अवेयरनेस प्रोग्राम जीरो हंगर नाटक की तैयारी करते-करते गरीबों की मदद करने का विचार मन में आया और फिर वहीं से हिरन्या सिन्हा की एक नई कहानी शुरू हुई। उन्होंने गरीबों की मदद करने की ठानी है और सोशल मीडिया की मदद से अपने साथ 40 लोगों की टीम जोड़ी। शहर के बड़े-बड़े होटलों व रेस्टोरेंटों से बचा हुआ खाना हिरन्या एकत्रित करके गरीबों में बांटती हैं, वहीं स्कूली बच्चों को हर साल अपनी कापी किताबें किसी गरीब के बच्चे को देने की मुहिम चलाती हैं। हिरन्या का कहना है कि हमारी इतनी जिम्मेदारी तो बनती ही है कि कम से कम कोई भूखा न सोए।

क्लास 12 में पढ़ने वाली हिरन्या गोविदपुरम इलाके में रहती हैं। उनके पिता बिजनेसमैन हैं और माता एक मल्टीनेशनल कंपनी में काम करती हैं। हिरन्या बताती हैं कि साल 2017 में वह अपने स्कूल के बच्चों के साथ जीरो हंगर पर एक नाटक तैयार कर रही थीं। नाटक की तैयारी में भूख और गरीबी पर काफी कुछ पढ़ने को मिला, रिसर्च भी खूब की, जिससे दिमाग में गरीबों की मदद करने का विचार आया। जिसके बाद अपनी मित्र अनुष्का भटनागर की मदद से द मैट्रियार्की नाम का एक ग्रुप बनाया। अपनी कालेज फ्रेंड्स तथा सोशल मीडिया की मदद से करीब 40 लोगों को अब तक ग्रुप से जोड़ा जा चुका है। कम से कम कोई रात में भूखा न सोये, यही विचार मन में लिए गरीबों को खाना बांटने अभियान शुरू किया। हिरन्या ने शहर के कई होटलों, रेस्टोरेंट में संपर्क किया और उनके यहां से बचने वाला खाना, एक जगह एकत्रित कर उन्हें गरीबों में बांटना शुरू किया। उनके साथ उनके ग्रुप के सदस्य भी शामिल होते हैं। अब तक इस कैंपेन के लिए शहर के करीब 50 होटलों में हिरन्या गईं और उन्हें अपने अभियान से जोड़ा। साल भर पहले शुरु किया गया यह अभियान अभी भी जारी है। हिरन्या व उनका ग्रुप अक्सर शाम को खाना एकत्रित कर बांटने निकल पड़ता है।

कम से कम शिक्षा में मिले मदद

हिरन्या कहती हैं कि खाने के अलावा सबसे जरूरी गरीबों को शिक्षा मिलना है। अगर गरीबों के बच्चे शिक्षित होंगे तो अपने आप जीवन स्तर सुधार सकते हैं। इसलिए गरीब बच्चों को किताबें उपलब्ध कराने की मुहिम भी शुरू की। जिसमें हमने अपने स्कूल व अन्य स्कूलों में संपर्क कर किसी भी क्लास से पढ़कर अगली क्लास में जाने वाले बच्चों से उनकी किताबें ले लेते हैं। जिन्हें गरीब बच्चों को पढ़ने के लिए देते हैं, ताकि वह बच्चे भी पढ़कर आगे बढ़ सकें।
(साभार – जागरण)
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