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सुप्रीम कोर्ट ने कहा – प्रवासी मजदूरों को खाने-पीने के साथ आश्रय उपलब्ध कराए सरकार, मामले की अगली सुनवाई 5 जून को

देश में कोरोना महामारी की वजह से हुई कामबंदी प्रवासी मजदूरों के सामने रोजी-रोटी का संकट पैदा हो गया है। सर्वोच्च न्यायालय ने इस मामले पर स्वत: सज्ञान (सुओ मोटो) लेते हुए प्रवासी मजदूरों की स्थिति पर गुरुवार को अहम सुनवाई हुई। इस दौरान सर्वोच्च न्यायालय ने सरकार को निर्देश दिए कि प्रवासी मजदूरों को घर भेजने के लिए उनसे रेल या बस किराया नहीं वसूला जाए। उनके किराये की व्‍यवस्‍था सरकार करें। मामले की अगली सुनवाई अब 5 जून को होगी।

दरअसल, सर्वोच्च न्यायालय ने लॉकडाउन की वजह से महानगरों से पैदल और साइकिल पर अपने-अपने घर की ओर जा रहे कामगारों की दयनीय स्थिति के बारे में मीडिया की तमाम खबरों का स्वत: ही संज्ञान लिया है। बेंच ने इस स्थिति को बेहद दुर्भाग्यपूर्ण बताया और केंद्र-राज्य सरकार को नोटिस जारी किए गए। अदालत ने 28 मई तक इस पर जवाब मांगा था। इसी पर गुरुवार को सुनवाई हुई। सर्वोच्च न्यायालय ने इस दौरान सरकार को यह भी निर्देश दिए कि प्रवासी मजदूरों को घर भेजने की प्रक्रिया में तेजी लाई जाए। अगर कोई प्रवासी मजदूर पैदल जाता पाया जाए तो तुरंत उसे आश्रय और खानपान मुहैया कराया जाए।

सर्वोच्च न्यायालय ने कहा कि प्रवासी मजदूरों को घर भेजने के लिए रजिस्‍ट्रेशन, परिवहन और उन्‍हें आश्रय व खानपान मुहैया कराने को लेकर कई खामियां हैं। सर्वोच्च न्यायालय ने प्रवासी मजदूरों की गरीबी और अन्‍य समस्‍याओं पर विचार किया। सर्वोच्‍च न्‍यायालय ने कहा कि रजिस्‍ट्रेशन के बाद भी प्रवासी मजूदरों को वापस घर जाने के लिए हफ्तों को इंतजार करना पड़ रहा है। बड़ी संख्‍या में प्रवासियों को पैदल घर जाने पर मजबूर होना पड़ रहा है।

प्रवासी मजदूरों के मामले में रणदीप सिंह सुरजेवाला की ओर से सर्वोच्च न्यायालय में अभिषेक मनु सिंघवी पेश हुए। केंद्र सरकार ने इसका विरोध किया और कहा कि इसका राजनीतिकरण किया जा रहा है। सर्वोच्च न्यायालय ने कहा वह सिर्फ कुछ सुझाव सुनेगा इसके अलावा कुछ नहीं।

केंद्र सरकार की ओर से सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने प्रवासी मजदूरों के मामले पर सुनवाई के दौरान सर्वोच्च न्यायालय को बताया कि उत्तर प्रदेश और बिहार में प्रवासियों की संख्या 80 प्रतिशत है। अब तक 91 लाख प्रवासी स्थानांतरित किए गए। सर्वोच्च न्यायालय (Supreme Court) ने अपने आदेश में कहा था कि मौजूदा स्थिति में जहां देश में लॉकडाउन चल रहा है, ऐसे में प्रवासी मजदूरों को संबंधित सरकारों की मदद की बेहद जरूरत है। खासकर भारत सरकार, राज्य/ केंद्र शासित सरकारों को इस कठिन समय में प्रवासी मजदूरों की ओर मदद का हाथ बढ़ाना चाहिए।

जस्टिस अशोक भूषण, जस्टिस संजय किशनकौल और जस्टिस एम आर शाह की बेंच ने कहा था, ‘हम इन कामगारों , जो देश के विभिन्न हिस्सों में फंसे हुए हैं, की समस्याओं और परेशानियों का स्वत: संज्ञान ले रहे हैं। समाचार पत्रों की खबरों में लगातार इन कामगारों की परेशानियों और पैदल और साइकिल पर लंबी दूरी तय करने के बारे में विचलित करने वाली तस्वीरों को दिखाया जा रहा है।’ बेंच ने आगे कहा था, ‘समूचे देश में लॉकडाउन की मौजूदा स्थिति में समाज के इस वर्ग को संबंधित सरकार, विशेषकर केंद्र सरकार, राज्य सरकारों और केंद्र शासित प्रदेशों से संकट की इस घड़ी में मदद की उम्मीद की जाती है।’

सर्वोच्च न्यायालय ने कहा था कि केंद्र और राज्य सरकारों को उनकी मदद करनी चाहिए और उनके ज़ख्म पर मरहम रखना चाहिए। इसलिए सर्वोच्च न्यायालय ने केंद्र और सभी राज्य सरकारों को निर्देश दिया है कि वह इस बाबत अपना जवाब दाखिल करें। कोर्ट ने कहा था कि सरकार बताए कि इन लोगों के लिए क्या कदम उठाया गया है और क्या किया का सकता है।


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