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अच्छी खबर : डीप-एक्स डिवाइस से 20 सेकंड में होगी कोरोना संक्रमित की पहचान

मोतीलाल नेहरू राष्ट्रीय प्रौद्योगिकी संस्थान (एमएनएनआइटी) प्रयागराज द्वारा विकसित डीप-एक्स डिवाइस 20 सेकेंड में बता देगी कि व्यक्ति कोरोना से संक्रमित है या नहीं। इसके अलावा संस्थान के मैकेनिकल इंजीनियरिंग विभाग ने टेम्प्रेचर डिटेक्टर और मरीज में ऑक्सीजन की कमी होने की सूचना देने वाला पल्स ऑक्सीमीटर भी बनाया है।

भारत के विभिन्न प्रौद्योगिकी-तकनीकी शोध-शिक्षण-प्रशिक्षण संस्थान कोविड-19 से निबटने के लिए आवश्यक उपकरण विकसित करने में जुटे हुए हैं। इसी क्रम में प्रयागराज, उप्र स्थित मोतीलाल नेहरू राष्ट्रीय प्रौद्योगिकी संस्थान, एमएनएनआइटी में भी अनेक प्रोजेक्ट्स पर काम चल रहा है। कोरोना संक्रमित व्यक्ति को एक्स-रे स्कैन के जरिए तत्काल चिन्हित कर सकने वाला उपकरण इनमें खास है।

प्रोजेक्ट्स से जुड़े विज्ञानियों ने बताया कि एयरपोर्ट, रेलवे स्टेशन, बस अड्डे या इस तरह के किसी भी एंट्री-एक्जिट प्वाइंट पर इससे काम लिया जा सकता है। डीप-एक्स पोर्टेबल उपकरण इससे होकर गुजरने वाले व्यक्तियों में से संदिग्ध को तत्काल चिन्हित करने में दक्ष है। विज्ञानियों ने डीप लर्निंग एल्गोरिदम (गहन गणनाओं) के जरिये यह सॉफ्टवेयर तैयार किया है, जिसे पोर्टेबल एक्स-रे स्कैनर से कनेक्ट कर इस तरह की सूक्ष्म जांच में सक्षम बनाया गया है।

सॉफ्टवेयर में कोरोना संक्रमण से ग्रस्त विभिन्न लोगों के फेफड़ों की एक्सरे इमेज अपलोड की गई हैं। पोर्टेबल एक्स-रे मशीन से जुड़कर यह सॉफ्टवेयर किसी व्यक्ति के फेफड़े को स्कैन कर उसका पहले से अपलोड की गई एक्स-रे तस्वीरों से मिलान करता है। कोविड-19 संक्रमण पाए जाने पर रिपोर्ट तत्काल दे देता है। इस पूरी प्रक्रिया में महज 20 सेकेंड का समय लगता है। यानी उपकरण के सामने आते ही तत्काल पता चल जाता है कि व्यक्ति का फेफड़ा संक्रमण से प्रभावित है या नहीं।

संस्थान के प्रोफेसर मुकुल शुक्ल के निर्देशन में डॉ. समीर सरस्वती और डॉ. प्रवीण अग्रवाल की टीम ने यह सॉफ्टवेयर तैयार किया है। सॉफ्टवेयर की लागत छह लाख रुपये आई है। पोर्टेबल एक्स-रे स्कैनर अलग से लगाना होता है। प्रोफेसर शुक्ल ने बताया कि डीप लर्निंग एल्गोरिदम के पैटर्न पर यह सॉफ्टवेयर व्यक्ति के फेफड़े का सूक्ष्म तुलनात्मक अध्ययन करता है। सॉफ्टवेयर में ऐसे विभिन्न 900 फोटो अपलोड किए गए हैं। ज्यादातर लोगों के फेफड़ों की बनावट और उनमें होने वाले संक्रमण के बाद की स्थिति की हर गणना इसमें शामिल की गई है। कोविड-19 के कारण फेफड़े में आने वाले सूक्ष्म बदलाव को चिन्हित करने में यह दक्ष है। सॉफ्टवेयर में आर्टीफिशियल इंटेलिजेंस और न्यूरल नेटवर्क का भी इस्तेमाल किया गया है। इसकी गणनाएं 95 फीसद तक सटीक हैैं। ट्रायल शुरू कर दिया गया है। हालांकि, जो लोग संक्रमण के बिलकुल शुरुआती दौर में होंगे, उनकी पहचान करने में सॉफ्टवेयर को थोड़ी परेशानी होगी, क्योंकि जब तक फेफड़े में कोरोना के संक्रमण का थोड़ा सा भी असर चिन्हित नहीं हो जाता है, सॉफ्टवेयर इसे पकड़ नहीं पाएगा।

अंगुली रखते ही बता देगा ऑक्सीजन की मात्रा :

इसके अलावा विज्ञानियों की टीम पल्स ऑक्सीमीटर भी तैयार करने में जुटी हुई है। इसके बारे में टीम के सदस्य सजल कुमार बाबू ने बताया कि शरीर में ऑक्सीजन के अचानक कम हो जाने की समस्या भी कोरोना संक्रमित मरीजों के उपचार के दौरान सामने आ रही है। हमारे द्वारा तैयार किए जा रहे पल्स ऑक्सीमीटर से यदि शरीर में ऑक्सीजन की कमी होगी तो सही जानकारी तुरंत मिल सकेगी। ऐसी डिवाइस तैयार की गई है, जिस पर अंगुली रखते ही ऑक्सीजन की स्थिति स्पष्ट हो सकेगी। जल्द ही यह प्रोजेक्ट भी पूरा कर लिया जाएगा।

टेम्प्रेचर डिटेक्टर :

संस्थान के ही एप्लाइड मैकेनिक विभाग के प्रो. आरपी तिवारी के निर्देशन में सजल कुमार बाबू, डॉ. आशुतोष मिश्र, डॉ. अभिषेक तिवारी ने वायरलेस थर्मामीटर तैयार किया है। सेंसरयुक्त इस थर्मामीटर से थर्मल स्कैनिंग करने की जरूरत नहीं होगी। इसे किसी भी प्रवेश द्वार पर रखा जाएगा। इसके पांच सेमी के दायरे में कोई आएगा तो यह उसके शरीर का तापमान माप लेगा और थर्मामीटर में लगे कंट्रोलर में तापमान की जानकारी पहुंच जाएगी। फिर वाई-फाई के जरिए तापमान मोबाइल एप तक पहुंच जाएगा। यदि व्यक्ति का तापमान अधिक रहता है तो थर्मामीटर पांच सेकेंड तक आवाज करेगा।

केंद्र सरकार से मिला प्रथम पुरस्कार :

केंद्रीय मानव संसाधन विकास मंत्रालय (एचआरडी) ने यंग इंडिया कॉम्बेटिंग कोविड विथ नॉलेज, टेक्नोलॉजी एंड इनोवेशन पोर्टल (युक्ति) पिछले दिनों लॉंच किया था। इस पर देशभर के संस्थानों में कोरोना से लडऩे के लिए किए जा रहे प्रयास और अनुसंधान के बारे में जानकारी मांगी गई थी। देशभर से तीन वर्ग में कुल पांच हजार टीम ने प्रतिभाग किया था। संस्थान के निदेशक प्रोफेसर राजीव त्रिपाठी ने बताया कि यहां से 12 प्रस्ताव भेजे गए थे, जिसमें से इस प्रोजेक्ट को प्रथम स्थान मिला।

देश के लिए मददगार सिद्ध होगा

हमारे विज्ञानियों ने तय समय में डीप-एक्स सॉफ्टवेयर को तैयार किया है, जो महामारी से निबटने में देश के लिए मददगार सिद्ध होगा। सरकार से अनुमति मिलने के बाद इससे हवाई अड्डों इत्यादि पर जांच शुरू की जाएगी। अन्य प्रोजेक्ट्स पर भी कवायद चल रही है।

– प्रोफेसर राजीव त्रिपाठी, निदेशक, एमएनएनआइटी, प्रयागराज, उप्र

साभार : दैनिक जागरण

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