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प्रदर्शनों में शामिल औरतों पर आख़िर सवाल क्यों उठाए जाते हैं?

एंथ्रोपोसीन युग यानी आज के दौर में इंसानी गतिविधियों ने ग्लोबल वॉर्मिंग को जन्म दिया है और जीवों के क़ुदरती आवास को नुक़सान पहुँचाया है. इंसान ने समंदर, मिट्टी और वायुमंडल की रासायनिक बनावट को तब्दील कर दिया है जिसकी वजह से बहुत से जीव धरती से विलुप्त हो गये हैं.

इन हालात में ऐसे आंदोलनों में महिलाओं की भूमिका और उनकी अहमियत बहुत बढ़ गई है जिनका ताल्लुक़ इंसाफ़ हासिल करने से है.

महिलावादी कार्यकर्ता लंबे समय से कहते आये हैं कि दुनिया भर में सामाजिक और पर्यावरण व जलवायु संबंधी इंसाफ़ की लड़ाई महिलाएं ही लड़ेंगी. ‘दिल्ली चलो आंदोलन’ में महिलाओं की मौजूदगी इस बात का प्रतीक है. लेकिन, ये लड़ाई बेहद मुश्किल और दर्द भरी रहने वाली है.

इसकी वजह ये है कि हमारे समाज में मर्दवादी सोच की जड़ें बेहद गहरी हैं. पितृसत्तात्मक सोच ये मानती ही नहीं कि महिलाओं की अपनी भी कोई हस्ती है. किसान आंदोलन में मौजूद महिलाओं को लेकर आ रहे बयान और टिप्पणियाँ इसी बात का सबूत हैं.

मंगलवार को एक सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने सरकार के तीन विवादास्पद कृषि क़ानूनों को लागू करने पर रोक लगा दी. मगर कृषि क़ानूनों से जुड़े मामलों की सुनवाई के दौरान, भारत के मुख्य न्यायाधीश शरद अरविंद बोबडे ने कहा कि “उन्हें यह जानकर अच्छा लगा कि बुज़ुर्ग, महिलाएं और बच्चे इस विरोध प्रदर्शन में शामिल नहीं होंगे.”

महिलाओं के हक़ की बात

भारत के चीफ़ जस्टिस के ये विचार देश के सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता के उन ख़यालों से बहुत मिलते हैं, जिन्हें उन्होंने पिछले साल शाहीन बाग़ के विरोध प्रदर्शनों के हवाले से, सुप्रीम कोर्ट में बयान किया था.

तब तुषार मेहता ने कहा था कि ‘प्रदर्शनकारियों ने अपने आंदोलन में महिलाओं और बच्चों को सुरक्षा कवच बनाया हुआ है.’

तब सर्वोच्च अदालत ने वरिष्ठ वकील संजय हेगड़े की अगुवाई में प्रदर्शनकारियों से बात करने के लिए एक कमेटी बनाई थी.

उस समय सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि “विरोध करना नागरिकों का बुनियादी हक़ है और लोग विरोध प्रदर्शन कर सकते हैं.”

लेकिन, इन बातों से जो बड़ा सवाल पैदा होता है, वो चिंतित करने वाला है.

सवाल ये कि आख़िर देश के नागरिकों में किन-किन की गिनती होती है? और अगर विरोध प्रदर्शनों में महिलाओं को भी ‘रखा’ जा रहा है, तो क्या जज साहेबान ये सोचते हैं कि महिलाओं की कोई हस्ती नहीं? किसान आंदोलन में शामिल महिलाएं सवाल उठाती हैं कि क्या उन्हें अपनी मर्ज़ी से कुछ भी करने का हक़ नहीं है?

चीफ़ जस्टिस बोबड़े की इन टिप्पणियों को लेकर प्रदर्शनकारियों में नाराज़गी ज़रूर है, मगर महिला आंदोलनकारियों को जस्टिस बोबड़े की बातों से कोई हैरानी नहीं हुई.

इसकी वजह ये है कि ज़्यादातर संस्थानों में मर्दों का दबदबा है. सुप्रीम कोर्ट का भी यही हाल है. ऐसे में महिलाओं का एकजुट होना और अपनी आवाज़ उठाना, उन्हें अखरता है.

शाहीन बाग़ के धरने से चर्चा में आईं 82 बरस की बिल्कीस दादी कहती हैं कि महिलाएं हर काम में हिस्सा लेती हैं और उन्हें ऐसा करना भी चाहिए.

वे कहती हैं कि “जब सवाल देश और उसके मूल्यों को बचाने का आएगा, तो यक़ीन जानिए इसकी अगुवाई महिलाएं ही करेंगी. हम उनके साथ हैं. इसका ताल्लुक़ ना उम्र से है, और इस बात से कि कोई औरत है या मर्द. हम सब बराबर हैं.”

महिलाओं को लेकर पूर्वाग्रही सोच

हरियाणा की महिला किसान नेता सुदेश गोयल कहती हैं कि किसान आंदोलन में शामिल महिलाएं बिल्कुल अपनी मर्ज़ी से यहाँ आई हैं.

वे कहती हैं कि “हर गुज़रते दिन के साथ विरोध प्रदर्शन में महिलाओं की तादाद बढ़ रही है, ख़ासतौर से हरियाणा से बड़ी तादाद में महिलाएं आ रही हैं. हम तब तक घर नहीं लौटेंगे जब तक ये कृषि क़ानून ख़त्म नहीं किये जाते. हम यहाँ इसलिए हैं क्योंकि एक महिला के तौर पर हमें अपने अधिकारों का अच्छी तरह से एहसास है.”

किसान आंदोलन में शामिल महिलाएं कहती हैं कि चीफ़ जस्टिस के बयान से महिलाओं को लेकर उनकी सोच का बचकानापन झलकता है. ये महिलाओं के प्रति उनकी ही नहीं, बल्कि पूरे समाज की पूर्वाग्रह भरी सोच है. तभी तो चीफ़ जस्टिस बोबड़े ये कहते हैं कि विरोध प्रदर्शन में महिलाओं को शामिल नहीं होना चाहिए.

विरोध-प्रदर्शन में शरीक महिलाएं, चीफ़ जस्टिस के बयान को समाज की मर्दवादी सोच की नुमाइश के तौर पर देखती हैं.

उनका कहना है कि हमारा समाज हर बात को पुरुषों की नज़र से ही देखता है.

शाहीन बाग़ की हिना अहमद कहती हैं कि “उन्हें शायद ये एहसास ही नहीं है कि पूरी दुनिया में होने वाले आंदोलनों में महिलाएं शामिल होती रही हैं. ये महिला आंदोलनकारी ही हैं जो विरोध प्रदर्शन को शांतिपूर्ण बनाये रखती हैं.”

शांतिपूर्ण विरोध-प्रदर्शन की वजह

हार्वर्ड की प्रोफ़ेसर एरिका चेनोवेथ के मुताबिक़, विरोध के आंदोलनों की सफलता का सीधा संबंध, उनमें महिलाओं की भागीदारी से पाया गया है. यहां तक कि संयुक्त राष्ट्र की एक रिपोर्ट भी ये कहती है कि जब किसी आंदोलन में महिलाएं शामिल होती हैं, तो उसके शांतिपूर्ण बने रहने की संभावनाएं बढ़ जाती हैं.

संयुक्त राष्ट्र का कहना है कि विरोध प्रदर्शनों में महिलाएं कई तरह की भूमिकाएं निभाती हैं. वो आंदोलन की आयोजक होती हैं. प्रदर्शनों में शामिल लोगों का ख़याल रखती हैं और उनकी हिफ़ाज़त करती हैं. लेकिन, जब बात राजनीतिक प्रक्रिया, सत्ता के परिवर्तन और वार्ता की आती है, तो महिलाओं को हाशिए पर धकेल दिया जाता है. बातचीत की टेबल पर बहुत कम महिलाएं दिखती हैं.

हरियाणा की रहने वाली देविका सिवाच, किसान आंदोलन के पहले ही दिन से टीकरी बॉर्डर पर डटी हुई हैं. अब वो गुरुग्राम में महिलाओं को को एकजुट कर रही हैं. देविका इस सच से इत्तेफ़ाक़ रखती हैं कि महिलाओं की भागीदारी के कारण ही आंदोलन शांतिपूर्ण बने रहते हैं.

देविका कहती हैं कि, “हरियाणा और पंजाब में हमारे आंदोलन की अगुवाई महिलाएं ही कर रही हैं. हम कोई कमज़ोर औरतें नहीं हैं. हमने हर क्षेत्र में कामयाबी हासिल की है. वो ये कैसे सोच लेते हैं कि हम औरतें कमज़ोर हैं? अगर हम मर्दों को जन्म दे सकते हैं, तो हम अपनी लड़ाई भी लड़ सकते हैं. मातृशक्ति बेहद महत्वपूर्ण है. आंदोलनों में अमन हम से ही है.”

बराबर की हिस्सेदार

हज़ारों महिला किसान देश की राजधानी की सीमाओं पर आकर डटी हुई हैं.

वो दिल्ली चलो आंदोलन की समर्थक ही नहीं हैं, उसमें बराबर की भागीदार भी हैं. कई महिलाओं ने तो नागरिकता संशोधन क़ानून के ख़िलाफ़ शाहीन बाग़ के आंदोलन का हवाला देकर कहा कि उन्हें तो विरोध जताने का हौसला शाहीन बाग़ की औरतों से मिला.

शाहीन बाग़ में औरतों ने दिल्ली की भयंकर ठंड में भी सौ से ज़्यादा दिनों तक अपना धरना चलाया था. इसके बाद सरकार ने ये कहते हुए उनका धरना ज़बरदस्ती ख़त्म करा दिया था कि महामारी के दौरान वो इतनी महिलाओं को एक साथ, एक जगह नहीं बैठने दे सकते.

शाहीन बाग़ के आंदोलन में शामिल रही हिना अहमद ने इस धरने को कामयाब बनाने के लिए काफ़ी मेहनत की थी. उन्होंने बड़ी संख्या में महिलाओं को इससे जोड़ा था. हिना कहती हैं कि इसमें कोई चौंकाने वाली बात नहीं है कि मर्द, औरतों को कमज़ोर समझते हैं.

47 बरस की हिना कहती हैं कि, “मगर, उन्हें अब ये सोचना छोड़ देना चाहिए कि औरतें कमज़ोर होती हैं. जब हम धरनों में बैठते हैं, तो बच्चों को उम्मीद की किरण दिखती है. शाहीन बाग़ में माएं क्यों धरने पर बैठी थीं? क्योंकि उन्हें अपने बच्चों के भविष्य की चिंता थी. उन्होंने हम पर तमाम तरह के इल्ज़ाम लगाए. उन्होंने हमारी औक़ात बिरयानी तक समेट दी थी. अब वो किसानों को क्या कहेंगे? महिलाओं ने हमेशा ही विरोध प्रदर्शन किए हैं. वो अधिकारों के लिए लड़ाई लड़ती आई हैं.”

किसान आंदोलन की आवाज़ उठाने वाली दादी

बुनियादी अधिकार

भारत का संविधान कहता है कि विरोध का अधिकार, महिलाओं का भी बुनियादी हक़ है. दिल्ली की रहने वाली मानव अधिकार मामलों की वकील श्रुति पांडेय कहती हैं कि महिलाओं को हमेशा संविधान को अपने दिल में बसाए रखना चाहिए.

नेशनल काउंसिल ऑफ़ एप्लाइड इकॉनमिक रिसर्च के मुताबिक़, वर्ष 2018 में देश के कृषि क्षेत्र के कुल कामगारों में महिलाओं की हिस्सेदारी 42 फ़ीसद थी.

ये आंकड़े ही ये ज़ाहिर करने के लिए काफ़ी हैं कि खेती में महिलाओं की भागीदारी किस तरह लगातार बढ़ रही है. फिर भी आज महिलाएं, खेती के लायक़ केवल दो फ़ीसद ज़मीन की ही मालिक हैं.

किसान आंदोलनों में भागीदारी, इन महिलाओं को इस बात का भी मौक़ा मुहैया कराती है कि वो कृषि क्षेत्र में अपने अदृश्य योगदान से पर्दा उठाकर, देश को ये एहसास कराएं कि खेती-बाड़ी में उनकी भूमिका कितनी बड़ी और महत्वपूर्ण है. विरोध-प्रदर्शन के ज़रिए महिलाएं, किसान क़ानूनों पर अपनी राय का भी इज़हार कर रही हैं, जो उनके हिसाब से महिला विरोधी हैं.

फिर से छिड़ी पुरानी बहस

इस आंदोलन के ज़रिए वो पुरानी बहस फिर से ज़िंदा हो गई है कि क्या पूंजीवाद, महिलाओं के ख़िलाफ़ है?

हो सकता है कि ये बात सच हो कि पूंजीवाद ने महिलाओं को काम करने और तरक़्क़ी के तमाम मौक़े दिए. लेकिन, पूंजीवाद ने मर्दवादी ख़यालात से महिलाओं में पैदा हुई असुरक्षाओं का भी बेज़ा इस्तेमाल किया. महिलाओं ने राजनीतिक प्रक्रिया में अपनी भागीदारी के अधिकार के लिए सदियों तक संघर्ष किया है.

बीसवीं सदी में अमरीका का महिलाओं को मताधिकार का आंदोलन हो, या 2020 में भारत के शाहीन बाग़ में धरना, महिलाओं ने हमेशा ही विरोध प्रदर्शनों की अगुवाई की है. और, पिछले एक दशक के दौरान महिलाओं ने बराबरी का हक़ हासिल करने के लिए ऐसे बहुत से आंदोलन चलाए हैं.

श्रुति पांडेय कहती हैं कि, इन आंदोलनों में महिलाओं की शिरकत महज़ एक इत्तेफ़ाक़ नहीं है.

वो कहती हैं कि, “सुप्रीम कोर्ट ने महिलाओं को लेकर जिस तह की टिप्पणियां की हैं, वो संवेदनहीन हैं, बल्कि सच तो ये है कि ये विचार रूढ़िवादी हैं. हालांकि ऐसी बातों से महिलाओं को कम और एक लोकतांत्रिक संस्था के तौर पर सुप्रीम कोर्ट को ही अधिक नुक़सान होगा.”

”ऐसी टिप्पणियों से देश की सबसे बड़ी अदालत अप्रासंगिक या बेहद पुरातनपंथी सोच वाली मालूम होती है. किसी भी सूरत में बट्टा सुप्रीम कोर्ट की इज़्ज़त पर ही लगा है. अगर सुप्रीम कोर्ट की अपनी सोच ऐसी होगी, तो फिर वो किस मुंह से समाज में महिला विरोधी विचारों को रोकने का अधिकार जताएंगे? जब उनकी अपनी विश्वसनीयता कठघरे में होगी, तो वो सामाजिक नियम कायदों को मज़बूत बनाने का काम कैसे कर सकेंगे?”

श्रुति पांडेय का मानना है कि विरोध की एक हक़ीक़त ये है कि वो भविष्य की ज़ुबान बोलता है. आज महिलाओं का इम्तिहान लिया जा रहा है. अब समाज के मूल्यों को नए सिरे से परिभाषित करना ही होगा.

श्रुति कहती हैं कि, “हमें सुप्रीम कोर्ट की बातें बुरी लगनी चाहिए. हमें ये मानना पड़ेगा कि केवल भारत में ही नहीं, बल्कि पूरी दुनिया में हम आज ऐसे मोड़ पर खड़े हैं, जहां पुराने और नए विचारों का टकराव बढ़ रहा है. आज धर्म हो, जाति हो, परिवार हो, या बाज़ार, सभी जगह मर्दवादी सोच हावी है. हालात को ऐसे ही बनाए रखने में पुरुषों का ही फ़ायदा है.”

“लेकिन, महिलाएं इस मंज़र को बदलना चाहती हैं. ये लड़ाई, बेलगाम मर्दवादी सोच को क़ाबू करने की है. इस टकराव से पुरुष और महिलाओं के बीच भेदभाव की जगह, आने वाले समय में बराबरी वाले समाज की ज़मीन तैयार हो रही है.”

”देख-भाल करने का विचार भी वैसा ही है. लोगों को लगता है कि पुरुषों की देख-भाल की ज़िम्मेदारी महिलाओं की है. ये औरतों को ख़ास लैंगिक भूमिका में देखने वाली सोच का ही नतीजा है.”

यही कारण है कि किसान आंदोलन में शामिल महिलाओं को उसी भूमिका में देखा जा रहा है कि वो आंदोलनकारियों का ख़याल रख रही हैं.

भारत में हाल के दिनों में हुए कई आंदोलनों में देखा गया है कि महिलाओं ने आंदोलन के लिए खाने और रहने के इंतज़ाम किए. इसके ज़रिए, वो अहिंसक तरीक़े से अपने राजनीतिक अधिकारों के लिए संघर्ष कर रही हैं.

मर्दों का हित

महिलाओं का ये तिरस्कार, और उन्हें खलनायिका बनाकर पेश करना कोई नई बात नहीं है.

लेकिन, महिला आंदोलनकारियों की ऐसी आलोचना ज़रूर नई है, और इसकी समीक्षा करना ज़रूरी है. महिलाओं को विलेन बनाने वाली ऐसी टिप्पणियां इस बात का संकेत हैं कि, महिलाओं को मौजूदा पितृसत्तात्मक व्यवस्था के लिए ख़तरे के रूप में देखा जा रहा है.

श्रुति पांडेय कहती हैं कि, “देश की सरकार मर्दवादी है. न्यायपालिका पर मर्दों का दबदबा है, बाज़ार पुरुषवादी है. बल्कि कुल मिलाकर कहें तो इंसानी सभ्यता पर ही मर्दवाद हावी रहा है. इसके ख़िलाफ़ बग़ावत तो महिलाएं ही करेंगी. ये सारी बातें एक दूसरे से जुड़ी हुई हैं. महिलाओं का विरोध वही लोग करते हैं, जिनके हित मर्दों के दबदबे वाली मौजूदा व्यवस्था से जुड़े हैं.”

कंगना को बुज़ुर्ग किसान महिला ने क्या जवाब दिया?

जहां तक संविधान की बात है, तो वो महिला और पुरुष में भेद नहीं करता है. महिलाओं को भी बराबरी के क़ानूनी हक़ हासिल हैं. संविधान में कोई बदलाव नहीं हुआ है, और संविधान के मुताबिक़ औरतें कोई दोयम दर्ज़े की नागरिक नहीं हैं.

किसान आंदोलन का समर्थन करने वाली अभिनेत्री गुल पनाग कहती हैं कि महिलाओं के विरोध करने के अधिकार को कम करके आंकना, नाइंसाफी है. इससे ऐसा लगता है कि महिलाओं को उनकी इच्छा के ख़िलाफ़ विरोध-प्रदर्शनों में लाया गया, और अब ‘बंधक बनाकर’ रखा जा रहा है.

गुल पनाग कहती हैं कि, “हर किसान परिवार में महिलाएं, मर्दों के कंधे से कंधा मिलाकर काम करती हैं और खेती-किसानी में बराबर की साझीदार हैं. बल्कि, सच तो ये है कि किसी और पेशे की तुलना में खेती में तो औरतें, मर्दों के साथ बराबर की शरीक हैं.”

महिलाओं को दबाकर रखने का सिलसिला बहुत पुराना है. ये सोच हमारी ज़बान, सामाजिक रिश्तों के ताने-बाने, घिसे-पिटे नज़रियों, धर्म और संस्कृति के ज़रिए ज़ाहिर होती है. पूंजीवाद ने समाज पर पुरुषों के दबदबे को कई तरीक़ों से बढ़ावा दिया है.

उपभोक्तावादी संस्कृति ही ख़ूबसूरती के पैमाने तय करती है, और वो ये भी बताती है कि महिलाएं क्या और कैसा बनने के ख़्वाब देखें. पूंजीवाद, असुरक्षा के बोध पर ही फलता-फूलता है. मर्दवाद, इसी बिनाह पर अपना शिकंजा और कसता जाता है.

पूंजीवादी साज़िश

दिल्ली चलो आंदोलन में शामिल महिलाएं नए कृषि क़ानूनों को पूंजीवाद की एक साज़िश के तौर पर देखती हैं.

पूंजीवाद ही जलवायु परिवर्तन के संकट का भी एक कारण है. मर्दवादी समाज, आज भी महिलाओं को कमज़ोर बताता है. वो बुज़ुर्गों और बच्चों के साथ महिलाओं के बारे में भी यही कहता है कि वो ठंड और कोरोना वायरस की शिकार ज़्यादा जल्दी हो जाएंगी. महिलाएं ऐसी बातों को सिरे से ख़ारिज करती हैं.

भारत के मुख्य न्यायाधीश की ये टिप्पणियां एक रूढ़िवादी सोच उजागर करती हैं. वो महिला विरोधियों को एक और हथियार उपलब्ध कराती हैं, जिससे वो औरतों को निशाना बना सकें.

मगर, इन टिप्पणियों से ये भी ज़ाहिर होता है कि देश के मुख्य न्यायाधीश को ये जानकारी ही नहीं है कि भारत में महिलाओं ने ‘चिपको आंदोलन’ सरीखे बहुत से विरोध प्रदर्शनों का नेतृत्व किया है.

टीकरी बॉर्डर पर एक ट्रैक्टर की ट्रॉली में बैठी जिन नौ महिलाओं से मैं दिसंबर महीने में मिली थी, उनका कहना था कि वो इस आंदोलन में इसलिए शामिल हैं, क्योंकि ऐसा करना उनका हक़ है. वो अपनी मर्ज़ी से यहां आई हैं.

इनमें सबसे बुज़ुर्ग महिला की उम्र 72 बरस थी, तो सबसे कम उम्र की आंदोलनकारी बीस बरस की एक लड़की थी. उनके साथ एक छोटा बच्चा भी था. वो पंजाब के बठिंडा ज़िले के चक राम सिंह वाला से आए थे.

उस ट्रॉली में सत्तर साल से ज़्यादा उम्र की चार महिलाएं थीं. उनमें से एक थीं जसबीर कौर. उन्होंने मुझसे कहा कि, “हमने अपनी मर्ज़ी से यहां आकर विरोध प्रदर्शनों में शामिल होने का फ़ैसला किया. हम भी तो किसान हैं. वो हमको कुछ समझते ही नहीं हैं.”

जसबीर कौर, भारतीय किसान यूनियन (एकता उग्रहण) से ताल्लुक़ रखती हैं. उन्होंने कहा था कि जब तक सरकार ये क़ानून वापस नहीं लेती, वो घर नहीं लौटेंगी.

ठंड और ऊल-जलूल बयानों के बाद भी, जसबीर कौर अभी धरने पर डटी हुई हैं. वो कहती हैं कि, “हमें इस विरोध प्रदर्शन से अलग नहीं रखा जा सकता. हम भी बराबर के नागरिक हैं.”

इस आंदोलन में महिलाओं की भागीदारी का असल मक़सद यही है. बराबरी का अधिकार हासिल करना. ये लड़ाई तो सदियों से चली आ रही है. मताधिकार के लिए संघर्ष, इसी जंग का हिस्सा था.

बिल्कीस बानो कहती हैं कि, “हम सबके लिए लड़ाई लड़ रहे हैं. महिलाएं यही तो करती आई हैं. वो सभी को बराबरी का हक़ दिलाने के लिए संघर्ष करती हैं.”साभार-बीबीसी न्यूज़ हिंदी

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