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कुछ कही,कुछ अनकही

गाजियाबाद। देश के प्रगति को नया आयाम देने वाले, हर साल सरकार को हजारों करोड़ का राजस्व एवं टैक्स देने वाले, देश के लाखों करोड़ों युवाओं को रोजगार एवं समय बाद रोजी-रोटी देने वाले उद्योग बंधु ही हाशिये पर खड़े दिखाई देते हैं। आप सहजता से अनुभव कर सकते हैं कि देश में सड़कों का जाल बिछा देने के बावजूद अगर आपको कहीं भी सड़कों की स्थिति दयनीय मिलेगी तो निश्चित रूप से वह क्षेत्र इंडस्ट्रियल एरिया ही होगा। हर तरीके से नियमों का पालन करने के बावजूद उद्योग धंधे त्वरित रूप से कार्य कराने के लिए या तो अफसरशाही के आगे हाथ जोड़े नजर आते हैं या फिर अपनी गाढ़ी कमाई मे से रिश्वत देते हुए। उसके बावजूद उद्योग धंधों ने कभी आंदोलन का रास्ता नहीं पकड़ा।

शायद यह सोच हावी रही हो कि अगर अपनी मांगों के लिए उद्योग बंद करके वे लोग भी सड़कों पर बैठ जाएंगे तो लाखों करोड़ों लोगों की जीविका कैसे चलेगी, उनका चूल्हा कैसे जलेगा, यह देश कैसे आगे बढ़ेगा।

जरा सोचिए!

चक्का जाम या उपद्रवी आंदोलन का रास्ता अगर उद्योग बंधुओं ने अपना लिया तो

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