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नई रिपोर्ट में दावा:पिछले साल 76 कैदियों को मौत की सजा सुनाई गई; इनमें 65% रेपिस्ट, सबसे ज्यादा UP से 13 को डेथ पेनल्टी

तारीख 17 दिसंबर 2017। हैदराबाद के नर्सिंगी में एक कंस्ट्रक्शन साइट पर कुछ मजदूर काम कर रहे थे। ज्यादातर मजदूर दूसरे राज्यों से थे। वे अस्थाई कैंप बनाकर परिवार के साथ वहां रह रहे थे। पास में ही पांच साल की एक मासूम खेल रही थी। वहां काम कर रहा एक मजदूर बच्ची को चॉकलेट दिलाने का लालच देकर एक पहाड़ी के नीचे ले गया और उसके साथ दुष्कर्म किया। फिर पत्थरों से सिर कुचलकर बच्ची की हत्या कर दी और वापस साइट पर लौट आया।

जब बच्ची की मां ने अपनी बेटी के बारे में पूछा तो मजदूर ने कहा कि वह उसे कैंप के पास छोड़ आया है, वह बच्चों के साथ खेल रही है। काफी देर बाद जब बच्ची नहीं लौटी तो उसकी मां ने नर्सिंगी थाने में शिकायत दर्ज कराई। पुलिस ने उस मजदूर को शक के आधार पर गिरफ्तार कर जांच करना शुरू किया। बाद में उस मजदूर ने अपना जुर्म कबूल लिया। अब करीब तीन साल बाद मंगलवार को हैदराबाद की एक जिला अदालत ने उसे मौत की सजा सुनाई है। मजदूर मध्यप्रदेश के बालाघाट जिले का रहने वाला है।

ये तो बस एक नजीर है। हाल के कुछ सालों में कोर्ट ने बच्चियों से दरिंदगी के मामले में संजीदगी दिखाई है। दरअसल भारत में कैदियों को लेकर प्रोजेक्ट 39A ने हाल ही में एक रिपोर्ट जारी की है। रिपोर्ट के मुताबिक पिछले साल देशभर में सेशन कोर्ट की तरफ से 76 कैदियों को मौत की सजा सुनाई गई। इनमें से 50 कैदी यानी करीब 65% को यौन अपराध (sexual offences) केस में सजा सुनाई गई। जो पिछले पांच साल के मुकाबले सबसे ज्यादा है। चौंकाने वाली बात यह है कि 82% केस में विक्टिम नाबालिग है।

सेक्सुअल ऑफेंस के केस में सबसे ज्यादा मौत की सजा

2016 में 17.64% कैदियों को सेक्सुअल ऑफेंस के केस में मौत की सजा सुनाई गई थी, जबकि 2020 में यह आंकड़ा बढ़कर 64.93% पहुंच गया। यानी पिछले पांच साल में सेक्सुअल ऑफेंस के केस में करीब 47% डेथ पेनल्टी बढ़ी है। इसके पीछे महिलाओं की जागरूकता और पॉक्सो एक्ट (POCSO ) में बदलाव को माना जा रहा है। 2018 में इस एक्ट में बदलाव किया गया था और 12 साल से कम उम्र की लड़कियों के साथ सेक्सुअल ऑफेंस के केस में मौत तक की सजा का प्रावधान किया गया।

सेक्सुअल ऑफेंस के केस में मौत की सजा में बढ़ोतरी क्यों हुई?

जेल सुधारक के रूप में काम करने वाली और तिनका-तिनका फाउंडेशन की संस्थापक वर्तिका नंदा कहती हैं कि आंकड़ा बढ़ने का मतलब है कि अब अदालतें इन मामलों को गंभीरता से ले रही हैं और प्रमुखता से सुनवाई भी कर रही हैं। इसके साथ ही पिछले कुछ सालों में मीडिया ने भी महिलाओं को न्याय दिलाने में अहम भूमिका निभाई है। लगातार रिपोर्टिंग और फॉलोअप का फायदा हुआ है। एक बड़ी वजह ये भी है कि अब कोर्ट ने महिलाओं के लिए यह सुविधा दी है कि वो जहां चाहें अपनी शिकायत दर्ज करा सकती हैं और अपने केस की न्यायिक प्रक्रिया में भाग ले सकती हैं। इससे महिलाओं का मनोबल बढ़ा है। वे शिकायत दर्ज कराने के लिए आगे आ पा रही हैं।

इसके साथ ही वे यह भी कहती हैं कि अभी भी देश में शिकायत दर्ज कराने वाली महिलाओं की संख्या बहुत ज्यादा नहीं है। बहुत कम ही महिलाएं शिकायत दर्ज करा पाती हैं। ज्यादातर मामलों में तो शिकायत दर्ज कराने के बाद भी उन्हें न्याय नहीं मिलता है। कई बार शिकायत वापस लेने के लिए भी उन पर दबाव बनाया जाता है। अभी सब कुछ ठीक होने में टाइम लगेगा। अच्छी बात है कि धीरे-धीरे ही सही, लेकिन चीजें बदल रही हैं। इन मामलों को गंभीरता से लिया जा रहा है।

2020 में कोरोना की वजह से घट गया आंकड़ा?

साल 2019 में 103 लोगों को मौत की सजा सुनाई गई थी, लेकिन इस बार सिर्फ 76 को ही मौत की सजा हुई है। इसके पीछे सबसे बड़ी वजह कोरोना और लॉकडाउन को माना जा रहा है, क्योंकि कोर्ट बंद होने और सीमित सुनवाई के चलते ज्यादातर मामलों की सुनवाई ही नहीं हो सकी। इसका अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि पिछले साल मार्च तक 48 कैदियों को मौत की सजा सुनाई गई थी। जबकि 2019 में मार्च तक यह आंकड़ा महज 20 था। पिछले दो दशक में सबसे ज्यादा 2018 में 163 कैदियों को मौत की सजा सुनाई गई थी। उस साल भी मार्च तक यह आंकड़ा सिर्फ 27 था। इसका मतलब है कि अगर लॉकडाउन नहीं लगा होता तो 2020 में ये आंकड़ा ज्यादा होता।

हाईकोर्ट – सुप्रीम कोर्ट आते-आते बदल जाता है आंकड़ा

ज्यादातर मामलों में सेशन कोर्ट के बाद हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट तक केस पहुंचने के बाद आंकड़ा बदल जाता है। 31 दिसंबर 2020 तक भारत में कुल 404 कैदी हैं, जिन्हें मौत की सजा होनी है। इनमें सबसे ज्यादा यूपी से 59 कैदी हैं। जबकि 31 दिसंबर 2019 तक ये आंकड़ा 378 था। यानी एक साल में 26 का इजाफा हुआ है।

पिछले 20 साल में आठ को फांसी हुई

पिछले 20 साल में भारत में 8 लोगों को फांसी हुई है। इनमें चार को पिछले साल मार्च में दिल्ली गैंगरेप केस में फांसी हुई थी। इसके पहले जुलाई 2015 में याकूब मेनन, फरवरी 2013 में अफजल गुरु, नवंबर 2012 में अजमल कसाब और अगस्त 2004 में धनंजय चटर्जी को फांसी हुई थी।

दुनियाभर में 2019 में 657 लोगों को सजा-ए-मौत दी गई

दुनियाभर में अभी 53 देशों में मौत की सजा का प्रावधान है। एमनेस्टी इंटरनेशनल की एक रिपोर्ट के मुताबिक 2019 में 657 लोगों को मौत की सजा दी गई थी, जबकि 2018 में यह आंकड़ा 690 था। अगर डेथ पेनल्टी की बात करें तो 2019 में 2307 लोगों को मौत की सजा सुनाई गई। इसमें ईरान, इराक, पाकिस्तान और सउदी अरब का आंकड़ा सबसे ज्यादा है। हालांकि इस लिस्ट में चीन और नॉर्थ कोरिया का नाम शामिल नहीं है, क्योंकि वे इसे गोपनीय रखते हैं। एमनेस्टी का मानना है कि चीन में हर साल एक हजार से ज्यादा लोगों को मौत की सजा सुनाई जाती है।साभार-दैनिक भास्कर

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