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नाइट शिफ़्ट में महिलाओं के हक़ों को क्या मार रही हैं कंपनियाँ

“हमारा ऑफिस सात बजे के बाद शुरू होता है और सुबह क़रीब चार बजे ख़त्म होता है. लेकिन, हमें अपने ही इंतज़ाम से आना-जाना पड़ता है. मैं सुबह के चार बजे अपनी स्कूटी से घर जाती हूं. रास्ते में डर भी लगता है लेकिन कोई और तरीक़ा नहीं है क्योंकि आने-जाने की सुविधा के लिए नौकरी नहीं छोड़ सकते.”

इंदौर में एक केपीओ में काम करने वाली साक्षी गोयल ने बताया कि कैसे कंपनियां नियमों की उपेक्षा करके महिलाओं को ख़तरे में डाल रही हैं.

साक्षी बताती हैं कि वहां इंटरव्यू में ही पूछ लिया जाता है कि आपके पास आने-जाने की ख़ुद की कोई सुविधा है या नहीं. अगर अपना इंतज़ाम नहीं, तो नौकरी नहीं.

श्रम शक्ति में महिलाओं की भागीदारी और महिला सुरक्षा का मुद्दा कई बार उठता रहा है लेकिन इसके बावजूद भी कई कंपनियां इसे गंभीरता से नहीं लेतीं.

16 दिसंबर, 2012 के निर्भया गैंगरेप के बाद दिल्ली पुलिस ने निजी कंपनियों के लिए महिला कर्मचारियों को घर तक छोड़ने की सुविधा देना अनिवार्य कर दिया था.

वित्ती मंत्री निर्मला सीतारमण ने भी बजट पेश करते हुए कहा था कि महिलओं को पर्याप्त सुरक्षा के साथ सभी सेक्टर्स में और रात की शिफ्ट में काम करने की अनुमति होगी.

महिलाओं के रात की शिफ्ट में काम करने से जुड़े नियम पहले ही बन गए थे. व्यावसायिक सुरक्षा, स्वास्थ्य और कार्य स्थिति संहिता, 2020 को अधिसूचित किया जा चुका है और ये एक अप्रैल से लागू होने वाला है.

इन नियमों के मुताबिक़ सुबह छह बजे से पहले और शाम को सात बजे के बाद महिलाओं के काम करने पर कंपनी को इन नियमों का पालन करना होगा.

– महिला कर्मचारी की सहमति ली जाएगी. उनकी सुरक्षा, छुट्टियां और काम के घंटों का ध्यान रखना ज़रूरी है.

– सामाजिक सुरक्षा संहिता, 2020 (36 एफ 2020) के तहत मातृत्व लाभ प्रावधानों के ख़िलाफ़ किसी भी महिला को नियुक्त नहीं किया जाएगा.

– शौचालय, वॉशरूम, पेयजल, महिला कर्मचारी के प्रवेश और निकास से संबंधित जगहों सहित कार्यस्थल पर पूरी तरह रोशनी होनी चाहिए.

– जहां महिलाएं काम करती हैं वहां नज़दीक ही शौचालय और पीने के पानी की सुविधा भी होनी चाहिए.

– सुरक्षित और स्वस्थ कार्य स्थितियां प्रदान करें ताकि कोई महिला कर्मचारी अपनी नौकरी के संबंध में किसी चीज़ से वंचित ना रहे.

– कार्यस्थल पर महिलाओं के यौन उत्पीड़न (रोकथाम, निषेध और निवारण) अधिनियम, 2013 (2013 के 14) के प्रावधान का अनुपालन किया जाएगा.

लेकिन, साक्षी का उदाहरण देखें तो क्या वित्त मंत्री के कहने और नियम बनने के बाद स्थिति में कुछ बदलाव आ पाएगा? ये नियम महिलाओं के लिए कितने मददगार होंगे?

फ्रीलांस कर्मचारियों की समस्या

सुप्रीम कोर्ट के वकील विराग गुप्ता कहते हैं कि नियम बनाना और वित्त मंत्री का इस बारे में ज़िक्र करना अच्छी बात है. इससे लोगों का ध्यान इन मुद्दों की तरफ़ जाता है. लेकिन, इसमें एक पक्ष पूरी तरह से उपेक्षित हो जाता है.

वह कहते हैं, “संगठित क्षेत्र में भी स्थितियां ऐसी हैं कि वहां के कर्मचारियों की कोई अधिकृत संख्या और जानकारी नहीं है. प्लेटफॉर्म इकोनॉमी यानी डिज़िटल प्लेटफॉर्म संगठित तो दिखता है लेकिन ये असंगठित है. जैसे उबर, ओला और मीडिया आदि ऐसी कई कंपनियां हैं जहां काम करने वाले लोग उनके कर्मचारी ही नहीं होते हैं. जब वो कंपनी के कर्मचारी ही नहीं होते तो उन पर कार्यस्थल के नियम कैसे लागू होंगे.”

“जैसे कि ओला और उबर कहते हैं कि हमारे साथ इतनी संख्या में ड्राइवर काम करते हैं. लेकिन, असल में वो तो कंपनी के कर्मचारी हैं ही नहीं. इसलिए कंपनी उन्हें सुविधाएं देने के लिए बाध्य नहीं है. कर्मचारी के प्रति कंपनियों की कई ज़िम्मेदारियां होती हैं. जैसे पीएफ, छुट्टियां, ओवरटाइम और सामाजिक सुरक्षा आदि.”

हमारे देश में निजी और सरकारी क्षेत्र में एजेंसी के ज़रिए भी लोग नियुक्त किए जाते हैं. जैसे कंपनी में सफाईकर्मी, चपरासी, सहायक और सुरक्षागार्ड आदि एजेंसी के ज़रिए काम करते हैं.

इसके अलावा मीडिया और आईटी सेक्टर आदि में फ्रीलांसर्स का भी इस्तेमाल होता है. ये अनुबंध और एडहॉक पर भी नहीं होते हैं. अगर महिलाएं किसी कंपनी में बाहरी एजेंसी से जुड़ी होती हैं तो उन्हें रात की शिफ्ट में सुविधाएं देने के लिए कंपनियां बाध्य नहीं होती हैं.

कुछ ऐसी ही बात पूजा सिंह भी बताती हैं जो एक इंडियन आर्टिस्ट एंड इवेंट मैनेजमेंट कंपनी में वीडियो एडिटर के तौर काम करती हैं.

पूजा ने बताया, “मुझे कई बार रात की शिफ्ट में भी काम करना होता है. मैं रात को ओला या उबर करके घर जाती हूं. कंपनी के पे-रोल पर होने के कारण मुझे कैब के पैसे वापस मिल जाते हैं. लेकिन हमारे साथ कई फ्रीलांसर्स भी काम करते हैं. उन्हें घर जाने के लिए ना तो कैब मिलती है और ना ही उसके पैसे. आने-जाने की पूरी ज़िम्मेदारी और खर्चा उनका अपना ही होता है.”

“ऑफिस से कैब मिलने पर सुरक्षित महसूस होता है. मुझे याद है जब पहली बार मेरी रात की शिफ्ट लगी थी तो घरवाले थोड़े डरे हुए थे. जब मैंने बताया कि ऑफिस की कैब लेने और छोड़ने आएगी तो उन्हें राहत महसूस हुई. ऑफिस की कैब से उन्हें ये लगता है कि ऑफिस ने ज़िम्मेदारी ली है.”

अवसर ना मिलना

नाइट शिफ्ट में सुरक्षा और सुविधाओं पर ज़ोर देना इसलिए भी मायने रखता है क्योंकि महिलाएं इसके कारण कई मौक़ों से वंचित हो जाती हैं.

मीडिया क्षेत्र में काम करने वालीं ज्योती शर्मा बताती हैं, “रात में काम करने से कोई समस्या नहीं है लेकिन घर से लाने और छोड़ने की सुविधा तो देनी चाहिए. मैं जिस मीडिया हाउस में काम करती थी वहां रात के लिए सिर्फ़ दो कैब थी इसलिए लड़कियों को रात की शिफ्ट में रखा नहीं जाता था. रात के व्यक्ति के पास पूरी वेबसाइट देखने की बड़ी जिम्मेदारी होती थी लेकिन लड़कियों को कभी ये मौका नहीं मिला.”

“साथ ही हमें ये भी पता नहीं होता कि ऐसे में क्या करें. कंपनी के पास कैब नहीं है तो आप रात की शिफ्ट करने के लिए किससे लड़ सकते हैं.”

रात की शिफ्ट ना मिलने से लड़कियों से कई मौक़े भी छिन जाते हैं. जैसे रात की शिफ्ट का अलाउंस, रात को कम लोग होने के कारण बड़ी जिम्मेदारी संभालने का मौका और एक बराबरी का अहसास.

ये अहसास बहुत मायने रखता है वरना ये भावना हमेशा रहती है कि लड़के तो आपसे कठिन काम कर रहे हैं. कई जगह लड़कों को नौकरी में इस कारण भी प्राथमिकता दी जाती है क्योंकि लड़िकयां रात को काम नहीं कर सकतीं.

एसईटू डिजिटल सर्विस एलएलपी कंपनी में एचआर हेड सुमित भाटिया बताते हैं, “बड़ी कंपनियां तो लगभग इन नियमों का पालन कर लेती हैं लेकिन छोटी कंपनियों में इस पर बहुत ज़्यादा ज़ोर नहीं होता. वो इस पर होने वाले खर्चे से बचना चाहते हैं जबकि हमने देखा है कि अगर आप शिफ्ट्स में विविधता रखते हो तो ऑफिस का माहौल और बेहतर बनता है.”

सुमित ने बताया, “एसईटू में कई महिलाएं रात की शिफ़्ट में काम करती हैं. उनके लिए परिवहन से लेकर ऑफिस के अंदर की सभी सुविधाओं का इंतज़ाम किया गया है.”

“जैसे उन्हें ऑफिस कैब में ही लाया जाता है और घर छोड़ा जाता है, अगर कैब में अकेली हों तो एक गार्ड भी साथ में जाता है. उन्हें यौन उत्पीड़न से जुड़े उनके अधिकारों के बारे में बताया गया है.”

घरेलू काम की ज़िम्मेदारियां

विश्व बैंक के मुताबिक़ भारत में साल 2020 में महिलाओ की श्रम शक्ति में ज़िम्मेदारी लगभग 19 प्रतिशत है जबकि पुरुषों की 76 प्रतिशत है.

इस भागीदारी को बढ़ाने के लिए भी महिलाओं को हर क्षेत्र में आगे लाना ज़रूरी है. रात की शिफ्ट को बेहतर बनाना भी कार्यस्थल की स्थितियों को सुधारने का ही हिस्सा है जिससे महिला कर्मचारी सहज महसूस कर सकें और उन्हें प्रोत्साहन मिल सके.

लेकिन, सेंटर फॉर डेवलपमेंट ऑल्टरनेटिव्स में अर्थशास्त्र की डायरेक्टर और प्रोफेसर इंदिरा हीरवे कहती हैं कि कार्यस्थल की स्थितियों के साथ-साथ महिलाओं की घरेलू स्थिति पर भी ग़ौर करना ज़रूरी है.

इंदिरा हीरवे कहती हैं, “महिलाओं को रात की शिफ्ट में बुलाने का मतलब है कि उनके घर की ज़िम्मेदारी कोई और संभालेगा लेकिन कितनी महिलाओं को ये सहूलियत मिल पाती है. उन पर काम का बोझ इतना ज़्यादा होता है कि वो असामान्य शिफ्ट्स में काम नहीं कर पाती हैं.”

“कई नौकरीपेशा महिलाओं पर घरेलू काम का बोझ बहुत अधिक है. उन्हें घर के बच्चों और बुज़ुर्गों का भी ध्यान रखना होता है. ऐसे में महिलाओं की राह में रोड़ा बनने वाली इस समस्या की महिला और विकास मंत्रालय पूरी तरह उपेक्षा करता है.”

इंदिरा हीरवे कहती हैं कि इसका उपाय ये है कि घर के सभी लोगों को आपस में काम बांटने होंगे. सिर्फ़ अच्छा कार्यस्थल इस समस्या को हल नहीं कर सकता.

तालमेल के अभाव का फ़ायदा उठातीं कंपनियां

एडवोकेट विराग गुप्ता श्रम क़ानून और कार्यस्थल संबंधी नियमों के अनुपालन में एक और महत्वपूर्ण बाधा का ज़िक्र करते हैं.

वह कहते हैं, “भारत में परंपरागत रूप से फैक्ट्रीज़ एक्ट हुआ करता था. कारखाने होते थे और खनन का काम होता था. बाज़ार होता था जो शॉप्स एंड इस्टेबलिशमेंट एक्ट से संचालित होता है. इसमें कुछ राज्य के क़ानून से और कुछ केंद्र के क़ानून से निर्धारित होते हैं. अगर सुरक्षा की बात करें तो क़ानून और व्यवस्था राज्य का विषय है. केंद्र ने क़ानून बना दिया है लेकिन कर्मचारियों को सुरक्षित पहुंचाना इसमें राज्य की ज़िम्मेदारी आ जाती है.”

“लेकिन, कंपनियां वैश्विक स्तर पर अलग-अलग देशों में काम कर रही हैं. उनका ठीक से कोई स्थायित्व ही नहीं है. उनके लिए सिंगल रजिस्ट्रेशन या सिंगल लाइसेंसिंग की व्यवस्था होने से है उनका राज्य सरकारों से कोई खास तालमेल नहीं बन पाता.”

विराग गुप्ता सवाल करते हैं कि पूंजीवादी व्यवस्था में आप समाजवादी दृष्टिकोण को संतुलित करने का प्रयास तो करते हैं लेकिन, कंपनी को पूरी छूट भी दे देते हैं तो इसमें संतुलन कैसे बैठाएंगे.

विराग गुप्ता कहते हैं कि इन नियमों का पालन ना करने पर क्या दंडात्मक कार्रवाई होगी ये भी साफ नहीं है. वहीं, रात की शिफ्ट में महिला की सहमति की बात इसलिए की गई है क्योंकि कई कंपनियां बिना सुविधा और सहमति के महिलाओं को रात की शिफ्ट में रखती हैं और वो मज़बूरी में काम भी करती हैं.

कार्यस्थल की स्थितियां सुधारना अच्छा कदम है लेकिन महिलाओं की श्रम शक्ति में भागीदारी बढ़ाने के उद्देश्य को पूरा करने के लिए कई और पक्षों पर गौर करना ज़रूरी है.साभार- बीबीसी न्यूज़

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