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‘तलाक़शुदा’ होने पर शर्म क्यों, ये जीवन का अंत तो नहीं – ब्लॉग

हाल ही में मैंने पूर्व मिस एशिया पैसिफ़िक और अभिनेत्री दिया मिर्ज़ा की शादी की ख़ूबसूरत तस्वीरें देखीं. उन्होंने मुंबई के कारोबारी वैभव रेखी से ब्याह किया है.

ये शादी मीडिया में काफ़ी चर्चित हुई. सिर्फ़ इसलिए नहीं कि ये एक सेलेब्रिटी की शादी थी. बल्कि, इसके कई और भी कारण थे, जो काफ़ी हद तक वाजिब भी थे.

शादी की रस्में एक महिला पुजारी ने कराईं. शादी के बाद ना तो दुल्हन विदा हुई और न ही बेटी के बाप ने कन्यादान किया.

दिया मिर्ज़ा ने इसके बारे में कहा कि “सही चुनाव से ही बदलाव की असल शुरुआत होती है.”

लेकिन निजी तौर पर मुझे इस शादी की जो तस्वीर सबसे ख़ूबसूरत लगी, वो थी जब वैभव की बेटी समायरा, दिया मिर्ज़ा का हाथ पकड़कर उन्हें मंडप की तरफ़ ले जा रही थीं. उन्होंने हाथ में एक कार्ड लिया हुआ था, जिसपर लिखा था, ‘पापा की बिटिया’.

शादी के बाद की तस्वीरों में हमने समायरा को इस शादी का जश्न मनाते हुए भी देखा. वो दूल्हा दुल्हन पर पंखुड़ियों की बारिश कर रही थीं. और, अपने पिता की शादी में पूरे दिल से शरीक थीं.

पिता की शादी में बेटी के शरीक होने की अहमियत को वैभव की पूर्व पत्नी सुनयना रेखी ने भी दोहराया.

उन्होंने इंस्टाग्राम पर नवविवाहित जोड़े को शादी की मुबारक़बाद देते हुए एक वीडियो पोस्ट किया. सुनयना ने अपने वीडियो में ज़ोर देकर ये बात दोहराई कि उन्हें इस बात की ख़ुशी है कि उनकी बेटी को (दिया मिर्ज़ा के रूप में) एक नया परिवार मुंबई में मिल गया है और वो अपने पिता की शादी के जश्न में शामिल है.

दिया मिर्ज़ा के माता-पिता के बीच भी तलाक़ हो गया था और वो अपने मिस इंडिया बनने के दिनों से ही अपनी ज़िंदगी पर अपने सौतेले पिता के अच्छे असर के बारे में खुलकर बताती रही हैं.

आप सोच रहे होंगे कि भला मुझे इन बातों में इतनी दिलचस्पी क्यों है?

इसकी वजह ये है कि मैं भी एक बच्ची की तलाकशुदा माँ और अकेली अभिभावक हूँ. क्योंकि, दिया मिर्ज़ा के दोबारा शादी करने के कुछ दिनों बाद ही मैं अपने तलाक़ की सालगिरह का जश्न मना रही थी.

वैसे तो, मेरे तलाक़ के आधिकारिक दस्तावेज़ पर क़ानूनी मुहर लगे तीन साल हो चुके हैं, लेकिन उससे पहले हम अलगाव और रिश्तों में तनाव के लंबे दौर से गुज़र चुके थे.

सांकेतिक तस्वीर
तलाक़ का जश्न मनाने की वजह

जैसे ही मैंने तलाक़ की सालगिरह का जश्न मनाने वाली पोस्ट सोशल मीडिया पर डाली, वही सवाल मेरे सामने फिर दोहराए गए जो पहले भी पूछे जाते रहे हैं. तलाक़ में आख़िर जश्न मनाने जैसा क्या है? क्या ये इतना आसान होता है? क्या आप दूसरी औरतों को भी तलाक़ लेने की सलाह देंगी? क्या माँ-बाप के बीच तलाक़ से बच्चे के लिए मुश्किल नहीं होती?

मैं इन सवालों के जवाब बारी-बारी से देना चाहती हूं.

मैं अपनी ज़िंदगी की उस ‘ख़ौफ़नाक उपलब्धि’ के पहले और बाद की ज़िंदगी का जश्न मनाती हूं. मुझे नहीं लगता कि लोग नाख़ुश रहने के लिए शादी करते होंगे. न ही शादी का उनका मक़सद आगे चलकर तलाक़ लेने का होता होगा. ख़ासतौर से जब उनके बच्चे भी हो जाते हैं.

उस वक़्त उनके ज़ेहन में भले ही पूरी ज़िंदगी साथ बिताने का ख़याल न हो. मगर, वो आने वाले कई बरस तक साथ रहने की सोच लेकर तो चलते ही हैं. लेकिन, ज़िंदगी उसी रास्ते पर चले जिसकी आपने उम्मीद लगाई हो, ये जरूरी तो नहीं?

मेरी शादीशुदा ज़िंदगी क़रीब दो दशक लंबे रिश्ते का सफ़र रही. इनमें से तेरह बरस एक ऐसी ही शादी के थे. तो, इससे दूसरे सवाल का जवाब अपने आप ही मिल जाता है – निश्चित रूप से तलाक़ लेना आसान नहीं रहा था.

मेरे लिए निजी तौर पर तो और भी मुश्किल था क्योंकि कुछ बरस पहले ही मेरे पिता की मौत हो गई थी और मेरी बेटी के पास जज़्बाती सहारा हासिल करने के लिए कोई और नहीं था. न ही उसके पास कोई सामाजिक या पैसे की मदद का कोई आधार था.

कोई भी रिश्ता कितना ख़राब क्यों न हो, उससे अलगाव बेहद कठिन होता है. संबंध कितने ही क्यों न बिगड़ जाएं. आपके साथ बदसलूकी हो रही हो, ज़ुल्म ढाए जा रहे हों, मोहब्बत का नामोनिशां न हो या फिर रिश्ते की शुरुआत प्यार से हुई हो और ताल्लुक़ात दोस्ताना हों, जो आगे चलकर बिगड़ जाएं – पर, अलगाव हर सूरत में तकलीफ़देह ही होता है.

भारत में मर्दों से ज़्यादा महिलाएं तलाकशुदा हैं
बेहद निजी तजुर्बा

मैं किसी को तलाक़ लेने की सलाह नहीं देती. किसी को लेना भी नहीं चाहिए. शादी हो या तलाक़. दोनों ही बेहद निजी तजुर्बे होते हैं. ऐसे में फ़ैसला भी उसी का होना चाहिए, जिस पर बीत रही हो.

लेकिन हां, मैं पुरुषों और महिलाओं – हर किसी को यही सलाह देती हूं कि वो ख़राब संबंधों या हालात की बंदिशों से ख़ुद को आज़ाद कर ले. फिर वो रिश्ता शादी का हो या कोई और हो. और मैं ये सलाह भी देती हूं कि आपके जानने वाले ऐसा कोई फ़ैसला लें, तो उनकी हर मुमकिन मदद भी करें.

माता-पिता के बीच अलगाव निश्चित रूप से बच्चों के लिए बेहद मुश्किल भरा होता है. किसी के लिए भी अकेले रहकर बच्चे की परवरिश करना आसान नहीं होता. हमारे समाज की सोच को देखते हुए अकेली, तलाक़शुदा औरतों के लिए तो ये और भी मुश्किल होता है.

हो सकता है कि बच्चे समाज के जो ताने झेलें, उसके लिए आपको ही ज़िम्मेदार समझने लगें. ‘घर तोड़ने’ का कलंक आप पर ही लगा दिया जाए. फिर भी, मुझे लगता है कि अगर माता-पिता के बीच झगड़े हो रहे हों, उनमें प्यार न हो तो बच्चे के लिए मां या पिता के साथ अकेले रहना ही बेहतर होगा, न कि झगड़ते माता-बाप के बीच पिसते रहना.

ज़िंदगी में आमूल-चूल बदलाव

अपने निजी सफ़र के बारे में दोबारा बताती हूं. तलाक़ केवल जज़्बाती तौर पर अलगाव नहीं होता, बल्कि ये किसी भी महिला की सामाजिक-आर्थिक स्थिति में भी बदलाव लेकर आता है.

अक्सर बाद की सारी ज़िंदगी तन्हा ही बिताने का जोख़िम भी होता है. मैंने भी ऐसे ख़यालों का सामना किया है. ये ऐसा मसला था, जिसने मेरी सेहत पर भी बुरा असर डाला. लेकिन, मुझे इस बात का ग़ुरूर भी है और दिली सुकून भी कि मैंने अपनी ज़िंदगी का फ़ैसला ख़ुद लिया और उसके नतीजे में आई मुश्किलों को भी झेला.

मैंने शुरुआती दौर में ही ये समझ लिया था कि जब आप पर ‘तलाक़शुदा’ होने का ठप्पा लग जाता है, तो ज़िंदगी आसान नहीं रह जाती. एक मुश्किल शादी-शुदा ज़िंदगी से आज़ादी की भारी क़ीमत चुकानी पड़ती है.

मैं पढ़ी-लिखी हूं, अपने पैरों पर खड़ी हूं, ख़ुदमुख़्तार हूं और भारत के एक बड़े शहर में रहती हूं. ये मेरी ख़ुशक़िस्मती है कि मेरे पास ये चीज़ें हैं. फिर भी मुझे समाज के उन तमाम तानों को झेलना पड़ा है.

बदचलन, ठंडी औरत जैसे जुमले उछाले गए. उसे सेक्स की लत कुछ ज़्यादा ही होगी. उसके दूसरे मर्दों के साथ रिश्ते होंगे. वो एक बेटा तक तो पैदा कर नहीं पायी. वो कितनी बुरी मां है कि बच्ची को उसके बाप से ही अलग कर दिया. इल्ज़ामों का ये सिलसिला अंतहीन होता है. समाज के वो तमाम ताने जो तलाक़ लेने वाली औरतों को दिए जाते हैं, वो सब मुझे भी झेलने पड़े थे.

मुझे याद है , एक बार मैंने अपनी एक दोस्त से कहा था कि हिंदुस्तान में तलाक़शुदा होने से बेहतर विधवा हो जाना है.

तालमेल बैठाने की समस्या

समाज आपको यौन कुंठा वाली नज़र से ही देखेगा. लोग ये सोचेंगे कि आप यौन संबंध बनाने को बेक़रार हैं. वो आप पर रहम भरी निगाह भी डालेंगे. आपको अपशकुन भी मानेंगे. वो शायद आप पर शादी के पवित्र बंधन और किसी परिवार को तोड़ने का इल्ज़ाम भी लगाएंगे. लेकिन, तलाक़ के बाद आमतौर पर औरत को ही सारे इल्ज़ामों का बोझ उठाना पड़ता है.

अगर दोबारा शादी हो भी जाए, तो अक्सर मिले जुले परिवारों में तालमेल बैठा पाना मुश्किल होता है.

आप बॉलीवुड की फ़िल्मों में दोबारा शादी के बाद की हसीन दुनिया पाने का ख़्वाब तो कतई न देखें. असल ज़िंदगी में वैसा शायद ही कभी होता हो कि किसी तलाक़शुदा औरत को दोबारा शादी करने के बाद समाज में पहले जैसा दर्जा हासिल होगा.

तो यक़ीनन, तलाक़ के बाद की ज़िंदगी में बहुत कुछ दांव पर लगा होता है. तलाक़ का फ़ैसला बेहद मुश्किल होता है और इसकी भारी क़ीमत भी चुकानी पड़ती है.

लेकिन, अब सबसे बड़ा सवाल ये आता है कि क्या मैं तलाक़शुदा होने पर शर्मिंदा हूं?

नहीं. ऐसा बिल्कुल भी नहीं है. मैं एक रिश्ते में वचनबद्ध थी. जब ये रिश्ता लंबा नहीं चल सका, तो मैं ऐसे रिश्ते के बंधन से क़ानूनी और सम्मानजनक तरीक़े से आज़ाद हो गई.

शर्म का अहसास

क्या मेरी बेटी को मेरे तलाक़शुदा होने पर शर्म आती है?

हो सकता है कि उसे शुरुआत में कुछ शर्मिंदगी एहसास रहा हो. वो अपने दोस्तों को मां के तलाक़शुदा होने के बारे में बताने से हिचकती रही हो. आख़िर वो तब बस आठ बरस की तो थी.

लेकिन, इस दौरान मैं अपनी बेटी से लगातार बात करती रही थी. सच तो ये है कि मैं जब भी कोर्ट जाती थी, तो उसके बारे में अपनी बेटी को समझाती थी कि मैं क्यों वहां जाती हूं. पति से अलगाव का क़ानूनी तरीक़ा क्या होता है.

हमारा तलाक़ आपसी सहमति से हुआ था इसलिए तलाक़ लेने के दौरान जिस क़ानूनी यातना से गुज़रना पड़ता है उससे मैं बच गई. लेकिन, मैंने दिल्ली की ज़िला पारिवारिक अदालतों में ऐसे कई मुक़दमों को देखा, जहां समाज के हर तबक़े की औरतें अपनी लड़ाई लड़ने आती थीं. उन्हें परिवार से बमुश्किल ही कोई मदद मिलती थी. कई बार तो वो भी मयस्सर न होती.

नई भागदौड़ – नई ज़िंदगी

ऐसी कई औरतें थीं जो अकेले ही बच्चों की कस्टडी, गुज़ारा भत्ता या कई बार अपने सिर पर एक छत का जतन करने और कई बार बच्चों के स्कूल की फ़ीस भरने के लिए क़ानूनी जद्दोज़हद से जूझ रही होती थीं. उनका संघर्ष देखना बेहद तकलीफ़देह होता था. उन औरतों से बात करके मैंने दो और जज़्बात इकट्ठे कर लिए थे – डर और शर्मिंदगी.

मेरी अपनी मां शुरुआत में अपने परिवारवालों, रिश्तेदारों या अपने जानने-पहचानने वालों को ये नहीं बताना चाहती थी कि उनकी बेटी तलाक़ ले रही है. और हां, मैं ये क़ुबूल करती हूं कि ये मेरे लिए बिल्कुल नई बात थी. कोविड-19 के दौरान मैं अक्सर ख़ुद को इस डरावने ख़याल की गिरफ़्त में पाती थी कि अगर कहीं मुझे कुछ हो गया, तो मेरी बेटी का क्या होगा?

निश्चित रूप से समाज में अपने पति से अलग होने वाली औरतों के प्रति संवेदनशीलता या हमदर्दी की कमी है. लोग तमाम तरह के अजीबोगरीब सवाल करते हैं. सालगिरह और जन्मदिन के जश्न जैसे मौक़ों पर अक्सर एक ख़ालीपन आ जाता है. कुछ खो देने का एहसास बड़ी शिद्दत से महसूस होता है. फिर भी न तो मुझे तलाक़ लेने का अफ़सोस है और न ही ख़ुद के तन्हा होने पर मुझे कोई शर्म आती है.

हाल ही में मैं अपना पासपोर्ट फिर से जारी कराने के लिए गई थी. पुलिस वेरिफ़िकेशन के दौरान, मुझे असहज कर देने वाले कई सवालों का सामना करना पड़ा. मसलन घर का किराया कौन देता है और क्यों? मैं अपना नाम क्यों नहीं बदल रही हूँ? वग़ैरह, वग़ैरह…

जब तक हमारे आपके इर्द-गिर्द का समाज नहीं बदलेगा. जब तक लोग शादी के सामान्य होने के साथ-साथ तलाक़ को भी सामान्य नज़र से देखना नहीं शुरू करेंगे.

तब तक मुझे लगता है कि मैं और मेरे जैसी दूसरी औरतों को अपनी चमड़ी मोटी करनी पड़ेगी और हमें शर्मिंदा करने की कोशिश करने वालों की आंखों में आंखें डालकर बात करनी होगी, खुद पर लगने वाले तमाम इल्ज़ामों को परे धकेलना होगा.

हां, इस दौरान हो सकता है कि तन्हाई हावी हो जाए. क्योंकि, तलाक़ लेने के बाद बहुत सी महिलाओं के लिए बाक़ी की ज़िंदगी अकेले ही बितानी पड़ती है.

लेकिन, अपने फ़ैसले ख़ुद लेने की ताक़त होने की अपनी अलग ख़ुशी होती है, गर्व का एहसास होता है. अब इसके लिए अगर कोई क़ीमत चुकानी पड़े, तो उसके लिए भी तैयार रहना चाहिए.साभार-बीबीसी न्यूज़ हिंदी

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