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क्यों ग़लत है बलात्कार के अपराध पर शादी का सुप्रीम कोर्ट का सुझाव?

जब न्यायपालिका बलात्कार के इंसाफ़ के लिए शादी का रास्ता सुझाती है, तो तीन बातें होती हैं:

  • एक बार फिर बलात्कार को हिंसा की नहीं, बल्कि समाज में इज़्ज़त लुटने की नज़र से देखा जाता है.
  • बलात्कार जैसे हिंसक अपराध से औरत को हुई शारीरिक और मानसिक पीड़ा को दरकिनार कर दिया जाता है.
  • हिंसा को आम मान लिया जाता है, मानो उसके लिए सज़ा अनिवार्य ही ना हो.

जब ये सुझाव सबसे ऊँची अदालत के सबसे ऊँचे न्यायाधीश से आता हैतो इसका असर और व्यापक हो जाता है.

सोमवार को चीफ़ जस्टिस एसए बोबडे की अगुवाई वाली सुप्रीम कोर्ट की तीन जजों की बेंच ने महाराष्ट्र में एक स्कूली छात्रा के बलात्कार के अभियुक्त से पूछा कि क्या वो पीड़िता से शादी करना चाहते हैं?

कोर्ट ने ऐसा निर्देश नहीं दिया, लेकिन अभियुक्त के वकील से ये ज़रूर पूछा था, हालाँकि अब वो अभियुक्त शादीशुदा है. इसके साथ ही अदालत ने अभियुक्त को चार सप्ताह तक गिरफ़्तार ना किए जाने का आदेश दिया.

बलात्कार के कई मामलों में क़ानूनी लड़ाई लड़ चुकीं, दिल्ली में काम करनेवालीं वकील सुरभि धर इसे चौंकाने और परेशान करने वाली टिप्पणी बताते हुए कहती हैं, “ऐसा सुझाव देना ही पीड़िता की तौहीन है, उसके साथ हुई हिंसा को अनदेखा करना है, अमानवीय बर्ताव है.”

उनके मुताबिक़ इंसाफ़ मिलने की कोई अच्छी मिसाल आम लोगों तक पहुँचे ये ज़रूरी नहीं, लेकिन इस तरह की टिप्पणी, जो बलात्कार पीड़ित को पुलिस और न्यायपालिका का रास्ता चुनने से ही डराएगी, ज़रूर व्यापक तौर पर अपना असर छोड़ती है.

सुरभि कहती हैं, “पीड़िता की कम उम्र, परिवार की माली हालत और अभियुक्त का प्रभुत्व, ये सब बलात्कार की शिकायत करने के रास्ते की अड़चनें हैं, अगर इन्हें पार कर एक लड़की न्याय के लिए क़दम आगे बढ़ाती है और फिर सुप्रीम कोर्ट से ऐसा सुझाव आता है, तो ये उसे और उसकी जैसी और लड़कियों को बिल्कुल हतोत्साहित कर सकता है.”

शादी के बाद भी जारी रह सकती हैं हिंसा

ये ऐसा पहला मामला नहीं है. पिछले साल मद्रास हाई कोर्ट ने भी बलात्कार के एक मामले में अभियुक्त को इस आधार पर ज़मानत दे दी थी कि उसने नाबालिग पीड़िता के बालिग हो जाने पर उससे शादी करने का वादा किया.

ऐसे ही फ़ैसले पिछले साल केरल, गुजरात और ओडीशा हाई कोर्ट ने भी दिए, जिनमें नाबालिग के बलात्कार के बाद उससे शादी करने के वादे पर या तो अभियुक्त को ज़मानत दे दी गई या मामले की एफ़आईआर ही रद्द कर दी गई.

बलात्कार पीड़ितों और उनके परिवारों से बातचीत कर न्याय प्रक्रिया के उनके अनुभव पर शोध कर रहीं गरिमा जैन इसे ख़तरनाक और दुखी करने वाला चलन बताती हैं.

अपने काम के दौरान वो एक ऐसी महिला के संपर्क में आईं, जिनके बॉयफ्रेंड ने 16 साल की उम्र में उनका बलात्कार किया और डेढ़ साल तक मुक़दमा चलने के बाद जज ने यही सुझाव दिया कि अभियुक्त उनसे शादी कर ले.

गरिमा बताती हैं, “नाबालिग लड़कियों पर पहले ही परिवार का बहुत दबाव रहता है, और फिर जब अदालत भी ऐसा रुख़ अपनाए, तो उनके लिए ना कहना और मुश्किल हो जाता है. उस महिला ने भी ज़बरदस्ती शादी के लिए हामी भरी, लेकिन उसके बाद गंभीर शारीरिक हिंसा से प्रताड़ित की गईं.”

आख़िर महिला ने घरेलू हिंसा का केस दर्ज किया. अब उनके पति को बलात्कार के लिए 10 साल की सज़ा हो गई है और वो जेल में हैं. शादी के बाद गर्भवती हुई महिला की एक छोटी बेटी है.

ओपी जिंदल यूनिवर्सिटी में पढ़ा रहीं गरिमा कहती हैं, “न्यायपालिका को और संवेदनशील होने की ज़रूरत है ताकि वो बलात्कार के मामलों में इज़्ज़त का दृष्टिकोण अपनाने से बाहर निकलें और इस तरह का इंसाफ़ सुझाने से पहले ये समझने की कोशिश करें कि इसका औरत की ज़िंदगी पर क्या असर पड़ेगा.”

क़ानून क्या कहता है?

साल 2012 में लाए गए ‘द प्रोटेक्शन ऑफ़ चिल्ड्रन अगेन्स्ट सेक्शुअल ऑफेन्सेस ऐक्ट’ (पॉक्सो) में ऐसे कई प्रावधान रखे गए हैं, जिनसे पुलिस में मामला दर्ज करने और न्यायिक प्रक्रिया में शामिल होने में आसानी हो.

मुक़दमे के निपटारे के लिए एक साल की मियाद तय की गई है और मुआवज़े का प्रावधान है ताकि नाबालिग के परिवार को ऐसे मामले लड़ने में मदद मिले.

लेकिन इनके लागू किए जाने में कई कमियाँ हैं. ‘हक़ सेंटर फॉर चाइल्ड राइट्स’ के कुमार शैलभ के मुताबिक़, “क़ानून को लागू करने के लिए सहायक सेवाओं और मूलभूत ढाँचों की कमी है, जिसके चलते न्यायिक प्रक्रिया की रफ़्तार अब भी धीमी है और नाबालिग पीड़िता पर केस दर्ज ना करने या उससे पीछे हटने या शादी के दबाव में आने की परिस्थितियाँ बन जाती हैं.”

साल 2019 में सुप्रीम कोर्ट ने नाबालिगों के ख़िलाफ़ बढ़ती यौन हिंसा का संज्ञान लेते हुए एक याचिका के तहत क़ानून के लागू होने के राष्ट्रीय आँकड़े मांगे.

कोर्ट के रजिस्ट्रार ने देशभर के हाई कोर्ट और पॉक्सो कोर्ट से जानकारी जुटाई, तो कुछ चौंकाने वाले तथ्य सामने आए.

पॉक्सो के 99 प्रतिशत मामलों में अंतरिम मुआवज़ा नहीं दिया गया. 99 प्रतिशत मामलों में आख़िरी मुआवज़ा भी नहीं दिया गया.

दो-तिहाई से ज़्यादा मामलों में पुलिस की जाँच ही एक साल में ख़त्म नहीं हुई. सिर्फ एक-तिहाई मामलों में मुक़दमे की सुनवाई एक साल में पूरी हुई.

90 प्रतिशत से ज़्यादा मामलों में अभियुक्त पीड़िता की जान-पहचान का व्यक्ति पाया गया. शैलभ कहते हैं, “नाबालिगों को अपने ही परिवार या जान-पहचान के व्यक्ति के ख़िलाफ़ केस दर्ज करने में और कठिनाई आती है, कई तरह के दबाव होते हैं, इसीलिए न्यायपालिका की ज़िम्मेदारी है कि वो पीड़िता के हक़ को आगे रखे.”

महाराष्ट्र के मामले में पहले खारिज हुई थी ज़मानत

शैलभ के मुताबिक़ सामाजिक दबाव में समझौते की पेशकश परिवारों की ओर से किया जाना अक़्सर देखने को मिलता है, लेकिन सुप्रीम कोर्ट की ऐसी पहल बहुत ग़लत संदेश देती है.

चीफ़ जस्टिस की अध्यक्षता वाली सुप्रीम कोर्ट की तीन जज की बेंच के सामने सुना गया महाराष्ट्र का मामला सिर्फ़ ज़मानत याचिका की सुनवाई का है.

बलात्कार के उस केस में ना अपराध की धाराएँ तय हुई हैं और ना ही मुक़दमा अभी शुरू हुआ है.

अदालत में दी गई जानकारी के मुताबिक़ इस मामले में अभियुक्त नाबालिग लड़की का रिश्तेदार है. आरोप है कि वो लंबे समय तक उसका पीछा करता रहा और धमकियाँ देकर बार-बार बलात्कार किया.

इसकी जानकारी सामने आने के बाद पीड़िता और अभियुक्त के परिवारों के बीच में एक समझौते के तहत ये तय किया गया कि पीड़िता के बालिग होने के बाद दोनों की शादी कर दी जाएगी.

लेकिन ऐसा नहीं हुआ, और बाद में इस मामले में पुलिस में शिकायत दर्ज हुई.

अभियुक्त को निचली अदालत से ज़मानत मिल गई. हालांकि बॉम्बे हाई कोर्ट की औरंगाबाद बेंच ने जज को ‘असंवेदनशील’ बताते हुए उस फ़ैसले की निंदा की और ज़मानत खारिज कर दी.

पॉक्सो क़ानून के तहत ज़मानत की शर्तें कड़ी रखी गईं हैं और ‘बर्डन ऑफ़ प्रूफ़’ यानी निर्दोष साबित करने का दायित्व अभियुक्त पर डाला गया है यानी दोषमुक्त होने से पहले तक अभियुक्त को दोषी माना जाता है.

लेकिन जब इस मामले की सुनवाई सुप्रीम कोर्ट ने की, तो अभियुक्त को गिरफ़्तारी से चार हफ़्ते की अंतरिम राहत दी है.

वकील सुरभि धर के मुताबिक़ सुप्रीम कोर्ट ने महाराष्ट्र के मामले में ज़मानत याचिका की सुनवाई करते वक्त क़ानून का बेहतर इस्तेमाल नहीं किया.

चीफ़ जस्टिस बोबडे ने अभियुक्त से पूछा, “अगर आप (पीड़िता से) शादी करना चाहते हैं, तो हम आपकी मदद कर सकते हैं. अगर ऐसा नहीं करते हैं तो आपकी नौकरी चली जाएगी, आप जेल जाएँगे. आपने लड़की के साथ छेड़खानी की, उनके साथ बलात्कार किया है.”

सुरभि का मानना है कि देश का सर्वोच्च न्यायालय का ये कहना समझ से परे है और दुनियाभर में यौन हिंसा के बारे में बनी समझ को दरकिनार कर देता है.

अब भारत की क़रीब 4000 महिलावादी ऐक्टिविस्ट्स और संगठनों ने एक चिट्ठी लिखकर चीफ़ जस्टिस बोबडे से अपना फ़ैसला वापस लेने की मांग की है.

उन्होंने लिखा है कि, “आपके फ़ैसले से ये संदेश जाता है कि शादी बलात्कार करने का लाइसेंस है, औऱ ऐसा लाइसेंस मिलने के बाद बलात्कार अभियुक्त अपने आप को क़ानून की नज़र में दोषमुक्त कर सकता है.”साभार-बीबीसी न्यूज़ हिंदी

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