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एयर स्ट्राइक के बाद इजराइल-फिलिस्तीन आमने-सामने, क्या है ताजा विवाद की वजह? यरुशलम में क्यों हो रहा 100 साल से संघर्ष? जानें सबकुछ

पढ़िए  दैनिक भास्कर की ये खबर….

इजराइल-फिलिस्तीन के बीच अब जंग जैसे हालात हो गए हैं। मंगलवार को फिलिस्तीन के हमास (इजराइल इसे आतंकी संगठन मानता है) की तरफ से इजराइल की राजधानी तेल अवीव, एश्केलोन और होलोन शहर को निशाना बनाया गया। सोमवार को भी हमास ने अपने कब्जे वाले इलाके गाजा पट्टी से इजराइल के यरुशलम पर रॉकेट दागे। इजराइल और फिलिस्तीन के बीच इस संघर्ष की वजह सालों पुरानी है। 1948 में इजराइल की आजादी के बाद से ही अरब देश और इजराइल कई बार आमने-सामने आ चुके हैं। फिलिस्तीन के प्रदर्शनकारी और इजराइली पुलिस के बीच आए दिन यरुशलम और उसके आसपास के इलाके में झड़पें होती रहती हैं।

आइये समझते है क्या है पूरा विवाद और फिलहाल क्यों सुर्खियों में हैं ये मामला…

ताजा विवाद की वजह क्या है?

विवाद की हालिया वजह इजराइल द्वारा शेख जर्राह को खाली कराया जाना है। शेख जर्राह पूर्वी यरुशलम का इलाका है जहां से इजराइल फिलिस्तीनी परिवारों को निकालकर यहूदी लोगों को बसा रहा है। फिलिस्तीनी लोग इसी का विरोध कर रहे हैं।

पिछला शुक्रवार रमजान महीने का आखिरी शुक्रवार था। इस वजह से यरुशलम की मस्जिद अल-अक्सा में काफी तादाद में मुस्लिम लोग नमाज अदा करने इकट्ठा हुए थे। नमाज के बाद ये लोग शेख जर्राह को खाली कराए जाने के विरोध में प्रदर्शन करने लगे। ये विरोध प्रदर्शन हिंसक हो गया और इस दौरान इजराइली सेना और फिलिस्तीनियों के बीच झड़प हुई।

यरुशलम में मुस्लिमों के पवित्र महीने रमजान के शुरू होने के बाद से ही इजराइली पुलिस और फिलिस्तीनियों के बीच झड़प की खबरें आ रही हैं। आम दिनों के मुकाबले रमजान में मस्जिद अल-अक्सा में आने वाले मुस्लिमों की संख्या ज्यादा होती है। इजराइली पुलिस ने यरुशलम शहर के दमास्कस गेट पर बैरिकेडिंग कर दी थी। मुस्लिमों का कहना था कि ये उनकी धार्मिक स्वतंत्रता को रोकने की कोशिश है। बढ़ते विरोध को देखते हुए पुलिस ने वहां से बैरिकेडिंग हटा तो दी, लेकिन माहौल बिगड़ाने में ये भी एक प्रमुख वजह रही।

विवाद की एक और वजह यरुशलम-डे को भी बताया जा रहा है। दरअसल यरुशलम-डे 1967 के अरब-इजराइल युद्ध में इजराइल की जीत के जश्न के तौर पर मनाया जाता है। इजराइल ने इस युद्ध को 6 दिन में ही जीत लिया था और पूर्वी यरुशलम पर कब्जा किया था। इस साल 10 मई को यरुशलम-डे मनाया गया।

इस दिन इजराइली लोग यरुशलम में मार्च करते हुए वेस्टर्न वॉल तक जाकर प्रार्थना करते हैं। वेस्टर्न वॉल को यहूदियों का एक पवित्र स्थल माना जाता है। इस मार्च के दौरान भी हिंसक झड़पें हुईं। 10 मई को शेख जर्राह से 4 फिलिस्तीनी परिवारों को निकाले जाने के मामले में इजराइली सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई होनी थी। बढ़ते विवाद को देखते हुए इसे भी टाल दिया गया है।

इजराइल-फिलिस्तीन के बीच अब जंग जैसे हालात हो गए हैं। मंगलवार को फिलिस्तीन के हमास (इजराइल इसे आतंकी संगठन मानता है) की तरफ से इजराइल की राजधानी तेल अवीव, एश्केलोन और होलोन शहर को निशाना बनाया गया। सोमवार को भी हमास ने अपने कब्जे वाले इलाके गाजा पट्टी से इजराइल के यरुशलम पर रॉकेट दागे। इजराइल और फिलिस्तीन के बीच इस संघर्ष की वजह सालों पुरानी है। 1948 में इजराइल की आजादी के बाद से ही अरब देश और इजराइल कई बार आमने-सामने आ चुके हैं। फिलिस्तीन के प्रदर्शनकारी और इजराइली पुलिस के बीच आए दिन यरुशलम और उसके आसपास के इलाके में झड़पें होती रहती हैं।

आइये समझते है क्या है पूरा विवाद और फिलहाल क्यों सुर्खियों में हैं ये मामला…

ताजा विवाद की वजह क्या है?

विवाद की हालिया वजह इजराइल द्वारा शेख जर्राह को खाली कराया जाना है। शेख जर्राह पूर्वी यरुशलम का इलाका है जहां से इजराइल फिलिस्तीनी परिवारों को निकालकर यहूदी लोगों को बसा रहा है। फिलिस्तीनी लोग इसी का विरोध कर रहे हैं।

पिछला शुक्रवार रमजान महीने का आखिरी शुक्रवार था। इस वजह से यरुशलम की मस्जिद अल-अक्सा में काफी तादाद में मुस्लिम लोग नमाज अदा करने इकट्ठा हुए थे। नमाज के बाद ये लोग शेख जर्राह को खाली कराए जाने के विरोध में प्रदर्शन करने लगे। ये विरोध प्रदर्शन हिंसक हो गया और इस दौरान इजराइली सेना और फिलिस्तीनियों के बीच झड़प हुई।

यरुशलम में मुस्लिमों के पवित्र महीने रमजान के शुरू होने के बाद से ही इजराइली पुलिस और फिलिस्तीनियों के बीच झड़प की खबरें आ रही हैं। आम दिनों के मुकाबले रमजान में मस्जिद अल-अक्सा में आने वाले मुस्लिमों की संख्या ज्यादा होती है। इजराइली पुलिस ने यरुशलम शहर के दमास्कस गेट पर बैरिकेडिंग कर दी थी। मुस्लिमों का कहना था कि ये उनकी धार्मिक स्वतंत्रता को रोकने की कोशिश है। बढ़ते विरोध को देखते हुए पुलिस ने वहां से बैरिकेडिंग हटा तो दी, लेकिन माहौल बिगड़ाने में ये भी एक प्रमुख वजह रही।

विवाद की एक और वजह यरुशलम-डे को भी बताया जा रहा है। दरअसल यरुशलम-डे 1967 के अरब-इजराइल युद्ध में इजराइल की जीत के जश्न के तौर पर मनाया जाता है। इजराइल ने इस युद्ध को 6 दिन में ही जीत लिया था और पूर्वी यरुशलम पर कब्जा किया था। इस साल 10 मई को यरुशलम-डे मनाया गया।

इस दिन इजराइली लोग यरुशलम में मार्च करते हुए वेस्टर्न वॉल तक जाकर प्रार्थना करते हैं। वेस्टर्न वॉल को यहूदियों का एक पवित्र स्थल माना जाता है। इस मार्च के दौरान भी हिंसक झड़पें हुईं। 10 मई को शेख जर्राह से 4 फिलिस्तीनी परिवारों को निकाले जाने के मामले में इजराइली सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई होनी थी। बढ़ते विवाद को देखते हुए इसे भी टाल दिया गया है।

फिलिस्तीन की मांग क्या है?

फिलिस्तीन का कहना है, इजराइल 1967 से पहले की अंतरराष्ट्रीय सीमाओं तक वापस लौट जाए और वेस्ट बैंक तथा गाजा पट्टी में स्वतंत्र फिलिस्तीन राष्ट्र की स्थापना हो। साथ ही इजराइल पूर्वी यरुशलम से अपना दावा छोड़े, क्योंकि फिलिस्तीन आजाद होने के बाद उसे अपनी राजधानी बनाना चाहता है।

इजराइल का क्या कहना है?

फिलिस्तीन की मांगों को इजराइल सिरे से नकारता आ रहा है। इजराइल यरुशलम से अपना दावा छोड़ने को राजी नहीं है। उसका कहना है कि यरुशलम हमारी राजधानी है और ये इजराइल का अभिन्न अंग है।

दोनों के बीच किन इलाकों को लेकर विवाद है?

  • वेस्ट बैंक: वेस्ट बैंक इजराइल और जॉर्डन के बीच में है। इजराइल ने 1967 के युद्ध के बाद इसे अपने कब्जे में कर रखा है। इजराइल और फिलिस्तीन दोनों ही इस इलाके को अपना बताते हैं।
  • गाजा पट्टी: गाजा पट्टी इजराइल और मिस्र के बीच में है। यहां फिलहाल हमास का कब्जा है। ये इजराइल विरोधी समूह है। सितंबर 2005 में इजराइल ने गाजा पट्‌टी से अपनी सेना को वापस बुला लिया था। 2007 में इजराइल ने इस इलाके पर कई प्रतिबंध लगा दिए।
  • गोलन हाइट्स: राजनीतिक और रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण ये इलाका सीरिया का एक पठार है। 1967 के बाद से ही इस पर इजराइल का कब्जा है। इस इलाके में कब्जे के विवाद को लेकर कई बार शांति वार्ता की कोशिशें हो चुकी हैं, लेकिन कोई सफलता नहीं मिली।

पूर्वी यरुशलम में नागरिकता को लेकर दोहरी नीति भी विवाद की वजह

1967 में पूर्वी यरुशलम पर कब्जे के बाद से ही इजराइल यहां पैदा होने वाले यहूदी लोगों को इजराइली नागरिक मानता है, लेकिन इसी इलाके में पैदा हुए फिलिस्तीनी लोगों को कई शर्तों के साथ यहां रहने की अनुमति दी जाती है। इसमें एक शर्त ये भी है कि एक निश्चित अवधि से ज्यादा यरुशलम से बाहर रहने पर उनसे ये हक छीन लिया जाएगा। इजराइल की इस नीति को कई ह्यूमन राइट्स ग्रुप भेदभाव वाली नीति बताते हैं, लेकिन इजराइल हमेशा से इन आरोपों को नकारता आया है।

आखिर ये संघर्ष कितना पुराना है?

ये संघर्ष कम से कम 100 साल पहले से चला आ रहा है। फिलहाल जहां इजराइल है, वहां कभी तुर्की का शासन था जिसे ओटोमान साम्राज्य कहा जाता था। 1914 में पहला विश्व युद्ध शुरू हुआ। तुर्की ने इस विश्व युद्ध में मित्र राष्ट्रों के खिलाफ वाले देशों का साथ दिया। मित्र राष्ट्रों में ब्रिटेन भी शामिल था। लिहाजा तुर्की और ब्रिटेन आमने-सामने आ गए। उस समय ब्रिटिश साम्राज्य अपने चरम पर था जिसका नतीजा ये हुआ कि ब्रिटेन ने युद्ध जीता और ओटोमान साम्राज्य ब्रिटेन के कब्जे में आ गया।

इस समय तक जियोनिज्म की भावना चरम पर थी। ये एक राजनीतिक विचारधारा थी जिसका उद्देश्य एक अलग और स्वतंत्र यहूदी राज्य की स्थापना करना था। इसी के चलते दुनियाभर से यहूदी फिलिस्तीन में आने लगे। 1917 में ब्रिटेन के विदेश सचिव जेम्स बेलफोर ने एक घोषणा की जिसमें कहा गया कि ब्रिटेन फिलिस्तीन को यहूदियों की मातृभूमि बनाने के लिए प्रतिबद्ध है।

साल 1945 में द्वितीय विश्वयुद्ध खत्म हुआ। इस युद्ध में ब्रिटेन को काफी नुकसान हुआ और अब वो पहले जैसी शक्ति नहीं रहा। इधर यहूदी फिलिस्तीन में आते रहे और दूसरे देशों ने ब्रिटेन के ऊपर यहूदियों के पुनर्वास के लिए दबाव डालना शुरू कर दिया। आखिरकार ब्रिटेन ने खुद को इस मामले से अलग कर लिया और ये मसला यूनाइटेड नेशन के पास चला गया, जो कि 1945 में ही बना था।

29 नवंबर 1947 को यूनाइटेड नेशन ने फिलिस्तीन को दो हिस्सों में बांट दिया। एक अरब राज्य और दूसरा हिस्सा बना इजराइल। यरुशलम को यूनाइटेड नेशन ने अंतरराष्ट्रीय सरकार के कब्जे में रखा।

अरब देशों ने यूएन के इस फैसले को मानने से इनकार कर दिया। उनका कहना था कि आबादी के हिसाब से उन्हें कम जमीन मिली। दरअसल बंटवारे के बाद फिलिस्तीन को जमीन का आधे से भी कम हिस्सा मिला, जबकि बंटवारे के पहले करीब 90% जमीन पर अरब लोगों का कब्जा था।

इसी के अगले साल इजराइल ने खुद को एक स्वतंत्र राष्ट्र घोषित कर दिया। अमेरिका ने फौरन एक देश के रूप में इजराइल को मान्यता दे दी। इसके बाद अरब देशों और इजराइल में कई युद्ध हुए। इजराइल ने हर युद्ध में अरब देशों को मात दी। साभार-दैनिक भास्कर

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