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3 राज्यों के गांवों से ग्राउंड रिपोर्ट:कहीं सरपंच ही मास्क नहीं लगा रहे, तो कहीं डर के मारे लोग टेस्ट नहीं करा रहे; कोरोना का टायफाइड समझकर इलाज हो रहा

पढ़िए  दैनिक भास्कर की ये खबर…

शहरों में जहां कोरोना के मरीज बेड और ऑक्सीजन के लिए जूझ रहे हैं, वहीं गांवों में हालात इससे भी बुरे हैं। छोटे अस्पतालों की हालत ऐसी है कि वहां मरीजों के लिए फर्श पर ही बिस्तर बिछा दिया जाता है। गांवों में या तो डॉक्टर नहीं हैं और अगर डॉक्टर हैं भी, तो उन्हें इंजेक्शन लगाने की इजाजत नहीं है। पेशेवर डॉक्टरों की कमी की वजह से कहीं-कहीं टायफाइड समझकर भी बुखार और कोरोना का इलाज हो रहा है। गांवों के ऐसे ही हालात को मध्यप्रदेश, पंजाब और बिहार की इन 3 ग्राउंड रिपोर्ट्स के जरिए समझिए…

1. मध्यप्रदेश: डॉक्टर को इंजेक्शन लगाने की इजाजत नहीं
– उज्जैन से राजेंद्र दुबे, शरद गुप्ता की रिपोर्ट

गांवों का हाल जानने सबसे पहले मध्यप्रदेश चलते हैं। यहां भास्कर टीम ने उज्जैन के गांवों का जायजा लिया। उज्जैन से 75 किमी दूर है गांव मड़ावदा। यहां कोरोना से निपटने के लिए 35 गांवों के बीच एक अस्पताल बनाया गया, लेकिन सुविधा के नाम पर टेंट हाउस से छह गादियां मंगवाकर जमीन पर बिछा दी गईं। यहां बाॅटल चढ़ाने के लिए स्टैंड रखे हैं, लेकिन आज तक बाॅटल किसी काे नहीं चढ़ाई गई। ऑक्सीजन सपोर्ट के लिए तो कोई साधन ही नहीं है, जबकि यहां 15 दिन में 15 मौतें हो चुकी हैं।

मड़ावदा गांव में 150 घरों में सर्दी-खांसी के मरीज हैं। जो गंभीर मरीज अस्पताल पहुंचे, उन्हें भर्ती करने की बजाय शहर में रेफर कर दिया गया। इसलिए यहां एक भी मरीज का इलाज नहीं किया गया। जब हालात बेकाबू हुए तो गांव में फीवर क्लीनिक शुरू किया गया। डॉ. अली हुसैन गौरी ने बताया डॉक्सीसाइक्लिन, बेप्लेक्स, पैरासिटामॉल, आइवरमेक्टिन टैबलेट देने के आदेश हैं। इंजेक्शन लगाने और बॉटल चढ़ाने के जब आदेश मिलेंगे, तब दे देंगे।

15 मौतों के बारे में सरपंच कैलाश कटारिया बताते हैं कि इनमें 18 साल की लड़की और 40 साल का व्यक्ति शामिल था। बाकी बुजुर्ग थे, लेकिन सभी को बुखार था। सरकार इसे कोरोना से मौत नहीं मान रही। यहां बीते एक माह से किसी को वैक्सीन नहीं लगी। इससे पहले कुछ लोगों को टीके लगे।

सरपंच भी बगैर मास्क के, बोलीं- बीमारी को नाम नी पतो
भास्कर की टीम महिदपुर तहसील के बनबना गांव पहुंची। यहां 2500 की आबादी है। 600 में से 40 परिवार में पॉजिटिव मरीज हैं। अब तक 6 की मौत हो चुकी है। फिर भी यहां मास्क लगाने का कोई चलन नहीं।

सरपंच गीता परमार गेहूं साफ कर रही थीं। हमें देखते ही घूंघट और लंबा कर लिया, लेकिन मुंह पर मास्क नहीं था। बोलीं- बीमारी को नाम नी पतो, उनसे (पति) बात कर लो।

सरपंच गीता परमार और उनके पति भूवान परमार।

सरपंच पति भूवान परमार भी कहते हैं कि लोग यहां मास्क कम ही लगाते हैं। पंचायत में कोविड सेंटर बनाया गया है, लेकिन कोई भर्ती नहीं होना चाहता।

कुंडला में 5 मौतों के बाद झोलाछाप डॉक्टर भाग गया
650 की आबादी का छोटा-सा गांव कुंडला। यहां 300 लोगों को सर्दी-खांसी है, कोरोना की जांच किसी ने नहीं कराई। झोलाछाप बंगाली डॉक्टर से इलाज करा रहे थे, इनमें से 5 की मौत के बाद वह भाग गया। गांव के संजीव मकवाना ने बताया- गंभीर मरीजों को 12 किमी दूर उन्हेल ले जाना पड़ा है। वहीं, सद्दाम खान बताते हैं कि गांव में न अस्पताल है, न नर्स और न डॉक्टर।

हिड़ी गांव में खुद का लॉकडाउन, बाहरी लोगों का प्रवेश बंद
हिड़ी गांव के लोगों ने खुद का लॉकडाउन लगा रखा है। गांव वालों ने बाहरी लोगों के प्रवेश पर रोक लगा रखी है। गांव में अंदर जाने वाले रास्ते पर पोस्टर लगा दिया, जिस पर प्रवेश प्रतिबंध की सख्त चेतावनी लिखी है। गांव के तूफान सिंह ने बताया कोरोना की दूसरी लहर से अब तक गांव सुरक्षित है, यहां एक भी पॉजिटिव नहीं है।

2. गंगा घाट पर बिहार से आ रहे शवों को रोका जा रहा
– कैमूर के बिहार-यूपी बॉर्डर से कमल किशोर विनीत और अभिषेक मिश्र की रिपोर्ट

हाल ही में गंगा नदी में कोराेना मरीजों की लाशें मिलने से बिहार-यूपी बॉर्डर पर हड़कंप मंच गया था। अब प्रशासन यहां लोगों को गंगा घाट पर अंतिम संस्कार नहीं कराने दे रहा। ऐसा ही वाकया रामायण का भोजपुरी में अनुवाद करने वाले हरेकृष्ण सिंह के परिवार के साथ हुआ। हरेकृष्ण सिंह का बुधवार को रामगढ़ प्रखंड के बड़ौरा गांव में निधन हो गया। परिवार वालों की इच्छा थी कि उनका अंतिम संस्कार उत्तर प्रदेश के जमानियां गंगा घाट पर किया जाए, लेकिन बॉर्डर पर तैनात पुलिसकर्मियों ने लौटा दिया।

रामायण का भोजपुरी में अनुवाद करने वाले हरेकृष्ण सिंह का परिवार गंगा घाट पर अंतिम संस्कार करना चाहता था लेकिन यूपी पुलिस ने उन्हें लौटा दिया।

उत्तर प्रदेश की बड़ौरा सीमा पुलिस चौकी पर तैनात दारोगा विनय कुमार सिंह ने बताया कि बीते दो दिनों से उन्हें उनके आला अफसरों से साफ निर्देश हैं कि बिहार से आने वाली किसी भी शव यात्रा को प्रदेश में प्रवेश की अनुमति नहीं देनी है। अब तक उन्होंने चार लोगों को शवयात्रा के साथ यहां प्रवेश करने से मना किया है। ग्रामीण अशोक सिंह बताते हैं कि बड़ौरा सीमा के अलावा भभुआ को वाराणसी से जोड़ने वाली बॉर्डर पर भी पुलिस की सख्ती है। वहां के एनएच 2 पर नौबतपुर गांव से गुरुवार को 20 से ज्यादा लोगों की शवयात्रा को पुलिस ने वापस भेज दिया।

ग्रामीणों का आरोप- शवयात्रा की आड़ में आमलोगों को भी रोक रही है यूपी पुलिस
बड़ौरा के राहुल कुमार ने बताया कि बॉर्डर पर तैनात यूपी पुलिस मनमानी कर रही है। वहां की सरकार ने बिहार से शव यात्रा को प्रतिबंधित किया है, लेकिन पुलिसकर्मी हर आने-जाने वाले लोगों को भगा दे रहे हैं। राहुल बताते हैं कि उनके हिस्से की कुछ जमीन उत्तर प्रदेश में है। जहां पर वे खेती-बाड़ी करते हैं, लेकिन बीते दो दिनों में पुलिसकर्मियों ने उन्हें वहां जाने से रोक दिया है।

यूपी सरकार ने बिहार से शव यात्रा को प्रतिबंधित किया है, लेकिन पुलिसकर्मी हर आने-जाने वाले लोगों को भगा दे रहे हैं।

भास्कर की टीम जब इस मामले की तफ्तीश करने के लिए यूपी बॉर्डर पर पहुंची तो वहां तैनात दारोगा विनय सिंह ने इसे सिरे से नकार दिया। उन्होंने कहा कि जो लोग मास्क लगाकर नहीं आ रहे हैं, सिर्फ उन्हें वापस किया जा रहा है।

यूपी से सटे कैमूर के गांवों के 35% लोगों में कोरोना के लक्षण
सूत्र बताते हैं कि रामगढ़ प्रखंड के बड़ौरा, नोनार, जलदाहा, इमलियां, तरोइयां और आंटडीह गांव की एक तिहाई से ज्यादा आबादी में कोरोना वायरस के लक्षण हैं, लेकिन गांव के लोग अपनी जांच नहीं करा रहे हैं। उन्हें डर है कि अगर वे संक्रमित हुए तो उनकी जान चली जाएगी। बीते एक सप्ताह में इन गांवों में 10 से ज्यादा लोगों की मौत हो गई। इनमें ज्यादातर को सर्दी-खांसी यानी कोरोना के लक्षणों जैसी शिकायत थी, लेकिन इन लोगों ने कोरोना के डर से अपनी जांच नहीं कराई थी।

3. पंजाब: टायफाइड समझकर झाड़-फूंक से करा रहे इलाज
– संगरूर-बरनाला से पुनीत गर्ग और भूपिंदर सुनामी की रिपोर्ट

कोरोना के डर और सुविधाओं के अभाव में पंजाब के संगरूर-बरनाला जिले में गांवों के लोग न तो टेस्ट करवा रहे और न ही इलाज। बुखार और सर्दी- जुकाम होने पर गांव के RMP डॉक्टरों के पास ही दवा लेकर घरों में हैं। भास्कर ने दोनों जिलों के करीब 20 गांवों में हालात का जायजा लिया। यहां लोग कोरोना को गंभीर बीमारी मानने को तैयार नहीं हैं। नतीजतन कोरोना टेस्ट के विरोध के चलते गांवों में टीमें भी टेस्ट करने से कतरा रही हैं।

आलम यह है कि बेपरवाह लोग गांवों की चौपालों पर बेमास्क गप्पे लड़ा रहे हैं। शादी और शोक सभाओं में भीड़ भी आम दिनों की तरह जुट रही है। हालांकि, कई गांव ऐसे हैं, जहां एक ही परिवार में कई सदस्यों की मौत हो चुकी है। संगरूर जिले के गांव तक्कीपुर में पूर्व सरपंच समेत उसके दो बेटों और एक बेटी की मौत इसका एक उदाहरण है।

संगरूर के शहरी इलाके में 220 मौतों के मुकाबले देहात में 261 और बरनाला में शहरी इलाके में 57 मौतों के मुकाबले देहात में 66 मरीजों की मौत का आंकड़ा भी साफ कर रहा है कि गांवों में कोरोना किस तरह बढ़ रहा है। बरनाला के गांव कालेके, असपाल कलां, असपाल खुर्द, कोटदूना, कोठे वाहेगुरू पुरा, पंधेर आदि में तो हालात ऐसे हैं जहां दो-तीन बाद बुखार नहीं उतरने पर टायफाइड समझकर इलाज किया जा रहा है। ऐसे में कई लोग तो झाड-फूंक तक करवा रहे हैं।

परवाह लोग गांवों की चौपालों पर बेमास्क गप्पे लड़ा रहे हैं। यहां लोग कोरोना को गंभीर बीमारी मानने को तैयार नहीं हैं।

लोग कोरोना को गंभीर बीमारी मानने को तैयार नहीं
कई लोग तो ऐसे हैं जो कोरोना को महामारी मानने को तैयार ही नहीं है। जिस कारण कोरोना के टैस्ट का विरोध भी करते हैं। गांव गगड़पुर, ईलवाल, उभावाल, नमोल, सिंघपुरा, सीबिया के लोगों की माने तो बुखार, खांसी और जुकाम सीजन के अनुसार आता है। ऐसे में टेस्ट की जरूरत नहीं है। गांव के डॉक्टर ही उन्हें दवा देकर ठीक कर देते हैं।

सरपंच कहती हैं- हेल्थ डिपार्टमेंट डर नहीं निकाल पाया
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बरनाला के गांव काहनके की महिला सरपंच चरणपाल कौर का कहना है कि गांव में करीब 475 घर हैं। इसके बावजूद कोई डिस्पेंसरी तक नहीं है। कोरोना काल में लोगों के अंदर काफी डर पैदा हो गया है। गांव के लोग बुखार आने पर शहर में जाने से कतराते हैं। लोग शहरों में सरकारी अस्पताल में कोरोना टेस्ट करवाने से डरते हैं। हेल्थ डिपार्टमेंट लोगों में कोरोना टेस्ट का डर तक नहीं निकाल पाया है।

कई गांवों में हालात ऐसे हैं कि हर छठे घर का एक सदस्य बुखार से पीड़ित है। गांव कालेके, सीबियां, काहनके और पंखोकलां में सोमवार से आरएमपी डॉक्टरों के पास मरीजों की संख्या में कमी आई है। काहनके सरपंच पति सतनाम सिंह और सीबियां के सरपंच नरिन्द्र सिंह ने बताया है कि हालात ऐसे हैं कि गांव में रोजाना औसतन 50 से 70 लोग बुखार की शिकायत का रहे हैं। लेकिन टेस्ट करवाने से डरते हैं।

विधानसभा में भी उठा था मामला
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हल्का भदौड़ के आप विधायक पिरमल खालसा गांवों की डिस्पेंसरियों की बुरी हालत और डॉक्टरों की कमी के मामले को विधानसभा में भी उठा चुके हैं। उनका कहना है कि यदि डिस्पेंसरियों में हर समय डॉक्टर तैनात रहें तो गांवों के लोगों को बचाया जा सकता है। गांव के लोग दूसरे शहर के डॉक्टर की बजाए अपने गांव के डॉक्टरों पर ज्यादा भरोसा करेंगे। साभार-दैनिक भास्कर

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