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कोरोना: क्या सभी बच्चों का टीकाकरण ज़रूरी है?

पढ़िए  बी बी सी न्यूज़ हिंदी की ये खबर

बच्चों का टीकाकरण कोई नई बात नहीं है, दुनिया भर में बच्चो को पोलियो, मीज़ल्स, डिप्थीरिया, रोटावायरस समेत कई दूसरी बीमारियों के टीके दिए जाते हैं. कई बीमारियों का टीकाकरण बच्चों के पैदा होने के कुछ ही हफ़्तों के बाद शुरू हो जाते हैं.

क्या कोविड – 19 के लिए बच्चों को टीका दिया जाना चाहिए?

भारत में कोवैक्सीन का बच्चों पर ट्रायल कुछ दिनों शुरू हो सकता है. कई दूसरे देशों ने बच्चों को टीका देना शुरू कर दिया है. अमेरिका में 12 से15 साल के छह लाख बच्चों को टीका दिया जा चुका है.

ब्रिटेन में अभी बच्चों के टीकाकरण को लेकर कोई फ़ैसला नहीं किया गया है. अब वैज्ञानिक दृष्टि से सवाल उठता है कि क्या बच्चों को टीका देकर उनकी जिंदगी बचाई जा सकती है? – ये एक मुश्किल सवाल है और हर देश के लिए इसका जवाब अलग हो सकता है. नैतिकता के तौर पर एक सवाल ये भी उठता है कि क्या बच्चों के बदले दूसरे देशों के वयस्कों और स्वास्थ्य कर्मचारियों टीका देने से अधिक जिंदगियां नहीं बचाई जा सकेंगी?

Boy being immunised

बच्चों में कोरोना का ख़तरा कम है

बच्चों को टीका नहीं देने के पीछे एक तर्क ये दिया जा रहा है कि उन्हें इससे बहुत ज़्यादा फ़ायदा नहीं होगा.

ब्रिटेन की ज्वाइंट कमेटी ऑन वैक्सीनेशन एंड इम्यूनाइज़ेशन के सदस्य प्रोफ़ेसर एडम फिन कहते हैं, “कोरोना संक्रमण का एक सकारात्मक पहलू ये है कि ये बच्चों में गंभीर संक्रमण के कम मामले सामने आए हैं. “

मेडिकल जर्नल लैंसेट में सात देशों को मिलाकर की गई एक स्टडी छपी है. इसके मुताबिक एक अनुमान के अनुसार प्रत्येक एक लाख संक्रमित बच्चों में मरने वालों की संख्या दो से कम है. ब्रिटेन में अभी उन बच्चों का टीकाकरण भी नहीं किया जा रहा जो दूसरी बीमारियों से पीड़ित है और जिनके कारण वयस्कों में कोरोना संक्रमण फ़ैलने का ख़तरा ज़्यादा है.

बच्चों में बिना लक्षण के या कम लक्षण वाले संक्रमण पाए गए हैं. वयस्कों और बूढ़ों के मामलों में ये स्थिति बिल्कुल उल्टी है, इसलिए टीकाकरण में उन्हें प्राथमिकता दी गई. सिर्फ़ उन्हीं बच्चों को टीका लेने की सलाह दी गई है “जिनमें संक्रमण का बहुत ख़तरा है और जिसका बुरा अससर पड़ सकता है.”. इनमें गंभीर रूप से विकलांग बच्चे जो दूसरों पर निर्भर हैं, वो शामिल हैं.

कोरोना

बच्चों के टीकाकरण से क्या फ़ायदा होगा

बच्चो को टीका देने का एक फ़ायदा ये हो सकता है कि इससे कई दूसरे लोगों की जान बच सकती है. कई देशों में इसी कारण से बच्चों को फ्लू से बचाने की कोशिश होती है. ब्रिटेन में दो से 12 साल के बच्चों को हर साल नाक का एक स्प्रे दिया जाता है ताकि उनके कारण घर के बूढ़ों को फ्लू न हो.

दूसरा तर्क ये है कि बच्चों को वैक्सीन देने से हर्ड इम्यूनिटी पाना आसान हो सकता है – यानी एक ऐसी स्थिति जब वायरस के लिए फैलना मुश्किल हो जाता है क्योंकि कई लोगों में वायरस से सुरक्षा देने वाली प्रतिरक्षा प्रणाली तैयार हो जाती.

ये देखा जा रहा है कि कोविड की वैक्सीन वायरस को फ़ैलने से रोकने में कामयाब हो रही है. सिर्फ एक डोज़ से ही संक्रमण का ख़तरा 50 प्रतिशत तक कम हो रहा है. इसके अलावा जो संक्रमित हो रहे हैं, उनके द्वारा भी वायरस के फैलने का ख़तरा 50 प्रतिशत तक कम है.

छोटे बच्चों के माध्यम से कोरोना महामारी के फैलने का ख़तरा कम है. लेकिन 13 साल से अधिक के बच्चों से ये ख़तरा बढ़ जाता है.

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स्कूल और बच्चे – कितना है ख़तरा?

लंदन स्कूल ऑफ़ हाइजीन एंड ट्रापिकल मेडिसिन के डॉक्टर एडम कुशारस्की कहते हैं, “सेकेंडरी स्कूल के बच्चों से संक्रमण फैलने का ख़तरा बढ़ता है, इस बात के सबूत हैं. इसलिए टीकाकरण असरदार साबित हो सकता है.”

लेकिन इस बात के कोई ठोस प्रमाण नहीं हैं कि हर जगह ऐसा होगा.

ब्रिटेन में 16 और 17 साल के एक चौथाई बच्चों में इम्यूनिटी पाई गई है, इनमें से शायद ही किसी को टीका दिया गया है. इसलिए इस मामले में ब्रिटेन से मिलते-जुलते दूसरे देशों में संक्रमण को रोकने के लिए पर्याप्त इम्यूनिटी मौजूद हो सकती है.

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डॉ. कुशारस्की कहते हैं, “उन देशों में ये मुश्किल है जहां संक्रमण बहुत नहीं फैला है और वो अभी तक ज़्यादा वयस्कों को वैक्सीन नहीं दे पाए हैं.”

ऑस्ट्रेलिया एक ऐसा देश हैं जहां लोग वैक्सीन लेने में दिलचस्पी नहीं दिखा रहे. न्यूज़ीलैंड और ताईवान जैसे देशों में संक्रमण बहुत नहीं फैला है इसलिए लोगों में इम्यूनिटी नहीं है.

क्या ये नैतिक रूप से सही है?

ये ध्यान देने वाली बात है कि अगर एक बच्चे को वैक्सीन नहीं दी जा रही है, तो वो वैक्सीन किस तक पहुंच रही है. विश्व स्वास्थ्य संगठन का कहना है कि अमीर देशों को बच्चों के टीकाकरण को स्थगित कर ग़रीब देशों को वैक्सीन दान करनी चाहिए.

ऑक्सफ़ोर्ड-एस्ट्राज़ेनेका के क्लिनिकल ट्रायल का हिस्सा रहे प्रोफ़ेसर एंड्र्यू पोलार्ड मानते हैं कि बच्चों को प्राथमिकता देना “नैतिक रूप से ग़लत है”.

एडिनबरा विश्वविद्यालय के प्रोफ़ेसर इलेनर रिले कहते हैं, “अगर हमारे पास 12 साल से अधिक उम्र के बच्चों को देने के लिए वैक्सीन की पर्याप्त सप्लाई होती, तो कोई दिक्कत नहीं थी. लेकिन ऐसा नहीं है.”

“ये एक राजनीतिक फ़ैसला होगा कि हमें किसी और देश में मरते हुए वयस्कों के बदले अपने बच्चों को प्राथमिकता देनी है या नहीं.”  साभार-बी बी सी न्यूज़ हिंदी

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