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कोरोना के नए वैरिएंट्स पर नजर रखने में पिछड़ा भारत; इससे ही दूसरी लहर भयावह हुई और खतरा अभी भी टला नहीं है

पढ़िये दैनिक भास्कर की ये रिपोर्ट

भारत में कोरोना वायरस की दूसरी लहर पहली के मुकाबले ज्यादा घातक साबित हुई है। ज्यादा लोग इन्फेक्ट हुए। मौतें भी ज्यादा हुईं। दूसरी लहर अभी थमी भी नहीं कि तीसरी लहर का डर सामने है। विशेषज्ञों की मानें तो दूसरी लहर के घातक रहने की वजह वायरस में हुए बदलाव (म्यूटेशंस) हैं। चीन से जो वायरस यहां पहुंचा था, उसकी संरचना यानी जीनोम सिक्वेंस में जमीन-आसमान का अंतर आ चुका है।

महामारी विशेषज्ञों की चिंता यह है कि ओरिजिनल वायरस पर सफल रही वैक्सीन क्या उसके म्यूटेंट्स पर भी उतनी ही प्रभावी होगी? इसके लिए कोरोना वायरस के वैरिएंट्स की पहचान, उनकी स्टडी और उन पर दवाओं व वैक्सीन के असर की जांच जरूरी है। अमेरिका, ब्रिटेन समेत तमाम देशों का पूरा फोकस इस समय जीनोम सिक्वेंसिंग (वायरस की संरचना की स्टडी) पर है ताकि वैरिएंट्स का जल्द से जल्द पता लगाया जाए और उन्हें फैलने से रोका जाए। पर भारत में भयानक हुई दूसरी लहर इस बात का संकेत है कि वायरस में हो रहे बदलावों की स्टडी में यहां न सिर्फ देरी हुई बल्कि कमी भी रह गई है।

दूसरी लहर से पहले सरकार वायरस में हो रहे बदलावों के बारे में जागरूकता बढ़ाने में भी नाकाम रही। हमारे यहां जिन डॉक्टरों को वैक्सीन के दोनों डोज लग चुके हैं, वे भी इन्फेक्ट हो रहे हैं। दिल्ली के दो अस्पतालों सर गंगाराम और इंद्रप्रस्थ अपोलो हॉस्पिटल के वैक्सीनेट हो चुके डॉक्टरों में इन्फेक्शन के कारणों पर रिपोर्ट अगले हफ्ते आने की संभावना है। इसमें यह पता चलेगा कि इन डॉक्टरों को इन्फेक्शन वैरिएंट्स की वजह से हुआ या कोई और ही कारण था। कुछ ही दिन पहले पद्मश्री से सम्मानित डॉ. केके अग्रवाल को वैक्सीन के दोनों डोज लगने के बाद भी कोरोना इन्फेक्शन हुआ और उनकी मौत हो गई। इस तरह के कई रहस्यों पर से पर्दा वैरिएंट्स की स्टडी ही उठा सकेगी।

आइए, समझते हैं कि यह वैरिएंट्स क्या हैं और इन पर भारत में नजर कौन रख रहा है और कैसे?

म्यूटेशंस और वैरिएंट्स क्या हैं?

  • वेल्लोर की क्रिश्चियन मेडिकल कॉलेज में प्रोफेसर और भारत की जानी-मानी माइक्रोबायोलॉजिस्ट डॉ. गगनदीप कंग का कहना है कि वायरस में बदलाव होना आम है। जैसे-जैसे वायरस फैलेगा, एक व्यक्ति से दूसरे व्यक्ति तक पहुंचने के दौरान उसमें बदलाव होंगे ही। वहीं, महामारी विशेषज्ञ चंद्रकांत लहारिया कहते हैं कि यह स्पेलिंग मिस्टेक की तरह है। दवाओं और एंटीबॉडी से बचने के लिए वायरस में यह बदलाव होता है। यह स्वाभाविक है। पर अगर महामारी में वायरस को रोकना है तो उससे दो कदम आगे रहना होगा। इसके लिए उसमें हो रहे प्रत्येक बदलाव पर नजर रखनी बेहद जरूरी है।

क्या यह वैरिएंट्स इन्फेक्शन की दूसरी लहर के लिए जिम्मेदार हैं?

  • हां, बिल्कुल। फरवरी में भारत में पहली लहर करीब-करीब थम गई थी। पर यूके, ब्राजील और अन्य देशों से आए वैरिएंट्स ने दूसरी लहर पैदा की। यूके से आया स्ट्रेन ओरिजिनल वायरस के मुकाबले ज्यादा तेजी से फैलता है। वहीं ब्राजील से आया स्ट्रेन पहले से बनी एंटीबॉडी से बच निकलने में कामयाब रहा है। पिछले साल महाराष्ट्र में डबल म्यूटेंट सामने आया। इसने मूल वायरस के मुकाबले ज्यादा तेजी से लोगों को इन्फेक्ट किया। कई विशेषज्ञ भारत में दूसरी और अधिक भयानक लहर के लिए इन नए वैरिएंट्स को ही जिम्मेदार ठहरा रहे हैं।

भारत में वायरस में बदलाव पर कैसे नजर रखी जा रही है?

  • वैसे तो अप्रैल 2020 में ही देशभर की लैब्स ने वायरस में हो रहे बदलावों की स्टडी शुरू कर दी थी। पर तब रैंडम सैम्पल कलेक्ट किए जा रहे थे। 4,000 सैम्पल की स्टडी की गई। पहली रिपोर्ट दिसंबर में आई, जिसमें इन वैरिएंट्स के बारे में बताया गया। तब सरकार ने 30 दिसंबर को इंडियन SARS-CoV-2 जीनोमिक कंसोर्टिया यानी INSACOG बनाया।
  • यह देशभर में पहले से काम कर रही 10 लैबोरेटरीज का एक कंसोर्टियम है। इसमें भारत सरकार के बायोटेक्नोलॉजी डिपार्टमेंट, इंडियन काउंसिल ऑफ मेडिकल रिसर्च (ICMR), काउंसिल ऑफ साइंटिफिक एंड इंडस्ट्रियल रिसर्च (CSIR) और स्वास्थ्य मंत्रालय की लैबोरटरीज शामिल हैं। मंत्रालय के तहत काम करने वाले नेशनल सेंटर फॉर डिजीज कंट्रोल (NCDC) को राज्यों से सैम्पल कलेक्ट करने और इस ग्रुप के साथ कोऑर्डिनेशन की जिम्मेदारी दी गई। जनवरी में उन लोगों के सैम्पल लिए गए, जो यूके से लौटे थे और कम्युनिटी से मिले पॉजिटिव सैम्पल को उसी अनुपात में जुटाया गया।

वायरस में बदलावों पर स्टडी का नतीजा क्या रहा?

  • बायोटेक्नोलॉजी डिपार्टमेंट ने 6 मई को जारी रिपोर्ट में बताया कि 20 हजार सैम्पल्स की स्टडी की गई है। देशभर में 3,900 वैरिएंट्स की पहचान की गई है। यानी देशभर में मिले सैम्पल्स से पता चला कि कोरोना वायरस के 3,900 नए रूप सामने आ चुके हैं।
  • इनमें B.1.1.7 (यूके वैरिएंट), B.1.351 (दक्षिण अफ्रीकी वैरिएंट) और P2 (ब्राजील वैरिएंट) मिले। इसके अलावा भारत में एक अलग B.1.617 वैरिएंट फैमिली मिली। इसे डबल म्यूटेंट वैरिएंट भी कहा जाता है। दो हफ्ते पहले ही WHO ने B.1.617 वैरिएंट्स को वैरिएंट ऑफ कंसर्न बताया है। यूके में हाल ही में इन्फेक्शन के बढ़ते मामलों के लिए इसे ही जिम्मेदार बताया गया है।
  • मार्च में जब महाराष्ट्र में नए केस बढ़ रहे थे, तब यह वैरिएंट ही उसके लिए जिम्मेदार था। पर अब तक ऐसा कोई सबूत नहीं है कि बढ़ी हुई मौतों या गंभीर इन्फेक्शन के बढ़ते मामलों में इसका हाथ था। रिपोर्ट कहती है कि यूके वैरिएंट ने दक्षिणी राज्यों के मुकाबले उत्तर भारत और मध्य भारत के इलाकों में अधिक लोगों को इन्फेक्ट किया।

क्या वैरिएंट्स को पहचानना काफी है? जीनोम सिक्वेंसिंग का क्या लाभ है?

  • जीनोम सिक्वेंसिंग के जरिए वायरस के वैरिएंट की स्टडी की जाती है। यह पता लगाया जाता है कि उसकी लोगों को इन्फेक्ट करने की क्षमता कितनी है? पहले से इन्फेक्ट हुए लोगों में बनी एंटीबॉडी क्या उसे रोक सकती है? क्या वैक्सीन इसे रोक सकती है?
  • इसके लिए भारत समेत दुनियाभर की लैब्स में स्टडी हो रही है। जो लोग वैक्सीनेट हो चुके हैं या जिनके शरीर में इन्फेक्शन के बाद नेचुरल एंटीबॉडी बनी है, उनका ब्लड सैम्पल लिया जाता है। फिर यह देखा जाता है कि क्या इसमें शामिल एंटीबॉडी लैबोरेटरी में वायरस को खत्म कर पाती है या नहीं।
  • इस समय तक कोवैक्सिन, कोवीशील्ड और फाइजर व मॉडर्ना की वैक्सीन से बनी एंटीबॉडी ज्यादातर वैरिएंट्स को खत्म करने में सफल रही है। पर इन वैक्सीन से बनी एंटीबॉडी दक्षिण अफ्रीकी, ब्राजील और डबल म्यूटेंट वैरिएंट को खत्म करने में पूरी तरह कामयाब नहीं हुई। अब तक सामने आई ज्यादातर वैक्सीन बीमार होने से बचाने में 75 से 90 प्रतिशत तक सफल रही हैं। पर रीइन्फेक्शन और ट्रांसमिशन से बचाने में कारगर हैं या नहीं, इसकी जांच चल रही है।
  • पिछले हफ्ते यूके के रेगुलेटर पब्लिक हेल्थ इंग्लैंड ने एक स्टडी के आधार पर दावा किया कि फाइजर और कोवीशील्ड के दो डोज आपने लिए हैं तो वह भारत में मिले डबल म्यूटेंट और ट्रिपल म्यूटेंट वैरिएंट्स के खिलाफ असरदार हैं। अप्रैल और मई में अलग-अलग एज ग्रुप में 1,054 लोगों के हेल्थ डेटा की स्टडी की गई है।
  • इस आधार पर यूके में एस्ट्राजेनेका (कोवीशील्ड) की वैक्सीन के दो डोज का गैप घटाने की बात की जा रही है। पर भारत में अभी भी कोवीशील्ड के दो डोज को 12-16 हफ्ते के अंतर से लगाया जा रहा है। ऐसे में विशेषज्ञ यहां भी इसके दो डोज के गैप को घटाने की मांग करने लगे हैं।

वैरिएंट्स को पहचानने में भारत कहां पिछड़ रहा है?

  • डॉ. गगनदीप कंग का कहना है कि जितने सैम्पल्स की स्टडी की जानी थी, उतनी हो नहीं सकी है। डबल म्यूटेंट भारत में मिला, पर हमारे यहां दिसंबर से अब तक सिर्फ 20 हजार सैम्पल की स्टडी हुई। जबकि यूके में इसकी स्टडी के लिए तीन महीने में 30 हजार से ज्यादा सैम्पल लिए गए हैं। जब तक स्टडी के लिए सैम्पल नहीं बढ़ाएंगे, तब तक महामारी को रोकने के लिए मजबूत प्लान नहीं बना सकेंगे।
  • अगर सैम्पल स्टडी की बात करें तो हमारे यहां INSACOG का टारगेट कुल पॉजिटिव केसेज में से 5% सैम्पल्स की स्टडी करने का था। पर 20 हजार सैम्पल की स्टडी का मतलब है कि 1% से भी कम पॉजिटिव सैम्पल्स की स्टडी की गई है। पैसे की कमी और इस प्रक्रिया में तेजी लाने के लिए साधनों की कमी ने इस मोर्चे पर काम को रोके रखा है।
  • पिछले हफ्ते INSACOG प्रमुख और वायरोलॉजिस्ट डॉ. शाहिद जमील ने अपने पद से इस्तीफा दिया। उन्होंने इसका कारण तो नहीं बताया, पर साफ है कि वह सरकार से नाराज थे। खासकर वैरिएंट्स की स्टडी के लिए सैम्पल बढ़ाने, डेटा शेयरिंग और इससे जुड़े अन्य मसलों को लेकर। विशेषज्ञों का यह भी कहना है कि भले ही इस कंसोर्टियम में एक्सपर्ट साइंटिस्ट शामिल हैं, लेकिन यह महज एक एडवायजरी ग्रुप है।
  • मार्च में इस ग्रुप ने डबल म्यूटेंट समेत अन्य वैरिएंट्स को लेकर आगाह किया था, पर सरकार ने गंभीरता नहीं दिखाई और चेतावनी भी जारी नहीं की। कुंभ और राजनीतिक रैलियों का आयोजन हुआ, जिसने दूसरी लहर को भयावह बनाने में बड़ी भूमिका निभाई। WHO भी अपनी वैरिएंट्स रिपोर्ट में दूसरी भयावह लहर के लिए इन आयोजनों पर सवाल उठा चुका है। साभार-दैनिक भास्कर

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