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कोरोना वैक्सीन की कमी, डर और अफ़वाह: भारत के गाँवों में टीकाकरण का हाल

सरकार का कोरोना टीकाकरण पर ज़ोर, लेकिन ग्रामीणों में ख़ौफ़

पढ़िये बी बी सी न्यूज़ की ये रिपोर्ट 

समीरात्मज मिश्र, लखनऊ (उत्तर प्रदेश) से

बीबीसी लाइन

उत्तर प्रदेश में सरकार एक ओर कोरोना टीकाकरण की रफ़्तार बढ़ाने की कोशिश कर रही है तो दूसरी ओर ग्रामीण इलाक़ों में टीके को लेकर अभी भी कई तरह की आशंकाएं सामने आ रही हैं.

राज्य सरकार ने घोषणा की है कि एक जून से सभी ज़िलों में 18 से 44 आयु वर्ग के लोगों के लिये वैक्सीनेशन शुरू किया जाएगा. अभी सिर्फ़ 23 ज़िलों में ही इस आयु वर्ग के लोगों का टीकाकरण हो रहा है.

ग्रामीण इलाक़ों में अभी 45 साल से ऊपर के लोगों का टीकाकरण हो रहा है लेकिन गांवों में टीके को लेकर लोगों में उत्साह और जागरूकता की कमी दिख रही है. औरैया में पिछले दिनों टीकाकरण करने वाली स्वास्थ्य विभाग की टीम पर जहां कुछ लोगों ने हमला बोल दिया वहीं दो दिन पहले बाराबंकी में स्वास्थ्य विभाग की टीम को देखकर कुछ लोग भाग गए.

बाराबंकी में 22 मई को कोरोना वैक्सीन लगाने के लिए स्वास्थ्य विभाग की टीम रामनगर तहसील के सिसौंडा गांव पहुँची थी. ग्रामीणों ने स्वास्थ्य विभाग की टीम को देखकर नदी में छलांग लगा दी थी.

रामनगर के एसडीएम राजीव शुक्ला ने बताया कि स्वास्थ्य विभाग की टीम को देख कर नदी के किनारे मौजूद कुछ लोग नदी में उतर गए थे, लेकिन समझाने पर बाहर आकर लोग टीकारण के लिए तैयार हो गए.

सिसौंडा गाँव में लोग वैक्सीन को लेकर चल रही कुछ अफ़वाहों की वजह से भाग गए थे. गांव की आशा बहू सरिता का कहना है कि कुछ लोगों में यह भय था कि टीकाकरण से मौत हो जाती है. इसीलिए लोग डरे हुए थे. लेकिन अधिकारियों के समझाने पर लोगों का डर दूर हो गया.

हालांकि अभी भी कुछ लोगों में टीके को लेकर डर है और गाँववालों के मुताबिक़, कई लोग गाँव से बाहर भी चले गए हैं. सिसौंडा गांव के रहने वाले कमलेश बताते हैं, “स्वास्थ्य विभाग की टीम आई तो लोग डरने लगे थे. हम लोगों के टीका लगवाने के बाद भी लोग डरे हुए थे और भाग गए. लोगों का कहना था कि कोरोना से नहीं बल्कि टीके से ही डर लगता है. लेकिन अधिकारियों ने समझाया तो लोग टीका लगवाने को तैयार हो गए. लेकिन अभी भी बहुत से लोगों ने टीका नहीं लगवाया है.”

बाराबंकी ज़िला प्रशासन ने इस घटना का संज्ञान लेते हुए जन जागरूकता फैलाने और लोगों को टीकाकरण कराने को लेकर प्रेरित करने के निर्देश दिए हैं.

सत सिंह, रोहतक (हरियाणा) से

बीबीसी लाइन

रोहतक से बारह किलोमीटर दूर करोंथा गाँव में वैक्सीनेशन सेंटर पर ताला लटका हुआ है. गाँव के ही किसान मंजीत धनखड़ बताते हैं कि कई दिन से वैक्सीन सेंटर पर ताला है क्योंकि गाँववालों में वैक्सीन को लेकर कई तरह की बातें घूम रही हैं.

वे कहते हैं, “मेरे साथी सुखबीर, बुँदे और राजेश ने वैक्सीन का एक डोज़ महीने भर पहले लिया था, पूरे 15 दिन लगे बुख़ार से उठने में. सारा शरीर बुख़ार ने पकड़ लिया था. इन लोगों की हालत देखकर गाँव में डर का माहौल है.”

सुमित आर्य जो मकड़ौली गाँव के सरपंच हैं, वे बताते हैं कि कुछ समय पहले एक बुज़ुर्ग महिला की वैक्सीन का डोज़ लेने के बाद मौत गई थी. तब से गाँव में बस यही बात होती है कि वैक्सीन जो लेगा उसकी मौत हो जाएगी.

सुमित कहते हैं कि अब काफ़ी लोग पहले से जागरूक हुए हैं और वैक्सीन लगवाने के लिए आगे आ रहे हैं, मगर अब भी बहुत सारी फ़ेक ख़बरें सोशल मीडिया पर पढ़कर लोगों में डर है.

टिटौली गाँव की एएनएम बबली बताती हैं कि गाँव में जनवरी से लेकर बीस मई तक 90 लोगों की मौत हो चुकी है. इनमें से दस के कोरोना संक्रमित होने की पुष्टि हुई थी. ऐसे समय में लोगों को बढ़ चढ़कर अपना टेस्ट करवाने और वैक्सीन लगवाने के लिए आगे आना चाहिए. पर लोगों की चर्चा का केंद्र गाँव में लगा टावर है.

वे बताती हैं कि “ग्रामीण लोगों का मानना है कि कोरोना बीमारी असली वजह नहीं है बल्कि गाँव में लगा टावर है, जिसपर 5जी की टेस्टिंग चल रही है और गाँव में मौत का आंकड़ा बढ़ रहा है.”

गाँव के ही एक सरकारी अस्पताल में मौजूद नर्स ने बताया कि जब वैक्सीन लगवाने की बारी आई तो उन्होंने ख़ुद वैक्सीन नहीं लगवाई थी और सरकारी काग़ज़ों में ख़ानापूर्ति के लिए अपना नाम दर्ज करवा दिया था. कारण पूछने पर महिला नर्स ने कहा कि उन्होंने सुना है कि टीका इम्यूनिटी को कम कर देता है और ज़्यादा उम्र के लोग उसकी चपेट में आ जाते है और यहाँ तक कि कुछ लोगों की मौत भी हो जाती है.

बीबीसी से बात करते हुए रोहतक के चीफ़ मेडिकल अफ़सर डॉक्टर अनिल बिरला ने माना कि ऐसी बहुत सी भ्रांतियाँ ग्रामीणों में हैं जिनका सामना हेल्थ डिपार्टमेंट के अधिकारियो को करना पड़ रहा है. लेकिन अब सरकार ने जागरूकता अभियान चलाया है जिससे थोड़ा फ़र्क़ आया है.

साठ हज़ार की आबादी में औसतन पंद्रह लोग ही रोज़ाना लगवा रहे वैक्सीन

मोहर सिंह मीणा, जयपुर (राजस्थान) से

बीबीसी लाइन

राजस्थान के शहरी इलाक़ों में टीकाकरण करवाने के लिए लोगों में उत्साह है, मगर ग्रामीण इलाक़ों में कम ही लोग वैक्सीन लगवाने के लिए आगे आ रहे हैं.

एक ओर जहाँ शहरों में अधिकतर टीकाकरण केंद्रों के बाहर क़तारें दिखाई देती हैं और टीकों की कमी पड़ रही है, वहीं ग्रामीण इलाक़ों में टीका केंद्रों पर डोज़ भी हैं और चिकित्सक भी, मगर फिर भी लोग टीका लगवाने से कतरा रहे हैं.

उदयपुर ज़िला मुख्यालय से 140 किलोमीटर दूर आदिवासी बहुल कोट़ड़ा तहसील के सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र (सीएचसी) के अंतर्गत तक़रीबन साठ हज़ार लोग आते हैं. लेकिन टीकाकरण कराने के लिए सीएचसी तक बमुश्किल ही लोग पहुँच रहे हैं.

सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र के इंचार्ज डॉक्टर नवीन पंडोर बताते हैं कि “रोज़ाना औसतन दस से बीस लोग ही वैक्सीनेशन के लिए आते हैं. यहाँ शिक्षा की कमी है और लोगों में कोरोना संक्रमण को लेकर जागरूकता नहीं है. लोगों में बहुत सी अफ़वाहें फैली हुई हैं और वैक्सीनेशन को लेकर डर बना हुआ है. ख़ूब समझाने के बावजूद लोग नहीं आ रहे हैं.”

डॉक्टर पंडोर बताते हैं कि “कोटड़ा की साठ हज़ार की आबादी में अभी तक पाँच से छह हज़ार लोगों का ही टीकाकरण हुआ है. हमारी माँग पर तीन सौ तक डोज़ उपलब्ध हो जाती हैं. हमारे पास वैक्सीनेशन के लिए पर्याप्त सुविधा है.” हालांकि, लोगों के नहीं आने के पीछे ऑनलाइन रजिस्ट्रेशन को भी डॉक्टर पंडोर एक कारण मानते हैं.

राज्य सरकार और स्थानीय प्रशासन दावा तो कर रहे हैं कि हम लोगों को टीकाकरण के लिए जागरूक कर रहे हैं. लाउडस्पीकर, विज्ञापन से प्रचार और पंचायत व चिकित्सा विभाग की टीमों के द्वारा भी लोगों को जागरूक कर रहे हैं. लेकिन राजस्थान के ग्रामीण इलाक़ों में लोगों का कम वैक्सीनेशन सरकारी दावों को झुठला रहा है.

राजस्थान के सर्वाधिक पिछड़े इलाक़ों में कोटड़ा का भी नाम रहता है. कोटड़ा क्षेत्र उदयपुर ग्रामीण में झाड़ोल विधानसभा में आता है. झाड़ोल सीट से विधायक बाबू लाल खराड़ी भी इस बात से सहमत हैं कि यहाँ ना के बराबर ही वैक्सीनेशन हो रहा है.

विधायक बाबू लाल खराड़ी ने फ़ोन पर बीबीसी से कहा, “यहाँ वैक्सीनेशन तो हो नहीं रहा है, बेहद ही कम लोगों के अभी तक वैक्सीन लगी है. लोग आ नहीं रहे हैं और लोगों में डर बना हुआ है.”

वे कहते हैं, “लोगों में अफ़वाहें फैली हुई हैं कि वैक्सीनेशन कराओगे तो मर जाओगे, नपुंसक हो जाओगे. इसलिए लोग वैक्सीनेशन कराने में रुचि नहीं ले रहे.”

राजधानी जयपुर में टीकाकरण केंद्रों पर टीका लगवाने आ रही शिक्षित शहरी आबादी और राज्य में 1 करोड़ 61 लाख लोगों को वैक्सीन लगाने का दावा भले ही सरकार कर रही हो, लेकिन कोटड़ा समेत अन्य ग्रामीण इलाक़ों में दस प्रतिशत आबादी को भी टीका नहीं लगा है.

वैक्सीन लगाने पहुँची टीमों को धमकाया जा रहा

शुरैह नियाज़ी, भोपाल (मध्य प्रदेश) से

बीबीसी लाइन

देश के अन्य राज्यों की तरह मध्यप्रदेश के ग्रामीण इलाक़ों में भी टीकाकरण करने पहुँची टीमों को भी लोगों के विरोध का सामना करना पड़ रहा है.

प्रदेश के आगर मालवा ज़िले के गाँव निपानिया बैजनाथ में ज़्यादातर लोग किसी भी तरह से टीका लगवाने के लिये तैयार नहीं हैं.

गाँव के रविंद्र सेन का कहना है कि उन्हें अभी टीका नहीं लगवाना है क्योंकि अभी मालूम नहीं कि इससे कोई फ़ायदा होगा कि नही. उनका कहना है कि “टीका लगवाने के बाद कुछ लोगों की मौत भी हो गई है, इसलिए हमारे परिवार सहित गाँव के कई लोग टीकाकरण के लिये तैयार नही हैं.”

पूर्व विधायक लालजी राम मालवीय जब जागरूकता रथ लेकर निपानिया बैजनाथ पहुँचे तो उनका सामना एक महिला से हुआ जो किसी भी तरह से कोरोना का टीका लगाने के लिये तैयार नहीं थी.

उस महिला ने नाम नहीं बताया, लेकिन उसने कहा, “चाहे मैं मर जाउं, लेकिन मैं टीका नही लगवाउंगी. टीका लगाने से ही कोरोना फैल रहा है और मुझे भी हो जाएगा और अस्पताल में गई तो वहाँ मौत हो जाएगी.”

आगर मालवा के ज़िला टीकाकरण अधिकारी राजेश गुप्ता का कहना है कि शासन द्वारा प्रचार प्रसार की पूरी व्यवस्था की गई है, लेकिन उसके बावजूद शहरी क्षेत्रों में तो लोग टीका लगवा रहे हैं लेकिन ग्रामीण क्षेत्रों में विरोध का सामना करना पड़ रहा है.

कई जगह टीकाकरण दल गाँव के अंदर जाने से घबरा भी रहा है क्योंकि उन्हें हमले का डर है. वही कुछ जगहों पर उन्हें धमकाया भी जा रहा है.

मध्य प्रदेश

वही गाँव में स्थिति ऐसी है कि कई जगहों पर लोग टीकाकरण को लेकर हिंसा से भी परहेज़ नही कर रहे हैं.

उज्जैन ज़िले के उन्हेल तहसील के गाँव मालीखेड़ी में सोमवार को टीकाकरण दल को ऐसे ही एक हमले का सामना करना पड़ा था.

वैक्सीनेशन टीम जब स्वास्थ्यकर्मियों के साथ गाँव पहुँची तो गाँववालों ने आने से मना कर दिया और टीम को गाँव से जाने को कहने लगे.

जब कुछ लोगों ने इसके फ़ायदे बताना शुरू किया तो पारदी समाज के लोगों ने उनपर लाठी से हमला कर दिया.

इसके बाद कुछ लोगों ने पत्थरों से भी हमला किया. टीकाकरण दल बड़ी मुश्किल से वहाँ से जान बचाकर भागा. ज़िला प्रशासन और पुलिस की टीम ने वहाँ पहुँच कर स्थिती को संभाला.

छत्तीसगढ़

इमेज स्रोत,ALOK PUTUL

आलोक प्रकाश पुतुल, रायपुर (छत्तीसगढ़) से

बीबीसी लाइन

छत्तीसगढ़ में जब कोरोना के टीकाकरण की शुरुआत हुई तो कई अवसर ऐसे भी आए जब राज्य में एक ही दिन में 3.26 लाख लोगों का टीकाकरण किया गया.

राज्य में 99 फ़ीसद स्वास्थ्य कर्मियों का टीकाकरण हुआ. वहीं, पहली पंक्ति (फ़्रंटलाइन) के 86 फ़ीसद कोरोना कार्यकर्ताओं का टीकाकरण आसानी से हो गया. यहां तक कि 45 वर्ष से ऊपर की आयु के भारत के औसत टीकाकरण 34 फ़ीसद के मुक़ाबले छत्तीसगढ़ में 65 फ़ीसद लोगों का टीकाकरण किया गया.

लेकिन एक मई से 18-44 आयु वर्ग में जब टीकाकरण की शुरुआत हुई तो टीके की कमी से जूझते राज्य सरकार ने सबसे पहले अतिग़रीब, फिर ग़रीबी रेखा से नीचे और उसके बाद सामान्य वर्ग को टीका लगाना शुरु किया.

आश्चर्यजनक रुप से राज्य सरकार की इस टीकाकरण की प्रक्रिया का कई ज़िलों के गांवों में भारी विरोध हुआ. गांवों में तरह-तरह की अफ़वाहें फैलीं और यहां तक कहा गया कि ग़रीबों पर इस टीके का प्रयोग किया जा रहा है.

कोरबा, पेंड्रा मरवाही गौरेला, गरियाबंद, बिलासपुर जैसे कई ज़िलों से वीडियो क्लिप आये, जहां स्वास्थ्य कर्मियों को खदेड़ दिया गया. कई इलाक़ों में पुलिस को टीकाकरण के लिए जबरदस्ती लोगों को ले जाने के वीडियो भी वायरल हुए.

छत्तीसगढ़

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बिलासपुर के चंदेला नगर इलाक़े में रहने वाले संजय बघेल कहते हैं, “सरकार के पास टीका नहीं था तो साफ़ कहना था कि हम टीकाकरण नहीं कर पायेंगे लेकिन अतिग़रीब, ग़रीबी रेखा और फिर सामान्य वर्ग के बंटवारे के फ़ैसले में उलझाने के कारण ग़रीबों में अनावश्यक संशय पैदा हुआ.”

इस बीच मामला हाईकोर्ट तक पहुँच गया और अदालत ने सभी वर्ग को टीका लगाने की योजना बनाने को कहा. लेकिन तब तक गांवों में विरोध प्रदर्शन बढ़ता गया.

छत्तीसगढ़ में 18-44 आयु वर्ग के 1.30 करोड़ लोगों का टीकाकरण होना था लेकिन आज 26 दिन बाद भी राज्य में 18-44 वर्ग आयु समूह के केवल 5.99 फ़ीसद लोगों का ही टीकाकरण हो पाया है. इसकी सबसे बड़ी वजह तो यही है कि राज्य सरकार के पास टीका ही उपलब्ध नहीं है.

हालत ये हैं कि दो दिन बाद, 18-44 आयु वर्ग के जिन लोगों को नियमानुसार 28 दिन बाद कोवैक्सीन का टीका लगना है, उनके लिए भी टीका उपलब्ध नहीं है.

राज्य के स्वास्थ्य मंत्री टीएस सिंहदेव कहते हैं, “राज्य में कुछ जगहों से टीकाकरण के विरोध की ख़बरें आई थीं. हमारी लगातार कोशिश है कि सामाजिक संगठनों, प्रबुद्ध लोगों के सहयोग से टीकाकरण के लिए अनुकूल वातावरण बने.”

उन्होंने कहा, “रही बात 18-44 आयु वर्ग के टीकाकरण की तो इस आयु वर्ग के लिए हमें 2.60 करोड़ टीके के ज़रुरत है. लेकिन अब तक हमें केवल 7,97,110 लाख टीके ही मिले हैं. अगर टीके मिलने की रफ़्तार यही रही तो इस आयु वर्ग के टीकाकरण में दो साल से अधिक का समय लग जाएगा.”

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टीकाकरण

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दिलीप कुमार शर्मा,जोरहाट(असम) से

बीबीसी लाइन

लोग वैक्सीन लगवाना चाहते हैं लेकिन स्लॉट ही उपलब्ध नहीं

एक तरफ़ जहां भारत के कुछ अन्य राज्यों में कोविड-19 की वैक्सीन को लेकर लोगों में कई तरह की भ्रांतियां होने की ख़बर है वहीं असम में लोग अपना स्लॉट बुक न कर पाने से परेशान है.

यहाँ ग्रामीण इलाक़ों में भी लोग वैक्सीन लेने के लिए अपनी बारी आने का इंतज़ार करते दिख रहें है.

राज्य सरकार रोजाना वैक्सीन की उपलब्धता को लेकर अपने पास मौजूद स्टॉक की जानकारी शेयर करती है लेकिन प्रत्येक जिले में केवल सीमित वैक्सीन ही लोगों के लिए जारी की जा रही है.

राजधानी शहर गुवाहाटी से क़रीब 310 किलोमीटर दूर जोरहाट ज़िले के मुरमुरिया चाय बागान के भीतर रहने वाले 38 साल के हाथीराम भूमिज कोरोना संक्रमण से बीमार पड़ रहे लोगों के कारण काफ़ी डरे हुए है.

हाथीराम की परेशानी यह है कि अबतक उन्हें और उनके परिवार के किसी भी सदस्य को कोरोना की वैक्सीन नहीं मिल पाई है.

चाय जनजाति समुदाय से आने वाले हाथीराम ने बीबीसी से कहा, “हमारे गांव में अब तक 18 लोग कोरोना से संक्रमित हो चुके है, इसलिए काफ़ी डर लग रहा है. यहां सभी लोग वैक्सीन लेना चाहते है लेकिन वैक्सीन मिल ही नहीं रही है.”

उन्होंने बताया, “पहले मुझे मालूम नहीं था इसलिए लगातार तीन दिन वैक्सीन लेने के लिए ब्लॉक ऑफ़िस के बाहर लाइन में खड़ा हुआ था. फिर पता चला कि वैक्सीन के लिए 45 से कम उम्र वाले लोगों को मोबाइल फ़ोन पर रजिस्ट्रेशन करवाना पड़ता है. हमारे गांव के कई लोगों ने रजिस्ट्रेशन करवाया है लेकिन अभी तक किसी का भी नंबर नहीं आया है.”

गुवाहाटी में रहने वाली 25 साल की मिट्टी दास कहती हैं, “कोरोना से यहां जो दहशत का माहौल है ऐसे में सभी लोग किसी न किसी तरह से वैक्सीन लेना चाहते है. लेकिन यहां वैक्सीन का स्लॉट मिलना मतलब लॉटरी लगने जैसा है.”

उन्होंने बताया, “कई दिनों तक ऑनलाइन पर कोशिश करने के बाद मेरा नंबर आया लेकिन सेंटर इतना दूर मिला कि मुझे गाड़ी हायर कर वहां पहुँचना पड़ा. शुरू में प्राइवेट हॉस्पिटल में वैक्सीन मिल रही थी लेकिन अब वहां पूरी तरह बंद है.”

दो दिन पहले असम के मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा ने राज्य के लोगों से दोस्तों और शुभचिंतकों को जन्मदिन के उपहार के रूप में कोविड-19 वैक्सीन डोनेट करने की अपील की थी.

वहीं, राज्य में पर्याप्त वैक्सीन ही नहीं है. राज्य में वैक्सीन की कमी के कारण रोज़ाना केवल 50 हज़ार लोगों को ही वैक्सीन दी जा रही है, जो इसकी क्षमता से आधी है.

राज्य के स्वास्थ्य मंत्री केशव महंत की एक जानकारी के अनुसार 25 मई की शाम तक सरकार के पास 45 से अधिक उम्र के लोगों के लिए दो लाख 60 हज़ार 880 वैक्सीन का स्टॉक था और 18 से 44 साल के लोगों के लिए महज़ 98,100 वैक्सीन उपलब्ध थी.

मुख्यमंत्री ने एक जानकारी साझा करते हुए कहा था कि असम की पूरी आबादी के टीकाकरण के लिए 600 से 800 करोड़ रुपये की ज़रूरत होगी.

सरमा ने कहा कि सरकार उम्मीद कर रही है कि अगले महीने से वैक्सीन की उपलब्धता में सुधार होगा और जुलाई-अगस्त तक पर्याप्त स्टॉक हो जाएगा.

पढ़िये बी बी सी न्यूज़ की ये रिपोर्ट 

.(साभार बी बी सी न्यूज़  )

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