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‘मुफ्त राशन’ की जमीनी हकीकत:बिना रिश्वत के कार्ड नहीं तो राशन कैसे मिलेगा? MP सरकार के सचिवालय से सिर्फ 3 किमी दूर बस्ती के लोगों का दर्द

पढ़िए दैनिक भास्कर की ये खबर…

बर्तन मांजकर गुजर-बसर करती हैं 80 साल की लक्ष्मी बाई, 8 महीने से फ्री राशन नहीं मिला, क्योंकि कार्ड बंद है

सरकार दावा कर रही है कि देश के 80 करोड़ गरीबों को मुफ्त राशन बांटा जा रहा है। लेकिन पड़ताल में पता चला है कि गरीब दो जून की रोटी का इंतजाम अब भी बमुश्किल कर पा रहे हैं, क्योंकि दिल्ली से मिला मुफ्त राशन उन तक पहुंच ही नहीं रहा।

प्रधानमंत्री गरीब कल्याण योजना, यानी PMGKY योजना के तहत गरीबों को हर महीने 5 किलो गेहूं या चावल मुफ्त बांटा जा रहा है। केंद्रीय कैबिनेट ने बुधवार को ही इस स्कीम को 5 महीने के लिए बढ़ाने की मंजूरी दी है। साथ ही इससे फायदा पाने वाले लोगों की संख्या भी 80 करोड़ से बढ़ाकर 81.35 करोड़ बताई गई है।

केंद्र सरकार की इस महत्वाकांक्षी योजना की सच्चाई जानने के लिए हमने सबसे पहली पड़ताल मध्यप्रदेश की राजधानी भोपाल में की। सरकार के आंकड़े कहते हैं कि मध्यप्रदेश के 7.33 करोड़ लोगों में से 5.46 करोड़, यानी करीब 75% को मुफ्त राशन मिल रहा है।

इनमें गांवों के करीब 4.20 करोड़ और शहरों के 1.25 करोड़ लोग शामिल हैं। इसमें अंत्योदय योजना में करीब 50 लाख और प्रायोरिटी हाउसहोल्ड, यानी PHH कैटेगरी के तहत 4.96 करोड़ लोगों को शामिल किया गया है।

ये तो हुई आंकड़ों की बातें, अब थोड़ा धरातल की बात करते हैं। मध्यप्रदेश की राजधानी भोपाल, शहर का वह इलाका जहां सरकार बैठती है, नाम है वल्लभ भवन। यहां से महज सवा तीन किमी दूर एक बस्ती है, नाम है अन्ना नगर। वल्लभ भवन से यहां पहुंचने में दस से पंद्रह मिनट लगेंगे, बमुश्किल।

चलिए हम लिए चलते हैं…
भेल यानी, BHEL की तरफ करीब दो सौ मीटर जाते ही मुख्य सड़क पर डॉ. भीमराव अंबेडकर की मूर्ति है। वहां से बाएं होते ही बस्ती शुरू हो जाती है। बस्ती में चंद कदम चलते ही हमें एक बुजुर्ग महिला मिलीं। नाम बताया, लक्ष्मी, उम्र 60 साल।

मैंने अपना परिचय देते हुए पूछा कि आपको मुफ्त राशन मिल रहा है या नहीं? तो बोलीं, न पिछले साल मिला था और न ही इस साल मिला। ऐसा क्यों? ये पूछने पर अपने एक कमरे के घर में ले गईं।

बाईं तरफ खड़ी बुजुर्ग महिला लक्ष्मी हैं। दाईं तरफ की फोटो में उनकी पड़ोसन दुर्गाबाई बस्ती की अन्य महिलाओं के साथ नजर आ रही हैं।

घर में सोने के लिए बेड नहीं था बल्कि ईंटों के ऊपर लकड़ी का एक पटिया रखा था, जिस पर लक्ष्मी सोती हैं। दस बाय दस के कमरे में ही वे रहना, सोना, खाना-पीना सब करती हैं। लक्ष्मी बोलीं, कमरे में पानी भरा जाता है इसलिए ईंट पर पटिया रखा है। फिर अपना राशन कार्ड दिखाते हुए बोलीं- कई चक्कर लगा चुकी हूं कि कार्ड चालू हो जाए, लेकिन कोई सुनता ही नहीं। पार्षद के पास गई थी, उसने भी कुछ नहीं किया। कलेक्टर ऑफिस में एक फॉर्म भरवाया था, लेकिन कार्ड चालू नहीं हुआ। कंट्रोल पर जाओ तो वो कहते हैं आपका कार्ड बंद है।

लक्ष्मी की एक बेटी है जिसकी शादी हो चुकी है। अब वे आसपास के घरों में बर्तन मांजकर गुजर-बसर कर रही हैं। हमारी बातें सुनकर लक्ष्मी के पड़ोसी भी बाहर आ गए। उनका भी एक कमरे का ही घर है।

नाम बताया, गणेश। पहले मजदूरी पर जाते थे, लेकिन कोरोना के बाद से काम-धंधा कभी-कभी ही मिल पाता है। मैंने पूछा आपको राशन मिल रहा है? तो बोले, हमें तो एक साल से नहीं मिला। क्यों नहीं मिला? तो बोले, वो देते ही नहीं हैं। पत्नी के नाम से राशन कार्ड है, लेकर जाओ तो कहते हैं, कार्ड बंद है। राशन दुकान वाले ने कहा था कि कलेक्ट्रेट चले जाओ, वहां से कार्ड चालू हो जाएगा। पत्नी वहां भी गई थी, लेकिन कार्ड चालू हुआ ही नहीं।

गणेश से बात हो ही रही थी कि कैमरा देखकर आसपास के कई लोग इकट्‌ठा हो गए। इन्हीं में से एक थीं 55 साल की दुर्गाबाई। परिवार में एक लड़का है। मैंने पूछा- राशन मिलता है? तो बोलीं, कार्ड ही नहीं है। क्यों नहीं है? तो बोलीं, वो बनाते ही नहीं। कहते हैं कागज कम हैं। मेरे पास आधार कार्ड और परिचय पत्र है, लेकिन उस पर कार्ड नहीं बन रहा।

कार्ड बनवाने जाओ तो 5-7 हजार रुपए रिश्वत मांगते हैं
दुर्गाबाई के सामने के घर में रहने वाली तारा बोलीं, सर मुझे भी कुछ नहीं मिलता। मेरे पास भी कार्ड नहीं है। 7 नंबर पर कार्ड बनवाने जाओ तो कहते हैं 5 हजार रुपए दो, 7 हजार रुपए दो। कलेक्टर ऑफिस में बाबू, कर्मचारी रिश्वत मांगते है और कंट्रोल में जाओ तो वहां भी रिश्वत मांगी जाती है। अब मैं कहा से ले आऊं 6 हजार रुपए? मेरा लड़का दूध की गाड़ी पर जाता है, उसी से गुजर-बसर चल रही है।

अन्ना नगर भोपाल का पिछड़ा हुआ इलाका है। यहां रहने वाले अधिकतर लोग दिहाड़ी करके ही जिंदगी चला रहे हैं। कोरोना वैक्सीन की जागरूकता बढ़ाने के लिए हाल ही में यहां मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान भी पहुंचे थे।

जिन्हें किसी भी तरह की पेंशन मिल रही, उन्हें राशन नहीं
भोपाल में कंट्रोल की दुकान संचालित करने वाले योगेश सिंह (परिवर्तित नाम) ने बताया कि जिनके पास बीपीएल कार्ड नहीं है उन्हें अस्थाई प्रमाण पत्र बनवाना होता है। इसके लिए पहले नगर निगम में जाना पड़ता है। वहां से एक फॉर्म मिलता है। जिसे लेकर कलेक्टर ऑफिस जाना होता है। कागजी कार्रवाई होने के बाद अस्थाई प्रमाण पत्र जारी होता है। फिर हम मोबाइल एप्लिकेशन के जरिए फॉर्मेलिटी पूरी करके संबंधित व्यक्ति को राशन बांटते हैं।

सिंह कहते हैं, 60 साल से ज्यादा उम्र वाले ऐसे बुजुर्ग जिन्हें राज्य या केंद्र सरकार की कोई भी पेंशन मिल रही है, उन्हें राशन देने से मना कर दिया गया है। इसके अलावा जिन लोगों के एक से अधिक पते पर राशन कार्ड है, उन्हें भी एक ही जगह से राशन मिलता है।

कई बुजुर्गों का फिंगर प्रिंट नहीं आ पाता। इसलिए उन्हें राशन देने में दिक्कत होती है, लेकिन इसके लिए शासन ने नॉमिनी नियुक्त करने की प्रक्रिया तय की है। हालांकि बहुत से बुजुर्ग ये सब प्रक्रियाएं पूरी नहीं कर पाते, इसलिए उनका कार्ड भी चालू नहीं हो पाता।

अपात्रों के नाम जुड़ गए इसलिए पात्र लिस्ट से बाहर
मप्र के एक रिटायर्ड आईएएस अफसर ने कहा कि बीपीएल लिस्ट में तमाम अपात्र लोगों के नाम जुड़ गए हैं, इसलिए पात्रों के नाम नहीं जुड़ पाते, क्योंकि बीपीएल का हर राज्य का केंद्र की तरफ से एक कोटा तय होता है।

मप्र में साल 2011 में बीपीएल का आखिरी सर्वे हुआ था। उस समय केंद्र सरकार ने मप्र के बीपीएल का कोटा 27% तय किया था, लेकिन जब प्रदेश में सर्वे हुआ तो यहां बीपीएल की संख्या 40% के करीब पहुंच गई। अब यह संख्या पूरी होने के बाद लिस्ट में नाम बढ़ाए नहीं जा सकते। इसलिए बीपीएल लिस्ट से जब तक अपात्रों के नाम हटेंगे नहीं, तब तक पात्रों के नाम जुड़ नहीं सकेंगे।

वे कहते हैं, जिन लोगों को पीएम आवास योजना में पक्के मकान मिल गए हैं, उन्हें बीपीएल से हटाना चाहिए, लेकिन ऐसा करना राजनीतिक पार्टियां भी नहीं चाहतीं क्योंकि इससे उनके वोट बैंक पर खतरा है।

अपसर कहते हैं, सरकार ने 80 करोड़ जरूरतमंदों को मुफ्त राशन बांटने की योजना जरूर शुरू की है, लेकिन इस पूरी प्रक्रिया को बहुत जटिल कर दिया गया है। आप यदि सब तक फायदा पहुंचाना ही चाहते हैं तो सभी 80 करोड़ लोगों का राशन कार्ड बनाने में क्या समस्या है। राशन कार्ड बनने पर पीडीएस प्रणाली के तहत ही इन लोगों को राशन वितरित किया जा सकता है।

मप्र में राशन दुकानों को अभी दो महीने मई और जून का राशन बांटने को दिया जा चुका है। इसके बाद आगामी महीनों का राशन लीड एजेंसी के जरिए मिलेगा, लेकिन समस्या यही है कि सरकार की इतनी कोशिशों के बाद भी कागजी उलझनों और प्रक्रियाओं के चलते कई पात्र लोगों को राशन मिल नहीं पा रहा और अपात्र सुविधा का लाभ ले रहे हैं।

राशन पर कितना खर्च कर रही केंद्र सरकार
टीडीपीएस के तहत 81.35 करोड़ लोगों तक 5 महीने के लिए प्रति माह 5 किलो गेूहं/ चावल पहुंचाने के लिए सरकार 64,031 करोड़ रुपए सब्सिडी में खर्च करेगी। इस योजना के तहत केंद्र सरकार राज्यों से किसी तरह की वित्तीय मदद नहीं ले रही है। पूरा खर्चा केंद्र सरकार ही उठा रही है। भारत सरकार द्वारा किया जाने वाला कुल खर्चा करीब 67,266 करोड़ रुपए होगा।

सरकार मुफ्त राशन प्रधानमंत्री गरीब कल्याण अन्न योजना (PM-GKAY) स्कीम के तहत दे रही है। इसमें गरीबी रेखा में आने वालों के अलावा ऐसे लोग भी शामिल हैं, जिनकी माली हालत कोविड ने खराब कर दी है। ऐसे लोगों को प्रायोरिटी हाउस होल्ड (PHH) कैटेगरी में रखा गया है और स्थानीय स्तर पर वैरिफिकेशन के बाद इन्हें स्कीम में शामिल किया जा रहा है।

अंत्योदय अन्न योजना में जिन लोगों को शामिल किया गया है, उनका ये क्राइटेरिया है (ग्रामीण क्षेत्र के लिए)

  • बेघर परिवार और बिना आश्रय के परिवार।
  • बेसहारा परिवार जो मुख्य रूप से जीवित रहने के लिए भिक्षा पर निर्भर हैं।
  • कानूनी रूप से रिहा हुए बंधुआ मजदूर।
  • केवल एक कमरे में रहने वाले परिवार। जिनके कमरे की दीवार, छत कच्ची हो।
  • नाबालिग पर आश्रित परिवार।
  • ऐसे सभी घर जिनमें 15 से 59 साल की उम्र के बीच का कोई वयस्क सदस्य नहीं है। 60 साल या इससे ज्यादा उम्र के लोगों पर ही घर आश्रित हैं। जिनके पास निर्वाह का कोई जरिया नहीं है।
  • विकलांग सदस्य पर आश्रित परिवार। जहां कोई वयस्क निर्वाह के लिए नहीं है।
  • भूमिहीन परिवार, जो मजदूरी से जीवन-यापन करते हैं।
  • विधवा या एकल महिला पर आश्रित परिवार।
  • ऐसे परिवार जिनमें 25 वर्ष से अधिक का कोई साक्षर नहीं है।

शहरी क्षेत्र के लिए ये क्राइटेरिया है

  • ऐसे लोग जो बेघर हैं। जो सड़क किनारे, फुटपाथ, फ्लाईओवर, सीढ़ियों के आसपास, मंदिरों, रेलवे प्लेटफॉर्म जैसी जगहों पर रहने को मजबूर हैं।
  • जिनके घर की छत और दीवारें प्लास्टिक की पन्नी से बनी हैं।
  • जिनके घर में केवल एक कमरा है, जिसकी दीवारें घास, छप्पर, बांस आदि से बनी हैं।
  • जिनके घर में आय का कोई भी स्त्रोत नहीं है।
  • ऐसे लोग जो मजदूरी या इधर-उधर घरेलू काम करके जीवन-यापन करने पर मजबूर हैं।
  • ऐसे परिवार जिनके मुखिया दिहाड़ी करके घर चलाते हैं या उनकी कोई निश्चित आय नहीं है।
  • ऐसे परिवार जिनमें कमाई करने वाला कोई वयस्क नहीं है, जो नाबालिगों पर आश्रित हैं।
  • विकलांग सदस्य पर आश्रित परिवार।
  • विधवा या एकल महिला पर आश्रित परिवार।

(इन्हीं मापदंडों के आधार पर सरकार ने देश के 28 राज्य और 8 केंद्रशासित प्रदेश यानी कुल 36 राज्यों से जरूरतमंदों का आंकड़ा जुटाया है। 19 नवंबर 2020 को जारी किए गए आंकड़ों के अनुसार पूरे देश में ऐसे लोगों की संख्या 80.61 करोड़ है।)

साभार-दैनिक भास्कर

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