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अशरफ गनी के फेसबुक पेज से तालिबान सरकार को मान्यता देने की अपील, जानिए क्यों हुआ ऐसा

अफगानिस्तान। पूर्व राष्ट्रपति अशरफ गनी का आधिकारिक फेसबुक पेज हैक कर लिया गया है। अशरफ गनी ने एक ट्वीट के जरिए पुष्टि की कि किसी ने उनके फेसबुक अकाउंट को किसी ने हैक कर लिया है और उससे कुछ ऐसे पोस्ट किए गये हैं, जो उनके विचार नहीं हैं। हैकरों ने पोस्‍ट लिखकर कहा है कि दुनियाभर के देश अफगानिस्‍तान की तालिबान की सरकार को मान्‍यता दें।

अफगानिस्तान के पूर्व राष्ट्रपति अशरफ गनी के एक फेसबुक पोस्ट को देखकर पूरी दुनिया चौंक गई। अशरफ गनी के फेसबुक पेज से एक पोस्ट किया गया, जिसमें कहा गया कि वो दुनिया से अपील करते हैं कि तालिबान को मान्यता दे दे लेकिन फिर ट्विटर पर आकर उन्होंने सफाई देते हुए कहा कि उनका फेसबुक अकाउंट हैक कर लिया गया है। अशरफ गनी ने ट्वीट करके कहा कि मेरे ऑधिकारिक फेसबुक पेज को कल से हैक कर लिया गया है। जब तक यह पेज दोबारा मेरे नियंत्रण में नहीं आ जाता है, उस पर लिखी गई कोई भी पोस्‍ट वैधानिक नहीं है।

आपको बता दें कि अशरफ गनी अपने शीर्ष मंत्रियों के साथ उस दिन अफगानिस्तान से भाग गए थे, जिस दिन तालिबान ने काबुल पर कब्जा कर लिया था और फिर पूरे अफगानिस्तान को अपने नियंत्रण में ले लिया था। इस बीच, तालिबान अंतरराष्ट्रीय मान्यता के लिए होड़ कर रहा है। हाल ही में तालिबान ने संयुक्त राष्ट्र महासभा में अफगानिस्तान का प्रतिनिधित्व करने के अधिकार का दावा किया। हालांकि, अधिकांश देश संशय में रहे हैं और अभी तक अफगानिस्तान में तालिबान सरकार को मान्यता नहीं दी है।

अशरफ गनी के देश छोड़ने के बाद कहा गया था कि वो कई बक्शों में नकदी भरकर अपने हेलीकॉप्टर में ले गए हैं। हालांकि, अशरफ गनी ने अफगानिस्तान छोड़ने के 24 दिन बाद इस पर अपनी सफाई दे दी थी। एक बयान जारी करते हुए उन्होंने कहा था कि उन पर लगाए गए लाखों डॉलर लेकर भागने के आरोप बेबुनियाद और मनगढ़ंत हैं। अशरफ गनी ने अपने बयान में कहा था कि ”कई मीडिया रिपोर्ट्स में कहा गया है कि काबुल से निकलते वक्त मैं लाखों डॉलर अपने साथ लाया। ये आरोप पूरी तरह से गलत हैं, मैं अफगान के लोगों का कोई पैसा अपने साथ नहीं लाया। इन बातों में किसी तरह की कोई सच्चाई नहीं है।

उन्‍होंने कहा, ‘मैं अपने सैंडल उतारकर उनकी जगह पर जूते भी नहीं पहन सका। मुझे अफगानिस्‍तान से बाहर ले जाया गया।’ यूएई में रह रहे गनी ने कहा, ‘अगर मैं रुका होता तो मैं काबुल में रक्‍तपात का गवाह बनता। मैंने सरकारी अधिकारियों की सलाह पर अफगानिस्‍तान को छोड़ा है। काबुल को सत्‍ता के संघर्ष में एक और यमन या सीरिया में नहीं बदलना चाहिए, इस वजह से मैं देश छोड़ने को मजबूर हुआ।’

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