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बचपन से ही बेटे को सिखाएं बेटी का सम्मान करना

नई दिल्ली। बच्चों की परवरिश के महत्वपूर्ण सालों में आपने उसके कोरे मन पर क्या लिखा, इससे आने वाले समय में केवल उसका ही नहीं, बल्कि पूरे समाज का भविष्य तय होता है। आप चाहें तो बच्चों को उनकी नाजुक उम्र से ही लिंग-भेद से दूर रखकर उन्हें बराबरी की सोच के साथ बड़ा कर सकती हैं। खासतौर पर आज जब महिलाओं के प्रति बढ़ते अपराध चिंता का विषय बन चुके हैं, जरूरी है कि बच्चों के साथ बिना लिंग-भेद के व्यवहार किया जाए।

आज के माहौल में अपनी बेटियों को सुरक्षित रखना मां-बाप की सबसे बड़ी चिंता और चुनौती बन चुका है। बेटियों की सुरक्षा से जुड़े डर के कारण मां-बाप जाने-अनजाने ही उन पर कई तरह की अनदेखी दीवारें खड़ी करने लगते हैं। उसके उठने-बैठने से लेकर खाने-पीने, हंसने-बोलने और चलने-फिरने के तौर-तरीकों पर तमाम तरह के निर्देश तय कर दिए जाते हैं। अगर लड़का अपने घर के माहौल में लड़कियों या महिला सदस्यों को किसी प्रकार से दबा हुआ देखता है, तो वह भी मन ही मन अपने आपको लड़कियों से बेहतर समझते हुए बड़ा होता है। उसके मन में यह धारणा हो जाती है कि लड़कियां कमजोर होती हैं और उन्हें आसानी से टार्गेट किया जा सकता है।

ऐसे माहौल में बड़े होते लड़कों का ही नहीं लड़कियों का विकास भी प्रभावित होता है। जिन परिवारों में महिलाओं का अपना कोई मत नहीं होता, वहां लड़कियों में बचपन से ही हीनभावना समझने लगती हैं। यानी ऐसे परिवारों में स्थिति दोनों तरफ से खराब होने लगती है। घर के काम में लिंग के आधार पर बंटवारा भी बच्चों के मन में लिंग-भेद के फर्क को गहरा कर देता है। वे इस सोच के साथ बड़े होते हैं कि किचन, घर की साफ-सफाई या कपड़ा धोना लड़कियों का काम होता है, जबकि घर के बाहर के सभी काम लड़कों की जिम्मेदारी है। अगर आप चाहती हैं कि भविष्य में आपकी बेटी घर-बाहर के सभी काम करे और आपकी कामकाजी बेटी का हाथ बंटाने में उसका पति भी मदद करे, तो शुरुआत हमें अपने घर से ही करनी होगी। बच्चों को घर-बाहर के कामों में बराबर अवसर दें।

लड़कों के लिए रोना मना है और लड़कियां तो हरदम रोती रहती हैं, जैसी बातों से हम बच्चों की भावनाओं को भी लिंग के दो अलग दायरों में बांट देते हैं। ऐसी बातें जो हम रोज कहते रहते हैं, बच्चों के मन पर इनका असर बेहद गहरा होता है। अपने ऐसे बातों से ही हम बच्चों को सिखा देते हैं कि लड़के मजबूत होते हैं और लड़कियां नाजुक और कमजोर। प्यार, देखभाल और सहनशीलता, जिन्हें लड़कियों के व्यक्तित्व में ढालने की कोशिश की जाती है, अगर कच्ची उम्र से लड़कों में भी डाले जाएं, तो बड़े होने पर वे भी महिलाओं के प्रति संवेदनशील होंगे।

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