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लोगों की जान से मत खेलो दारोगा जी, पैसा कमाने के और भी तरीके हैं गाज़ियाबाद में

गाज़ियाबाद | गाज़ियाबाद की किस कॉलोनी में कौन व्यक्ति अवैध शराब का धंधा करता है यह पता लगाना कोई मुश्किल काम नहीं। यह सिर्फ खोड़ा कॉलोनी की ही बात नहीं। शहर के अर्बन इलाकों में दूसरे राज्यों से लाई गई अँग्रेजी शराब धड़ल्ले से बिकती है तो झुग्गी-झौपड़ियों में देसी शराब का धंधा ज़ोर-शोर से चल रहा है। ऐसा नहीं है कि इसके बारे में इलाके के चौकी इंचार्ज को पता नहीं होता। चौकी इंचार्ज की बात तो दूर, सड़कों पर खड़ी डायल 100 की गाड़ियों में बैठे पुलिसवाले दूर से ही सूंघ कर पता लगा लेते हैं कि किस वाहन में अवैध शराब ले जाई जा रही है। लेकिन फिर भी क्या कारण है कि अवैध शराब के कारोबारियों पर कार्यवाही करने के लिए खोड़ा पुलिस को चार लोगों की मौत होने तक इंतज़ार करना पड़ा?

चौकी इंचार्ज का काम है वह पता लगाए कि इलाके में कौन सी खाने-पीने की ऐसी दुकानें और होटल हैं जहां लोग इकट्ठा होकर शराब पीते हैं, दूसरे राज्यों से लाकर बेची जा रहे देशी-अँग्रेजी शराब के अड्डे कहाँ पर हैं और कौन से घरों में मिल्ट्री कोटे की शराब बेची जा रही है। सिर्फ शराब ही नहीं इलाके में बेची जा रही ड्रग्स, अफीम और चरस आदि के ठिकानों का पता लगा कर उनकी धरपकड़ करना भी चौकी इंचार्ज की नियमित ड्यूटी में शामिल है।

ऐसा नहीं है कि पुलिस या आबकारी विभाग के कर्मचारी इन मौत के कारोबारियों के खिलाफ कार्यवाही नहीं करते हैं। कार्यवाही होती है मगर सिर्फ दिखावे के लिए हर हफ्ते किसी शराब तस्कर को पकड़ कर छोटी-मोटी मात्रा में शराब पकड़ कर खानापूर्ति कर ली जाती है। अवैध शराब के कारोबार की जानकारी रखने वालों की मानें तो यह कार्यवाही भी उन शराब बेचने वालों पर ही होती है जो पुलिस को समय पर पैसा नहीं दे पाते हैं।

दरअसल यह एक कटु सत्य है की अवैध शराब, अफीम, गांजे और ड्रग्स आदि के धंधे से गाज़ियाबाद पुलिस को हर महीने लाखों रुपये की आमदनी होती है। इस गोरखधंधे में सिर्फ पुलिस ही नहीं, इलाके के छोटे-मोटे बदमाशों से लेकर इलाके के पार्षदों, एमएलए और यहाँ तक एमपी के गुर्गे शामिल होते हैं। ऐसा कह कर हम सभी पुलिसकर्मियों, पार्षदों या जनप्रतिनिधियों को भ्रष्ट नहीं कह रहे हैं। मौजूदा तंत्र में अभी भी ऐसे बहुत से ईमानदार लोग मौजूद हैं जिनकी ईमानदारी पर हम आज भी कसमें खा सकते हैं। मगर यह भी सत्य है कि इस भ्रष्ट तंत्र में काम कर रहे ईमानदार कर्मचारी या तो ऐसी जगहों पर तैनात हैं जहां वे लगभग बेअसर हैं या फिर उनके ऊपर तैनात अधिकारी उन्हें कुछ करने का मौका ही नहीं देते हैं। वरना कैसे संभव है कि इलाके में धड़ल्ले से अवैध शराब बेची जा रही हो, क्षेत्र के रिक्शा वाले से लेकर होटल मालिकों तक तो अवैध शराब के ठिकानों के बारे में पता हो मगर पुलिस वालों को ही इसकी खबर नहीं हो।

हम यह भी मान कर चल रहे हैं कि गाज़ियाबाद पुलिस में व्याप्त भ्रष्टाचार को जड़ से खत्म करना एक असंभव बात है। क्योंकि गाज़ियाबाद की मलाईदार चौकियों और थानों पर तैनाती के लिए पुलिस वालों ने भी न जाने कितने साल इंतजार किया होगा, अधिकारियों के घरों में न जाने कितने महीनों तक फल-फ्रूट भिजवाए होंगे, न जाने कितने सालों तक गौशालाओं में गायों का गोबर साफ किया होगा। आखिर उन्हें भी अपनी वर्षों की साधना का फल तो मिलना ही चाहिए।

मगर क्या चंद पैसों के लालच में अमूल्य ज़िंदगी के साथ गाज़ियाबाद पुलिस का यह खिलवाड़ जायज है? पुलिस को यदि पैसा कमाना है तो इसके लिए उसके पास दूसरे बहुत से तरीके हैं। मकानों-ज़मीनों पर कब्जे दिलवा कर या कब्जे हटवाकर भी पुलिस हर महीने लाखों रुपये महीने कमा रही है। अगर फिर भी आमदनी में कमी आ रही है तो हर पुलिस वाला अपने-अपने इलाके में यातायात के नियमों का उल्लंघन करने वालों को पकड़कर ही अच्छे-खासे पैसे कमा सकता है। यदि वे ऐसा करते हैं तो कम से कम उन पर इंसानी ज़िंदगी से खिलवाड़ का आरोप तो नहीं लगेगा और न ही उन्हें लगातार ऊपर तक पैसे पहुंचाने के बावजूद सस्पेंड होना पड़ेगा।

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