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घने जंगलों में गर्भवती महिलाओं की जिंदगी बचा रही सुरेश की बाइक एंबुलेंस

नई दिल्ली। छत्तीसगढ़ के अबूझमाड़ निवासी नागरिकों के बीच सबसे बड़ी बाधा है यहां की भौगोलिक संरचना। यहां के पहाड़ों, घने जंगलों व नदियों की अपार बाधा के चलते बिजली, पानी व शिक्षा जैसी मूल सुविधाओं की तो बात ही छोड़िए, स्वास्थ्य सेवाओं का मिलना भी स्वप्न समान है।

इनसभी विसंगतियों को दरकिनार करते हुए सुरेश बेलसरिया यहाँ की गर्भवती महिलाओं के लिए मसीहा बन चुके हैं। सुरेश अपनी मोटरसाइकिल एंबुलेंस से गर्भवती महिलाओं को अस्पताल पहुंचाते हैं। इनका मुख्य मकसद है कि स्वास्थ्य के क्षेत्र में अबूझमाड़ के दुर्गम जंगलों में बसे आदिवासियों को भी वही हक मिले जो राजधानी रायपुर के लोगों को मिलता है। सुरेश अपनी बाइक एंबुलेंस से अब तक 547 महिलाओं और उनके गर्भस्थ शिशुओं की जिंदगी बचा चुके हैं।

नारायणपुर जिले के दोनों विकासखंड बेहद दुर्गम जंगलों में बसे हैं। अबूझमाड़ के 4 हजार वर्ग किलोमीटर के जंगलों में बसे 237 गावों में कोई अस्तपाल नहीं है। यही हाल नारायणपुर विकासखंड के गांवों का भी है। 2012 में यूनीसेफ के सहयोग से एनजीओ साथी सेवा संस्था ने नारायणपुर विकासखंड के सौ गांवों में स्वास्थ्य सेवाओं पर काम शुरू किया। इनका मूल उद्देश्य संस्थागत प्रसव को बढ़ावा देना था। जब काम आगे बढ़ा तो महसूस किया गया कि जब तक अंदरूनी गांवों से अस्पताल तक पहुंचने का साधन नहीं होगा तब तक प्रयास सफल नहीं हो पाएंगे।

जून 2014 में 2 लाख 30 हजार खर्च कर ऐसी बाइक बनाई गई जिसमें गर्भवती माताओं को आसानी से अस्पताल लाया जा सकता है। तब से अब तक 5 सौ से अधिक गर्भवती माता और करीब 40 गंभीर बीमारियों से जूझ रहे बच्चों को अंदरूनी जंगलों से निकालकर प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र पहुंचाया जा चुका है।

सुरेश बेलसरिया की बाइक एंबुलेंस जिले के अंदरूनी गांवों में जानी पहचानी है। यही नहीं सुरेश के साथी भी इनकी भरपूर मदद करते हैं। गांवों में लगातार काम करते हैं। गर्भवती माताओं को दवाइयां देते हैं और उन पर नजर रखते हैं। प्रसव के समय से दस दिन पहले बाइक एंबुलेंस ऐसी महिलाओं को लेकर धौड़ाई के स्वास्थ्य केंद्र पहुंच जाती है। प्रसव के बाद उन्हें उसी एंबुलेंस पर सुरक्षित वापस भी पहुंचाया जाता है।

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